[दीवान]भारत में चुनावों के दौरान अब तक बुलंद हुए नारे-

sandeep pandey aboutsandeep123 at gmail.com
Wed Apr 1 13:07:42 IST 2009


ब्रजेश भाई कुछ और नारे याद आते हैं मसलन
*अटल बिहारी कमल निशान *
*मांग रहा है हिन्दुस्तान*

*ब्राहमण शंख बजायेगा *
*हाथी चलता जायेगा*

इसी तरह ददुआ के भाई ने बांदा में नारा दिया था

*मोहर लगेगी हाथी पर
वरना गोली चलेगी छाती पर ....*

2009/4/1 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>

> चुनाव में नारों का बड़ा महत्व होता है। जितना तीखा हो उतनी ही धार पैदा करता
> है। इस मामले में सीपीआई ने  नारा दिया था- “*लाल किले पर लाल निशान,  मांग
> रहा है हिंदुस्तान।*” आजादी के शुरुआती वर्षों में जवाहरलाल नेहरू पार्टी और
> सरकार में अपनी समान पकड़ बना चुके थे। उनके समर्थकों ने नारा दिया- *“**नेहरू
> के हाथ मजबूत करो।*”
>
>
>
> उन दिनों जनसंघ विपक्ष में बैठने वाली कम महत्व वाली पार्टी थी। और इस पार्टी
> का चुनाव चिन्ह दीपक था। इसलिए कांग्रेसी व्यंग्य के साथ कहा करते थे- “*इस
> दिये में तेल नहीं है, यह देश में कैसे उजाला लाएगी।” *
>
>
>
> दैनिक समस्यों से कई मुद्दे नारे का रूप लेते रहे हैं। बेरोजगारी, गरीबी,
> महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी नारों की शक्ल अख्तियार करते रहे हैं। मुलाहिजा
> फरमाइये- “*रोजी-रोटी दे न सके जो वह सरकार निकम्मी है*”, “ *जो सरकार
> निकम्मी है उसे हमें बदलना है।*” सन 1967 तक साझा चुनाव होते थे इसलिए चुनावी
> नारों में स्थानीय व प्रांतीय मुद्दों का हावी होना लाजमी था।
>
>
>
>  सन 1967 में उत्तरप्रदेश में छात्रों ने कुछ ज्यादा ही तीखे चुनावी नारे
> लगाए। जैसे- “*उत्तरप्रदेश में तीन चोर, मुंशी गुप्ता युगलकिशोर*। ” उन दिनों
> छात्र आंदोलन की वजह से कई छात्र जेलों में बंद थे। तब छात्रों ने नारा दिया-
> “*जेल के फाटक टूटेंगे, साथी हमारे छूटेंगे।*” पिछड़े वर्ग की आवाज बुलंद
> करते हुए सोशलिस्ट पार्टी ने नारा दिया- “*संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े
> पावें सौ में साठ।* ” गोरक्षा आंदोलन को तेज करते हुए जनसंघ ने नारा दिया- “*गौ
> हमारी माता है, देश-धरम का नाता है।”*
>
>
>
> इंदिरा गांधी के आते-आते बहुत कुछ व्यक्ति केंद्रित हो गया था, तब नारा चुनावी
> नारा बना- *“**इंदिरा हटाओ, देश बचाओ।*” दूसरी तरफ इंदिरा ने नारा दिया- “*वे
> कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ*।” आपात काल के बाद आम चुनाव
> में नारों का सर्वाधिक जोर रहा। इस दौरान जो आकाश फाडू नारे लगे वे इस प्रकार
> थे- *“**सन सतहत्तर की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार।”** “**संपूर्ण क्रांति
> का नारा है, भावी इतिहास हमारा है।” “**फांसी का फंदा टूटेगा, जार्ज हमारा
> छूटेगा।” “**नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा संजय बंसीलाल।”*
>
>
>
> सन 1980 में कांग्रेस ने नारा दिया- “*जात पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर।”* इसी
> चुनाव में इंदिरा के समर्थन में और भी वजनी नारे लगाए- *“**आधी रोटी खाएंगे,
> **इंदिरा को बुलाएंगे **।”* इंदिरा की हत्या के बाद सन 84 में राजीव गांधी के
> समर्थन में जो नारे लगे वो इस प्रकार थे- “*पानी में और आंधी में, विश्वास है
> राजीव गांधी में।*” हालांकि यह विश्वास सन 89 में चूर-चूर हो गया और नारे
> लगे- *“**बोफोर्स के दलालों को एक धक्का और दो।* ” दूसरी तरफ वीपी सिंह के
> समर्थन में नारे लगे- *“**राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है।” * इसके जवाब
> में नारे लगे- *“**फकीर नहीं राजा है, सीआईए का बाजा है।”*
>
>
>
> सन 1996 में अटलबिहारी वाजपेयी के पक्ष में नारे लगे-“*अबकी बारी अटलबिहारी।*”
> अगले चुनाव यानी सन 2004 में इंडिया साइनिंग का नारा लगा। फिर भी वे चुनाव हार
> गए। तब कांग्रेस ने नारा दिया था*-**“**कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।*” इस
> बार कांग्रेसी *–“**कांग्रेस की पहचान, विकास और निर्माण।”* पर ताल ठोक रहे
> हैं।
>
>
>
> कुछ और बुलंद नारे इस प्रकार हैं- *“**एक शेरनी सब लंगूर, चिकमंगलूर
> चिकमंगलूर”, “**मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम”, “**तिलक
> तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार”**।* और भी है, वह फिर कभी।
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