[दीवान]भारत में चुनावों के दौरान अब तक बुलंद हुए नारे-

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Wed Apr 1 11:34:10 IST 2009


चुनाव में नारों का बड़ा महत्व होता है। जितना तीखा हो उतनी ही धार पैदा करता
है। इस मामले में सीपीआई ने  नारा दिया था- “*लाल किले पर लाल निशान,  मांग रहा
है हिंदुस्तान।*” आजादी के शुरुआती वर्षों में जवाहरलाल नेहरू पार्टी और सरकार
में अपनी समान पकड़ बना चुके थे। उनके समर्थकों ने नारा दिया- *“**नेहरू के हाथ
मजबूत करो।*”



उन दिनों जनसंघ विपक्ष में बैठने वाली कम महत्व वाली पार्टी थी। और इस पार्टी
का चुनाव चिन्ह दीपक था। इसलिए कांग्रेसी व्यंग्य के साथ कहा करते थे- “*इस
दिये में तेल नहीं है, यह देश में कैसे उजाला लाएगी।” *



दैनिक समस्यों से कई मुद्दे नारे का रूप लेते रहे हैं। बेरोजगारी, गरीबी,
महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी नारों की शक्ल अख्तियार करते रहे हैं। मुलाहिजा
फरमाइये- “*रोजी-रोटी दे न सके जो वह सरकार निकम्मी है*”, “ *जो सरकार निकम्मी
है उसे हमें बदलना है।*” सन 1967 तक साझा चुनाव होते थे इसलिए चुनावी नारों में
स्थानीय व प्रांतीय मुद्दों का हावी होना लाजमी था।



 सन 1967 में उत्तरप्रदेश में छात्रों ने कुछ ज्यादा ही तीखे चुनावी नारे लगाए।
जैसे- “*उत्तरप्रदेश में तीन चोर, मुंशी गुप्ता युगलकिशोर*। ” उन दिनों छात्र
आंदोलन की वजह से कई छात्र जेलों में बंद थे। तब छात्रों ने नारा दिया- “*जेल
के फाटक टूटेंगे, साथी हमारे छूटेंगे।*” पिछड़े वर्ग की आवाज बुलंद करते हुए
सोशलिस्ट पार्टी ने नारा दिया- “*संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में
साठ।* ” गोरक्षा आंदोलन को तेज करते हुए जनसंघ ने नारा दिया- “*गौ हमारी माता
है, देश-धरम का नाता है।”*



इंदिरा गांधी के आते-आते बहुत कुछ व्यक्ति केंद्रित हो गया था, तब नारा चुनावी
नारा बना- *“**इंदिरा हटाओ, देश बचाओ।*” दूसरी तरफ इंदिरा ने नारा दिया- “*वे
कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ*।” आपात काल के बाद आम चुनाव
में नारों का सर्वाधिक जोर रहा। इस दौरान जो आकाश फाडू नारे लगे वे इस प्रकार
थे- *“**सन सतहत्तर की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार।”** “**संपूर्ण क्रांति का
नारा है, भावी इतिहास हमारा है।” “**फांसी का फंदा टूटेगा, जार्ज हमारा छूटेगा।”
“**नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा संजय बंसीलाल।”*



सन 1980 में कांग्रेस ने नारा दिया- “*जात पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर।”* इसी
चुनाव में इंदिरा के समर्थन में और भी वजनी नारे लगाए- *“**आधी रोटी
खाएंगे, **इंदिरा
को बुलाएंगे **।”* इंदिरा की हत्या के बाद सन 84 में राजीव गांधी के समर्थन में
जो नारे लगे वो इस प्रकार थे- “*पानी में और आंधी में, विश्वास है राजीव गांधी
में।*” हालांकि यह विश्वास सन 89 में चूर-चूर हो गया और नारे लगे- *“**बोफोर्स
के दलालों को एक धक्का और दो।* ” दूसरी तरफ वीपी सिंह के समर्थन में नारे लगे-
*“**राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है।” * इसके जवाब में नारे लगे- *“**फकीर
नहीं राजा है, सीआईए का बाजा है।”*



सन 1996 में अटलबिहारी वाजपेयी के पक्ष में नारे लगे-“*अबकी बारी
अटलबिहारी।*” अगले
चुनाव यानी सन 2004 में इंडिया साइनिंग का नारा लगा। फिर भी वे चुनाव हार गए।
तब कांग्रेस ने नारा दिया था*-**“**कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।*” इस बार
कांग्रेसी *–“**कांग्रेस की पहचान, विकास और निर्माण।”* पर ताल ठोक रहे हैं।



कुछ और बुलंद नारे इस प्रकार हैं- *“**एक शेरनी सब लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर”,
“**मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम”, “**तिलक तराजू और तलवार,
इनको मारो जूते चार”**।* और भी है, वह फिर कभी।
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