[दीवान]अमरीका के डैलस में भारतीय शबनम

Ravikant ravikant at sarai.net
Wed Sep 17 17:30:12 IST 2008


अमरीका के डैलस में भारतीय शबनम

डैलस से रचना श्रीवास्तव

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 (अप्रवासी भारतीय |   डैलस से रचना श्रीवास्तव |  Wednesday, 17 September 2008 
शबनम का मतलब होता है ओस की बूंद,  जो सुबह सुबह अपने घर के आसपास और बाग-बगीचों 
में पेड़-पौधों पर बहुत ही खूबसूरती से अपनी जीवंतता का अहसास कराती है। पत्ते पर पड़ी ओस की बूंद 
पूरे पौधे और बगीचे के सौंदर्य को कई गुना कर देती है। जब तक किसी बगीचे में या
 पेड़-पौधे पर शबनम की बूंद मुस्कराती रहती है, उसकी मौजूदगी हर फूल, हर पौधे और हर पत्ते को 
एक अद्भुत सौंदर्य प्रदान करती है। लेकिन एक शबनम है जिसका जन्म तो भारत में हुआ, मगर अब वह 
अमरीका के डैलस में अपनी दिलकश आवाज के जादू से अमरीका में बसे भारतीयों के बीच एक खुशनुमाँ
अहसास की तरह घुल-मिल गई है। )
  
 इस शबमन का जन्म ३ सितम्बर को दिल्ली में हुआ, मगर आज अमरीका के डैलस में इनकी आवाज हर भा
रतीय के दिल पर राज कर रही है। पिता एयर मार्शल आहलुवालिया और माँ हरजीत की पहली बेटी। 
माता-पिता की दुलारी थी और इनका नाम बड़े प्यार से शबनम रखा गया। इनके एक भाई और एक 
बहन हैं। पिता फौज में थे तो घर का  पूरा माहौल देश भक्ति में डूबा था। माँ ने देश-भक्तों की गौ
रव गाथा सुना-सुनाकर बच्चों के मन में बचपन से ही देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भर दी और 
शबनमजी आज भी अपने देश की बात करने पर भाव विभोर हो जाती हैं । 
 एक दिन ये २६ जनवरी को ये डैलास में रेडियो प्रोग्राम कर रही थी तो सब से पूछ रही थी की आप 
को आज के दिन सबसे ज्यादा क्या याद आता है  सभी कुछ न कुछ बता रहे थे। मैने कहा आप बताएँ कि 
आप को क्या याद आता है, तो उन्होंने कहा कि हर २६ जनवरी को ये परेड देखने जाती थीं और जब 
आकाश में अपने पापा को विमान उडा़ते हुए तिरंगा बनाते देखती थी तो इनको बहुत गर्व होता था। 
उन  सारे हवाई जहाजों  में अपने पापा का जहाज़ खोजती रहती थी कि  उनका हवाई जहाज कौनसा 
है।  अपने देश से बहुत प्यार करने वाली शबनम पढ़ाई में भी अव्वल थी मिलनसार होने की वजह से
 सभी की चहेती थी। 

 शबनम की शिक्षा- दीक्षा दिल्ली में हुई। उन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक किया। इसके बा
द होटल मैनेजमेंट का कोर्स दिल्ली में  पूसा से किया। वे अपनी हर परीक्षा में अव्वल आती रही।
 पढ़ाई पूरी होने पर ताज होटल में  नौकरी मिल गई। दिल्ली में ५ साल काम किया फ़िर इनको
 न्यूयार्क भेजा गया यहाँ भी इन्होने ५ साल और ८ साल वॉशिंगटन डीसी में काम किया। यहाँ 
इनके जीवन का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। यही था वो समय जब इन्होने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कि
या। जीवन के रंगीन सपने लिए ये डैलस  आगई और अपने परिवार में रम गईं । 

 समय के साथ इनके आंगन में नन्हे फूल खिले। इन फूलों को सजाने-सँवारने में शबनम जी ने अपना काम छोड़ 
दिया। इनका मानना था कि  के घर और बच्चे हर चीज से पहले आते हैं बच्चों को  संस्कार एक माँ से 
अच्छा कोई और नही दे सकता। जब बच्चे थोड़े बड़े़ हुए तो इन्होंने रीयलस्टेट  का काम किया। और जब 
बच्चे स्कूल जाने लगे तो इन्होने प्लेनों में स्थित प्राईमरी स्कूल में नैकरी की, ये उस स्कूल में प्रिंसिपल 
के पद पर रही। बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ते थे तो  काम भी हो जाता था और बच्चों की देखभाल भी
। बच्चों के बड़े होने पर इन्होंने अपना अधिक समय काम को देना प्रारम्भ कर दिया। 
 अभी शबनम जी यूनाइटेड सेंट्रल बैंक मे मार्केटिंग विभाग मे काम करती हैं, डैलस में स्थित  इंडियन ला
यंस कल्ब की ये बोर्ड मेम्बर है,प्रथम नामक  संस्था के  बोर्ड मे हैं, ग्रेटर डैलस एशियन अमेरिकन 
चैंबर ऑफ़ कॉमर्स की डाइरेक्टर हैं फेडरेशन ऑफ़ इंडियन एसोशियेशन की रीजनल वाइस प्रेसिडेंट  हैं। 
डैलस मे मीडिया जगत का एक बड़ा नाम है फन एशिया, जिसमें फन एशिया रेडियो, फन एशिया 
बुक,फन एशिया थिएटर शामिल हैं। शबनमजी इस ग्रुप की वॉइस प्रेसिडेन्ट  हैं,फन एशिया रेडियो की  
डाइरेक्टर   हैं और फन   एशिया किताब (देसी पेजेज़) की संपादिका  भी। शबनम जी कहती है, यहाँ 
काम करते करते अब तो ऐसा लगता है कि फन एशिया ही उन का घर है। वे इंडियन  एसोशियेशन ऑफ़ 
नॉर्थ टेक्सेस की प्रेसीडेंट  भी रह चुकी हैं। 

 जब शबनम जी ये सब मुझ को बता रहीं थी तो एक सपना सा लग रहा था। ये इतना सारा काम कैसे 
कर पाती है। यह  बात मुझे तब मालूम हुई,   जब एक बार ये वाशिंगटन गईं थी, वहाँ सेनीटर्स की 
मीटिंग थी उसमें इनको भी जाना था (हालांकि ये  सेनिटर नहीं हैं, लेकिन इनको विशेष रूप से
 आमंत्रित किया गया था) वहाँ जाकर भी इन्होंने आपना रेडियो कार्यक्रम फ़ोन के जरिये किया। डैलस 
मे तन्जिरा  उनकी सहायता कर  रही थी। तभी तन्जिरा ने शबनम जी से पूछा की इतनी सारी
 व्यस्तता है, काम है तो क्या आपको ठीक से नींद आई। तो लाजवाब कर देने वाला उनका जवाब था, 
नींद में समय क्यों बर्बाद करना, मै सुन कर हैरान रह गई। केवल ज़रूरत भर की नींद और बस
 उस के बाद काम। इस को कहते हैं काम के प्रति समर्पण। शायद यही  कारण है कि ये इतने सारे काम 
कर पाती हैं। काम इनके लिए पूजा है। काम की इज्जत करती हैं और काम इनकी इज्जत करता है, और 
यही वजह है कि जो एक बार इनसे मिल लेता है इनके प्रति आदर और श्रध्दा से भर जाता है।
  
 ये हिन्दी उर्दू, अंग्रेजी और पंजाबी बहुत अच्छे से बोल लेती है, फ्रेंच और स्पेनिश भी इनको आती है। 
इतनी बुलंदियों को छूने के बाद भी घमंड इनको जरा भी नहीं है  यश की ऊँचाईयाँ  को छुआ पर पैर 
धरा से ही जुड़ा  है। इतना पढ़ने के बाद,  इतनी सफलता के बाद आज भी इनकी अभिलाषा है कि पी
एचडी करें। कहती हैं कि जब भी समय ने समय दिया तो पीएचडी जरूर करेंगी। 
 अपने जीवन का आदर्श ये अपने माता-पिता को मानती हैं, कहती हैं कि माता-पिता ने ही सिखाया 
कि अनुशासन का  जीवन में क्या महत्व होता है। अपने माता-पिता से मिले इन्हीं संस्कारों और
 आदर्शों को लेकर वे जीवन में नए आयाम छूती रही। दोस्तों के बारे में पूछने पे कहती हैं की जहाँ भी 
रही  सभी मेरे  दोस्त रहे। आज भी इनके शुभेच्छु और  इनको प्यार  करने वाले मित्र बहुत हैं अतः कि
सी एक का नाम नही लेना चाहती हैं कहती हैं, सभी  मेरे दोस्त हैं। 

 शबनम जी कहती हैं जो भी करो, सही  करो  पूरी निष्ठा और लगन से करो, शुभ करमन ते कबंहूँ न 
डरो यही आप के जीवन का आधार है और मूल मन्त्र भी। 
 वैसे तो खाली समय आप को मिलता नही पर यदि मिलता है तो अपने परिवार के साथ बिताना पसंद 
करती हैं।
 सुबह जब आप रेडियो कार्यक्रम करती हैं तो कहती हैं "आई ऍम  ड्राइविंग यू  टू  योर वर्क "इनकी 
ये बात एक मुहावरा बन गई  है, और डैलस में बसे हर भारतीय के लिए एक ऐसे संदेश की तरह है जिसमें 
उर्जा भी है और अपने कार्य के प्रति समर्पण का बोध कराता एक अध्यात्मिक भाव भी।  जब मैने
 बड़ी मुश्किल से इनसे इनका समय छीनकर इनसे इतनी बात की तो जाना कि सुबह सबको काम 
तक पहुँचाने वाली शबनम ख़ुद कितना काम करती है, इनकी कर्म-निष्ठा देख कर मै तो नतमस्तक हो 
गई। सच में यदि  कोई इनकी तरह जीवन में अनुशासन,कर्म-निष्ठा, समय का सदुपयोग और काम के 
प्रति समर्पण रखे तो फिर दुनिया की ऐसी कौनसी चीज है जो इंसान नहीं पा सकता। सफलता की 
ऐसी कौन सी सीढ़ी है जिस पर चढ़ना मुश्किल हो। मैने तो  इनसे  बहुत कुछ सीखा है और एक भारती
य होने के नाते अमरीका में बसे हम सभी  भारतीयों को इन पर बहुत गर्व है। 

(रचनाजी कोई लेखिका नहीं है, लेकिन वे हमारे पाठकों के लिए कुछ लिखना चाहती थी और उनको लगा 
कि इसके लिए शबनमजी से अच्छा कोई किरदार नहीं हो सकता।  हिन्दी प्रेमी पाठकों के लिए उन्हों
ने मेहनत करके यह लेख हिन्दी में तैयार किया और हमको भेजा)


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