[दीवान]जनेवि का तुग़लक़ी फ़रमान

ravikant ravikant at sarai.net
Fri Apr 2 15:39:35 IST 2010


Forwarded message ----------
From: Prakash K Ray <pkray11 at gmail.com>
Date: 2010/4/2
Subject: JNU
To: ashish k singh <filmashish at gmail.com>


जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि विश्वविद्यालय विचारों की अनजानी परतों की पड़ताल और 
सत्य की खोज की जगहें हैं, जहाँ मानवता के उच्चतर आदर्शों की ओर यात्रा निरंतर चलती है. 
नेहरु के इन शब्दों को बुनियादी मूल्य मानने वाले और उन्हीं के नाम पर स्थापित दिल्ली के 
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में इन दिनों प्रशासन और उसे निर्देशित करनेवाली केंद्र 
सरकार हर तरह के जनवादी अधिकारों को छीनने का लगातार प्रयास कर रही है.

दो साल पहले केंद्र सरकार के वकील ने जेएनयू के छात्र संघ चुनावों पर रोक लगाने की याचिका 
दी थी. उसके बाद से विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं. इस स्थिति का फायदा 
उठाते हुए पिछले कुछ समय से कई ऐसी नीतियाँ लागू की गयी हैं जो व्यापक छात्र हित में नहीं 
हैं, जैसे कि फीस बढ़ोतरी, दलितों-पिछड़ों की आरक्षित सीटों को न भरना, आदि.  इसी क्रम 
में जेनयू प्रशासन ने इस हफ़्ते एक तुगलकी फरमान जारी किया जिसके तहत 'राष्ट्रीय एकता और 
राष्ट्रीय सुरक्षा' के लिये 'संवेदनशील' मुद्दों पर सभाएं करने पर पाबन्दी लगा दी गयी. 
साथ ही ऐसी फिल्मों और वृत्तचित्रों को दिखाने पर भी रोक लगा दी गयी है, जिन्हें सेंसर 
बोर्ड ने पास न किया हो. यह निर्णय लेने से पहले प्रशासन ने किसी भी स्तर पर 
छात्र-प्रतिनिधियों से बातचीत नहीं की.

दिलचस्प बात यह भी है कि प्रशासन ने 'राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा' के लिये 
'संवेदनशील' क्या हो सकता है, इसे स्पष्ट करने की कोई कोशिश नहीं की है. उसने इस तथ्य 
को भी परे रख दिया कि किसी भी मुद्दे पर बात करना और अपनी राय रखना किसी भी 
नागरिक का मौलिक अधिकार है. इस फरमान में फ़िल्म दिखाने को लेकर बने कानूनों की भी 
अनदेखी की गयी है. छात्रों या छोटे समूहों के बीच अव्यावसायिक फ़िल्में दिखाने के लिये किसी 
सर्टिफिकेट की ज़रुरत नहीं होती. आज के तकनीक के दौर में जहाँ हर हाथ में कैमरे और कंप्यूटर 
हैं, सेंसर का राग अलापना या तो बेवकूफी है या फिर गहरी साज़िश.

लेकिन इस फैसले के लिये सिर्फ़ विश्वविद्यालय प्रशासन को कोसना इसकी गंभीरता को कम करके 
आंकना होगा. इस फैसले को हमें यूपीए सरकार द्वारा लगातार जाहिर की जा रही 'आन्तरिक 
सुरक्षा' की चिंता के साथ जोड़ कर देखना होगा. अब तक उसके लिये 'आंतरिक सुरक्षा' का 
ख़तरा गांवों-जंगलों में होता था. अब यह भय शैक्षणिक परिसरों तक पहुँच गया लगता है. पिछले 
दिनों उस्मानिया युनिवर्सिटी में सुरक्षा बलों की तैनाती इसका उदहारण है और जेएनयू 
प्रशासन का हालिया फ़रमान उसका विस्तार है. इस मसले पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों की 
चुप्पी भी अफसोसनाक है.

प्रकाश कुमार राय
(दैनिक भास्कर के २ अप्रैल के अंक में प्रकाशित)
 

-- 
Prakash K Ray
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orry forgot about the dictionary.


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