[दीवान]वो कैंची गिरीन्द्र की नहीं थी
girindra nath
girindranath at gmail.com
Fri Jan 23 15:59:11 IST 2009
मीडिया स्कैन के संपादन को लेकर जो बातें सामने आई है, उसपर मैं अभी तक चुप था.
हालाँकि हफ्तावार <http://haftawar.blogspot.com/> में एक पोस्ट पर मैंने अपनी
गलती को स्वीकार किया था.
अभी अंशु भाई का मेल आया दीवान पर की -वो कैंची गिरीन्द्र की नहीं थी, जिसे
विनीत ने अपने ब्लॉग व् दीवान पर डाला था. अंशु ने उसी का उत्तर दिया, जो उनके
विचार है. दरअसल दफ्तर के कामों में हम इतने रम जाते हैं कुछ काम में हमसे गलती
हो जाती है. यही मीडिया स्कैन के संपादन में भी हुआ. जिस क़यामत की रात का जिक्र
अंशु ने किया है, एक लेख को सुबह उसके जगह में लगाया गया, और वहीँ गलती हो गयी,
जिसे हमे जिम्मेदारी से स्वीकार करना चाहिए और पुरे प्रकरण को समाप्त कर देना
चाहिए.
शुक्रिया
गिरीन्द्र
2009/1/23 ashishkumar anshu <ashishkumaranshu at gmail.com>
> *हमारा पक्ष भी तो पूछा होता* -
>
> विनीत भाई, आप उन सब लोगों से परिचित हैं जो मीडिया स्कैन टीम के साथ जुड़े
> हुए हैं. उसके बाद भी आप इस तरह का कोई लेख कैसे लिख सकते हैं? लिखने से पहले
> कम से कम एक बार बात तो करते.
> संपादन के मामले में उलट हुआ. यहाँ जो संपादन है वह पूरी तरह से गिरीन्द्र की
> देखरेख में हुआ है. वह क़यामत की रात (जिस रात को मीडिया स्कैन पूरा हुआ) , अंक
> के साथ थे. लेख जुटाने में उनके कहने पर जो मदद बन पाई हमने की. लेकिन वह लेख
> भी लाकर गिरीन्द्र के झोले में ही डाला गया. ( आपने लिखा है - अतिथि संपादक
> होने के नाते गिरीन्द्र ने अपनी तरफ से लोगों को लिखने के लिए कहा। लोगों ने
> उसके कहने पर लिखा भी। बाद में उसने एरेंज करके मीडिया स्कैन के लिए स्थायी रुप
> से काम करनेवालों को सौंप दिया।) अपने मन की लिखने से पहले विनीत भाई आप एक बार
> बतिया लेते - मुझसे बतियाने में हर्ज था तो तनिक गिरिन्द्र (09868086126) का
> नंबर ही मिला लेते तो अच्छा होता.
>
> ---- आशीष कुमार 'अंशु'
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