[दीवान]हंस संगोष्ठी में लगे नारे- विभूति,मेहता मुर्दाबाद! मुर्दाबाद,मुर्दाबाद!

Chandan Srivastawa chandan at csds.in
Mon Aug 2 12:50:39 IST 2010


दीवान के दोस्तों से गुजारिश कि विभूति नारायण का उक्त इंटरव्यू कोई दीवान
मेलिंग लिस्ट के लिए भी मुहैया करा दे..

अभिवादन

2010/8/2 ved prakash <ved1964 at gmail.com>

> प्रिय साथियो,
> हंस की गोष्ठी निश्चित ही काफी स्तरहीन ही थी, विषय की अपेक्षा थी कि किन्हीं
> समाजशास्त्री या राजनीतिशास्त्री को बुलाया जाए तथा गंभीरता पूर्वक इस समस्या
> पर सवाल-दर-सवाल बहस की जाए. लेकिन आजकल वक्ताओं में अजीब अहं है कि वे अपनी
> बात कहकर चलते बनते हैं, और जो सवाल वे उठाते हैं उन पर दूसरे पक्ष को सुनने का
> धैर्य नहीं रखते. ऐसा ही एक नाटक रमणिका गुप्ता फाउंडेशन द्वारा साहित्य
> अकादेमी के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में देखने को मिला. मस्तराम कपूर ने
> अपनी बात रखी, श्रोताओँ को संवाद की नसीहतें दीं और चलते बने.
>
> हंस की गोष्ठी में विभूति नारायण राय ने पूरी तरह सरकार के पक्ष का समर्थन
> किया वे ठीक ही विश्वरंजन की प्रौक्सी थे. लेकिन अन्य वक्ताओं में से भी कोई
> तैयारी के साथ आया हो, और तर्कसंगत ढंग से अपनी बात रखे, ऐसा नहीं लगा.
>
> मज़े की बात यह है कि बुद्धिजीवियों की बैठक में महफिल लूट ले गए स्वामी
> अग्निवेश. अपने निजी अनुभवों को सुनाते सुनाते पूरा घंटा सर्फ कर दिया और यार
> लोग न केवल झेल गए बल्कि तालियों द्वारा उनका उत्साह भी बढ़ाते रहे.
>
> जब हमारे बुद्धिजीवी बिना तैयारी के आएँगे तो ऐसे ही रंग देखने को मिलेंगे.
>
> आपका,
> वेद प्रकाश
>
> 2010/8/1 vineet kumar <vineetdu at gmail.com>
>
>> <http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/TFTvZZOcvwI/AAAAAAAACHM/A9rjGo76XDA/s1600/hans.PNG>
>> *हिंदी लिटरेचर की दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच कही जानेवाली
>> पत्रिका हंस की संगोष्ठी में जो नजारा हमने देखा, उससे एक साथ कई चीजें तार-तार
>> हो गयीं। इस संगोष्ठी को मैं अपनी याददाश्त बरकरार रहने तक लोकतंत्र के मूल्यों
>> की सरेआम धज्जियां उड़ानेवाली संगोष्ठी के तौर पर याद रखूंगा। ये मैंने अपने
>> अकादमिक जीवन में पहली बार देखा कि किसी संगोष्ठी में वक्ता अपनी बात कहने के
>> तुरंत बाद ही दर्शकों की चिंता किये बगैर मंच से नीचे उतरकर फील्डिंग करने लग
>> गये। मंच की कुर्सियां एक-एक करके खाली होने लग जाती हैं। मंच संचालक का मंच,
>> उस पर स्थापित लोगों और माहौल से पकड़ फिसलकर चुप्पी की नाली में जा गिरती है।
>> वो विश्वरंजन की स्टेपनी के तौर पर आये विभूति नारायण राय से लाख अपीलें करते
>> हैं कि मंच पर बने रहें लेकिन हजारों छात्रों को अनुशासन का पाठ पढ़ानेवाले,
>> फैकल्टी को ठोक-पीटकर अपने काम लायक बनानेवाले विभूति नारायण इसकी परवाह किये
>> बगैर सीधे गेट की तरफ बढ़ते हैं। सभागार में बैठी ऑडिएंस इसे सीधा-सीधा अपना
>> अपमान मानती है और हंगामा मच जाता है। उनकी सिर्फ इतनी ही मांग होती है कि हमने
>> आपको इतनी देर तक बैठकर सुना, हमारे पास कुछ सवाल हैं, आप उन सवालों के जवाब
>> दिये बगैर नहीं जा सकते। जाहिर है महीनों से महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय
>> विश्वविद्यालय में जो कुछ भी चल रहा है, उसे लेकर कई सवाल बनते हैं*।
>>
>>
>> <http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/TFTqzBLmNSI/AAAAAAAACG0/uTXojxScb_c/s1600/Vibhuti-Narayan-Rai-Sketch.jpg>
>>  *
>> *
>> *जिन ऑडिएंस ने* अगस्त महीने के नया ज्ञानोदय में उनका इंटरव्यू पढ़ा होगा,
>> वो सवाल करना चाह रहे होंगे कि आखिर आपने किस अधिकार से कह दिया कि हमारी
>> लेखिकाओं में अपने को एक-दूसरे से ज्यादा से ज्यादा छिनाल साबित करने की होड़
>> है। उपन्यास का नाम ‘कितनी बिस्तरों पर कितना बार’ होना चाहिए, बताया। ये मसला
>> पॉपुलरिटी स्टंट बोलकर नजरअंदाज करने का नहीं बल्कि उनसे जबाबतलब करने का है।
>> ये मामला उनके इस्तीफे की मांग तक जा सकता है। सामूहिक तौर पर माफी मांगने पर
>> जा सकता है। ये एक ऐसे विश्वविद्यालय के वीसी की भाषा कैसे हो सकती है, जहां
>> वेब पर हिंदी के पन्ने तैयार करने के लाखों रूपये के ठेके दिये जाते हैं, हिंदी
>> शब्दकोश के विस्तार के लिए दर्जनों आदमी काम पर लगाये जाते हैं, जहां एमए
>> स्त्री अध्ययन का अलग से कोर्स चलाया जा रहा हो? इन सारे सवालों को अगर ये कहकर
>> नकारा भी जाता कि सेमिनार में जो कहा है, उससे सवाल करें तो भी विभूति नारायण
>> राय को इस सवाल का जवाब तो देना ही पड़ता कि आप स्टेट मशीनरी के कुचक्र को
>> ताकतवर बताकर किसी न किसी रूप में उसको डीफेंड क्यों कर रहे हैं? उनसे ये सवाल
>> तो किया ही जाता कि आप संगोष्ठी, अकादमिक और कोतवाली की भाषा के फर्क को किस
>> रूप में लेते हैं? लेकिन विभूत नारायण ने किसी का मान नहीं रखा। न मंच का, न
>> संचालक का, न हंस का। पूरी संगोष्ठी में प्रेमचंद सिर्फ बैनर पर ही छपा रह गया,
>> किसी की जुबान से एक बार भी प्रेमचंद नहीं निकला। नहीं तो जिन मूल्यों को
>> सहेजने की कोशिशें और दावे हंस के मंच से किया जाता रहा है, उन तमाम मूल्यों को
>> ठोकर मारकर विभूति नारायण ने छितरा दिया – होरी के वंशजो, इसे तुम एक-एक करके
>> चुनो, समेटो। इस पूरे रवैये से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस माहौल के भीतर
>> वर्धा विश्वविद्यालय की फैकल्टी काम करती है? ये सोचते हुए भी सिहरन होती है कि
>> वहां के स्टूडेंट किस जम्‍हूरित के शिकार हैं, कैसे अपनी असहमति के स्वर को रख
>> पाते होंगे? विश्वविद्यालय की जो कुछ खबरें अब तक हमारे सामने आयी हैं, हमारे
>> भीतर एक उसी किस्म की बेचैनी पैदा होती है, आज विभूति नारायण को सुनते हुए ये
>> बेचैनी और बढ़ गयी जो बेचैनी हमें मिर्चपुर में सुमन और उसके बाप को जिंदा जला
>> देने की खबर से हुई थी। इस गहरी रात में, ये लाइन लिखते हुए मैं वर्धा के
>> छात्रों से मिलने के लिए बेचैन हो रहा हूं। एक अकेला शख्स लोकतंत्र की ताकत
>> पाकर किस हद तक अलोकतांत्रिक, अमर्यादित हो सकता है, इसका नमूना आज हमें लाइव
>> देखने को मिला।
>>
>>
>> <http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/TFTr0rT18XI/AAAAAAAACG8/aQuScUpgXv4/s1600/alok-mehta.jpg>
>> लोकतंत्र की धज्जियां तब भी भयानक स्तर पर उड़ायी गयीं, जब आलोक मेहता जैसा
>> पत्रकार (जिनके पत्रकारीय कर्म को अगर पीआर, लॉबिइंग की परिभाषा के हिसाब से
>> समझें तो वो इसके ज्यादा करीब होगी) हेमचंद्र पांडे के मामले में हत्या की अगली
>> सुबह कहता है कि वो नई दुनिया के लिए काम नहीं करता था, उसका इससे कोई संबंध
>> नहीं था – पता नहीं किस हैसियत से अपने को डीफेंड करने के लिए मंच पर काबिज
>> होने की कोशिश करता है। स्वामी अग्निवेश ने जब माओवादियों और सरकार के बीच
>> बातचीत की पहल के संदर्भ में अपनी बात शुरू की, तभी पत्रकार हेमचंद्र का नाम
>> आया और उन्होंने नई दुनिया अखबार का नाम लिया कि उसके संपादक ने इससे अपना
>> पल्ला झाड़ लिया। एक तरफ सेकंड लास्ट की सीट पर बैठे आलोक मेहता पर लोगों की
>> नजर गयी और मोहल्लालाइव के मॉडरेटर ने कहा कि संपादक खुद यहां बैठे हैं, उन्हीं
>> से पूछ लिया जाए। आलोक मेहता की तरफ से एक शख्स बोलने की अनुमति लेने की चीट
>> लेकर राजेंद्र यादव के पास जाता है और उन्‍हें बोलने की अनुमति मिल जाती है।
>>  *आलोक मेहता तीन-चार* मिनट तक दायें-बायें करते हैं। पीछे बैठे लोग उनसे
>> मुद्दे यानी हेमचंद्र पर बात करने के लिए कहते हैं। *(आलोक मेहता की वॉयस
>> डिलीवरी आमतौर पर बहुत सॉफ्ट है। ये चैनल में सॉफ्ट स्टोरी या इंटरटेनमेंट की
>> खबरों के लिए बहुत ही परफेक्ट है। मीडिया इंडस्ट्री में ऐसे पत्रकारों की पूरी
>> की पूरी एक जमात है, जिनकी आवाज को ऐसी स्टोरी के वीओ (वॉयस ओवर) के लिए काम
>> में लाया जा सकता है। बहरहाल…)* ऑडिएंस के दबाब के बीच आलोक मेहता का स्वर
>> अचानक से ऊंचा होने लग जाता है और धीरे-धीरे अंदाज के स्तर पर विभूति नारायण के
>> स्वर के साथ एकाकार हो जाता है। ये कोई चैनल की बहस नहीं थी, जिससे कि आप एंकर
>> पर तोहमत जड़कर मुक्त हो जाएं कि वो कहते ही हैं मामले को गर्म करने के लिए। ये
>> एक विमर्श का मंच था, जिस पर कि इरा झा ने अपनी रिपोर्टिंग की बातें शेयर की,
>> आदित्य निगम ने स्टेट लेजिटिमेसी की बात गंभीरतापूर्वक रखा, रामशरण जोशी अपनी
>> क्षमता के अनुसार जितना बेहतर कर सकते थे, कोशिश की। लेकिन आलोक मेहता की आवाज
>> अचानक से रामलीला मैदान की हो जाती है। अगर मैं गलत मिलान कर रहा हूं तो संभव
>> है कि नई दुनिया के पत्रकार भाई इसे चैंबर में किसी पत्रकार से बात करने के
>> अंदाज से इसका मिलान कर सकते हैं।
>>  *आलोक मेहता ने जो* तर्क दिया वो न केवल कमजोर और लचर था बल्कि मनोहरश्याम
>> जोशी, राजेंद्र माथुर की परंपरा से अपने को जोड़कर उनकी बराबरी में अपने को
>> खड़ा करने की कोशिश की। कहा कि नाम बदलकर अगर हेमचंद्र ने लिखा तो वो इतने महान
>> तो हैं नहीं कि पता कर लेते। उन्होंने अपने को इस बिना पर जस्‍टीफाइ करने की
>> जबरदस्ती की कि ऐसा पहले भी हुआ है। ऑडिएंस का धैर्य कंट्रोल से बाहर होने को
>> आया। वो सीधे-सीधे उनसे जबाब चाह रही थी। लेकिन जो आलोक मेहता दो मिनट बोलने का
>> समय मांग रहे थे, उऩ्हें दो घंटे भी बोलने को दिया जाता तो भी कुछ न बोलते।
>> गोल-मोल बातें करके बीच में अपने को बिग शॉट साबित करने की कोशिश आलोक मेहता की
>> वाचन शैली का हिस्सा है। ऐसा करते हुए मैं दसियों बार देख चुका हूं। लेकिन
>> पत्रकार बिरादरी के बीच शायद ही कोई सवाल कर पाता है। यही काम उन्होंने पिछले
>> दिनों उदयन शर्मा की याद में हुई संगोष्ठी के मामले में किया। बात हो रही थी
>> पेड न्यूज की और बयान दिया कि वो बिहार के मुजफ्फरपुर जैसी जगह में पत्रकारिता
>> कर चुके हैं। उन्हें दोस्तों की नसीहतें याद आती, सुरक्षा को लेकर चौकस होने की
>> बात करते कि उन्होंने मेले से लोहे की एक खुरपी खरीदी थी। बहरहाल…
>>  *अभी तक हमने* किसी भी पत्रकार को इस तरह सार्वजनिक रूप से बेआबरू होते
>> नहीं देखा है। ऑडिएंस के वाजिब गुस्से से आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि
>> सत्ता के गलियारों में चमकनेवाले सफल पत्रकार और होते हैं और जो लोगों के दिलों
>> पर राज करते हैं, वो और ही पत्रकार होते हैं। ऐवाने गालिब जैसे भरे सभागार में
>> हमें एक शख्स भी ऐसा नहीं मिला, जिसने ये कहा कि अरे बैठ जाइए, मेहता साहब को
>> बोलने दीजिए। ये अलग बात है कि उसी सभागार में आलोक मेहता के कूल्हे के नीचे
>> काम करनेवाले नई दुनिया के पत्रकार भी मौजूद थे और मीडिया की नामचीन हस्तियां
>> भी। एक भी स्वर, एक भी हाथ आलोक मेहता के पक्ष में न सही, बोलने देने के आग्रह
>> के लिए नहीं उठे। ये नजारा तत्काल कई चीजें एक साथ साफ कर देता है। आप इस घटना
>> से अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या स्थिति है? आलोक मेहता मंच से बार-बार कहते हैं
>> कि मैं मानता हूं कि पत्रकारिता का पतन हुआ है। पीछे से आवाज आती है –
>> पत्रकारिता का नहीं आपका पतन हुआ है। सत्ता के साथ टांग पर टांग चढ़ाकर
>> पत्रकारिता करने से पत्रकार की हैसियत क्या रह जाती है, ये समझने के लिए इस
>> घटना से बेहतर नमूना शायद ही कभी आपको देखने को मिले होंगे।
>>  *मंच संचालक ने* कार्यक्रम शुरू होते ही सारे वक्ताओं से अनुरोध किया कि
>> आपलोग अपनी बात संक्षेप में रखें ताकि सवाल-जबाब के लिए ज्यादा से ज्यादा समय
>> मिल सके। विभूति नारायण ने भी ये कहते हुए कम बोला कि सवाल-जवाब के दौरान नयी
>> बातें सामने आएगी लेकिन जब एक-एक करके वक्ता मंच से खिसकते चले गये तो सवाल
>> किससे किया जाता?
>>  *यह एक गैरलोकतांत्रिक* किस्म की संगोष्ठी थी, जिसमें कि एक बड़े
>> पढ़ने-लिखनेवाले वर्ग का सीधा-सीधा अपमान हुआ। जिन मूल्यों, जिन फ्लेवर को
>> बचाने के लिए इस तरह की संगोष्ठियां आयोजित की जाती हैं, वो इस गोष्ठी में बुरी
>> तरह छितरा गया। राजेंद्र यादव की तरफ कैमरा बढ़ता है। वो उदासी से जवाब देते
>> हैं – अब किसके लिए कर रहे हो, जिनका लेना था वो तो गए… “वैदिकी हिंसा हिंसा न
>> भवति” पर बात करने जुटे लोग बहुत कुछ खत्म हो जाने के बोध के साथ बाहर निकले।.
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