[दीवान]सदाचारऔरछिनार

ravikant at sarai.net ravikant at sarai.net
Sun Aug 15 15:42:53 IST 2010


भैया अविनाश,

एक शब्द के कई शब्दार्थ या
रूपकार्थ हो सकते हैं मैंने
इसके हल्के अर्थ की ओर इसलिए
इशारा किया था कि हमारा
'गुरु-गंभीर पॉलिटिकली करेक्ट'
हिन्दी जनपद थोड़ा ये सोचे कि
वह अपनी पॉलिटिकली इन्करेक्ट
जड़ों से दूर होकर साफ़-सुथरा
बनने की कोशिश करते हुए कितना
हास्यास्पद हो जाता है कि कभी
कृष्ण बलदेव वैद फ़ोहश साबित
होते हैं, कभी अशोक चक्रधर को
जोकर माना जाता है। कभी उदय
प्रकाश को सूली पर चढ़ा दिया
जाता है। कभी विक्रम सिंह को
लेकर अनावश्यक अटकलपच्ची की
जाती है। कुल मिलाकर यह माहौल
घुटन पैदा करता है, इस तरह की
स्थिति में भाषा का रचनात्मक
इस्तेमाल न करके लोग एक
सेंसरशिप से डरकर जिएँगे, जो
कुल मिलाकर साहित्य और
प्रतिबद्धता दोनों के लिए
मुश्किलें पैदा कर सकता है। अब
जहाँ तक इन कोशों की बात है तो
सहज-समांतर कोश थिसॉरस है,
जिसमें हर शब्द दूसरे का एकदम
पर्यायवाची नहीं होता, और
अलायड को मैं गंभीरता से नहीं
लेता,चाहे कमलकिशोर गोयनका
कहें या तुम कहो, क्योंकि अपनी
देसी हिन्दी और अंग्रेज़ी
दोनों पर मुझे काफ़ी भरोसा है।
अगर उलटना ही है तो फ़ैलन का कोश
उलटकर देखो, अगर तुम्हें अपनी
देसी ज़बान की छटा या उनकी
स्मृति पर भरोसा नहीं रहा। यह
लगभग उसी तरह की सेंसरशिप है
जिसके चलते आजकल आप जातिवाचक
नाम नहीं ले सकते, भले ही जाति
की हक़ीक़त से हमेशा त्रस्त
रहते हों।

रविकान्त   

On Sun, 15 Aug 2010 14:23:59 +0530 avinash das <avinashonly at gmail.com> wrote

> *रविकांत जी के लिए*
> 
> विभूति का यह कथन गलत है कि
‘छिनाल’ का अर्थ वेश्या नहीं
है। अरविंद कुमार के
> ‘सहज समांतर कोश’ में ‘छिनाल’
का अर्थ कुलटा और वेश्या दिया
गया है, जिसका इसी
> शब्दकोश में ‘अवैध यौन संबंध
रखने वाली स्त्री’,
‘दुराचारिणी’, ‘पतुरिया’,
> ‘हरजाई’ और ‘कुतिया’ तक का
> अर्थ दिया गया है। अलाइड के
> प्रसिद्ध हिंदी-अंग्रेजी
> कोश में ‘छिनाल’ के लिए
> ‘प्रोस्टिट्यूट’ शब्द मौजूद
> है। हिंदी विश्वविद्यालय का
> कुलपति इस अर्थ को नहीं जानता
और बिना जाने ही उसका प्रयोग
करता है, क्या यह
> मानने योग्य बात है? जाहिर है,
> विभूति इस अर्थ के प्रति
> अनभिज्ञता दिखा कर अपनी
> रक्षा ही कर रहे हैं। लेकिन
दुर्भाग्य से वे अगले ही वाक्य
में इस छिनालत्व को
> स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि
‘कितने बिस्तरों पर कितनी बार’
लेखिका की आत्मकथा
> का शीर्षक हो सकता था। यानी वे
खुद ‘छिनाल’ शब्द का वही अर्थ
ले रहे हैं जो
> शब्दकोशों में है और जो हिंदी
समाज समझता है।
> 
> *आज के जनसत्ता में कमल किशोर
गोयनका के लेख से उधार...*
> 
> 2010/8/15 ravikant at sarai.net <ravikant at sarai.net>
> 
> > माफ़ी अभय...
> >
> > ..की परवाह किए बग़ैर किया।
> > उन्हें कहना चाहिए कि जिस तरह
> > 'कौए के टरटराने से धान का
सूखना
> > बंद नहीं हो जाता'; हम जो
मर्ज़ी
> > लिखेंगे, जितना लिखा है, उससे
भी
> > ज़्यादा लिखेंगे, और विभूति
> > नारायण या कोई भी कुछ कह ले, हम
> > तो बेबाक लिखेंगे! जब तक हम
ऐसा
> > नहीं कहते दोनों पक्षों की
> > बातों में कोई मूलभूत अंतर
> > करना मुश्किल है।
> >
> > रविकान्त
> >
> >
> > On Sun, 15 Aug 2010 12:42:01 +0530 "ravikant at sarai.net" <
> > ravikant at sarai.net>
> > wrote
> >
> > > गतांक से आगे...
> > >
> > > जैसा कि मैं आपके शब्दचर्चा
> > > समूह पर कह रहा था कि कम-से-कम
> > > बिहार की ज़बानों में ये
शब्द
> > > स्त्री-पुरुष दोनों के लिए
> > > इस्तेमाल होता है, और
> > > चुहलबाज़ी के अर्थ में,
> > > छेड़-छाड़ करनेवालों के लिए,
> > और
> > > गाली के अर्थ में भी। 'वेश्या'
> > > वाली नैतिक निंदा का वज़न
> > > इसमें नहीं है। आपने सही कहा
> > कि
> > > अंग्रेज़ी तर्जुमा में बात
> > > ज़्यादा बिगड़ गई है। लोग
> > > कहेंगे कि 'कितने बिस्तरों
में
> > > कितनी बार'से उनकी बात पुष्ट
> > > होती है लेकिन मसला इतना
नहीं
> > > है।
> > >
> > > जैसे मायावती को ये नसीहत
देने
> > > से पहले लोग ये नहीं सोच पाते
> > कि
> > > जातिवाद के ख़िलाफ़ जंग का
> > > रास्ता जाति के रणक्षेत्र से
> > > ही जाता है, वैसे ही
> > > स्त्री-दैहिकता में लिपटी
> > > पुरुष नैतिकता के पर्दाफ़ाश
> > का
> > > रास्ता स्त्री देह की मुक्ति
> > के
> > > ज़रिए ही संभव है, जिस पर लेखन
> > कई
> > > लेखक-लेखिकाओं ने नैतिक
> > > ठेकेदारो
> > >
> > > On Sun, 15 Aug 2010 12:25:38 +0530 "ravikant at sarai.net" <
> > ravikant at sarai.net>
> > > wrote
> > >
> > > > बहुत ख़ूब अजय,
> > > >
> > > > कल लगभग यही बात हो रही थी
> > दो-एक
> > > > दोस्तों से। दीवान डाक सूची
> > से
> > > > यही उम्मीद भी की जाती है
> > > > सनसनीख़ेज़ बना दी गई
घटनाओं
> > > > पर यहाँ ठहर कर सोचा जाए न कि
> > > > बग़ैर पढ़े-लिखे, सोचे-समझे
इस
> > > > या उस अभियान की वकालत कर दी
> > > > जाए। क्योंकि ऐसे लोगों
> > भतेरे
> > > > हैं हिन्दी जनपद में जो
नैतिक
> > > > झंडा लेकर अपनी शर्तों पर आज
> > > > भगवान गढ़ते हैं, और कल अगर
उस
> > > > भव्य गगनचुंबी आसन से गिर
जाए
> > > > तो उसे संगसार करने से नहीं
> > > > चूकते हैं - मध्यकालीन
> > > > भीड़तंत्र को फ़ौरी न्याय
> > > > चाहिए। अपने गिरेबान में भी
> > > > नहीं देखते लोग, कुछ करने से
> > > > पहले।
> > > >
> > > > शब्दचर्चा पर ये बात भी चली
थी
> > > > कि 'छिनाल' शब्द समदर्शी है
> > > > कम-से-कम मगही मे
> > > >
> > > >
> > > > On Thu, 12 Aug 2010 16:47:43 +0530 "Abhay Tiwari" <abhaytri at gmail.com>
> > > > wrote
> > > >
> > > > > सदाचार और छिनार
> > > > >
> > > > >
> > > > > हिन्दी जगत आजकल एक नैतिक
> > > > > अत्याचार की भावना से उबल
> > रहा
> > > > > है। निन्दा और भर्त्सना
> > > > > प्रस्ताव निकाले जा रहे
हैं,
> > > > > ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के
> > नारे
> > > > > लगाए जा रहे हैं। आप समझ ही
गए
> > > > > होंगे कि मैं विभूति
नारायण
> > > > > राय के कुख्यात बयान और
उससे
> > > > > उपजी प्रतिक्रियाओं की बात
> > > कर
> > > > > रहा हूँ। इसके पहले कि मैं
> > > > > अपनी बात रखूँ मैं मैरी ई
जौन
> > > > > नाम की एक नारीवादी के एक
> > ईमेल
> > > > > का उद्धरण देना चाहूँगा।
वे
> > > > > इसी विवाद के सन्दर्भ में
> > > > > लिखती हैं-
> > > > >
> > > > >
> > > > > "हम उस नैतिक आघात से सहमत
> > > नहीं
> > > > > है जो वेश्यावृत्ति या
> > > बेवफ़ाई
> > > > > के उल्लेख भर से मीडिया में
> > > > > आता रहा है। बल्कि हम यक़ीन
> > > > > करते हैं कि यौनिकता के
मसले
> > > > > गम्भीर मसले हैं, जिन पर और
> > > > > सार्वजनिक बहस और समझदारी
की
> > > > > ज़रूरत है। नारीवाद के
नज़रिये
> > > > > से यौनिकता के मामले को और
> > > > > समझने के लिए हमें राय जैसे
> > > > > लेखकों को चुनौती देनी
> > > चाहिये
> > > > > ना कि सार्वजनिक नैतिकता
में
> > > > > उलझना चाहिये।"
> > > > >
> > > > >
> > > > > मैरी जौन ने सहज रूप से इस
> > > > > मामले के मूल में बैठी
> > समस्या
> > > > > को रेखांकित कर दिया है।
> > मेरी
> > > > > नज़र में हिन्दी जगत से अभी
तक
> > > > > एक भी प्रतिक्रिया ऐसी
नहीं
> > > आई
> > > > > जिसने इस मसले को नैतिक
> > > > > अतिक्रमण से अलग किसी
नज़रिये
> > > > > से देखने की कोशिश की हो।
> > > > > उपकुलपति महोदय ने कहा,
> > > > > “लेखिकाओं में होड़ लगी है
यह
> > > > > साबित करने के लिए उनसे
बड़ी
> > > > > छिनाल कोई नहीं है।” उसके
> > > जवाब
> > > > > में कहा गया “..लेखिकाओं के
> > > > > बारे में अपमानजनक
वक्तव्य..
> > न
> > > > > केवल हिंदी लेखिकाओं की
> > > गरिमा
> > > > > के खिलाफ है, बल्कि उसमें
> > > > > प्रयुक्त शब्द
स्त्रीमात्र
> > > > > के लिए अपमानजनक है।”
> > > > >
> > > > >
> > > > > देखने में दोनों एकदम
विपरीत
> > > > > बयान मालूम देते हैं मगर एक
> > > > > जगह जाकर दोनों एक हो जाते
> > > हैं-
> > > > > राय जब वर्तमान स्त्रीलेखन
> > > को
> > > > > छिनाल के अपमानजनक विशेषण
से
> > > > > नवाजते हैं तो वे छिनाल का
> > > > > इस्तेमाल इस अर्थ में करते
> > > हैं
> > > > > कि छिनालपन एक निन्दनीय
> > > कृत्य
> > > > > है जिस से बचा जाना चाहिये।
> > और
> > > > > दूसरी तरफ़ उनका विरोध
करने
> > > > > वाले इस बात पर आपत्ति करते
> > > > > हैं कि राय गरिमामय हिन्दी
> > > > > लेखिकाओं के लिए 'छिनाल'
जैसा
> > > > > अपमानजनक शब्द कैसे प्रयोग
> > > कर
> > > > > सकते हैं? ‘छिनाल’ के
> > > अपमानजनक
> > > > > होने पर दोनों की सहमति है!
> > > > > दोनों ही परोक्ष रूप से मान
> > > > > रहे हैं कि स्त्री का
वांछित,
> > > > > नैतिक रूप 'सती-सावित्री'
> > वाला
> > > > > ही है।
> > > > >
> > > > >
> > > > > एक और मज़े की बात यह है कि
एक
> > > > > पेटीशन जो राय साहब को
हटाने
> > > > > के लिए नेट पर चलाया जा रहा
> > है,
> > > > > उस में और अंग्रेज़ी प्रेस
> > में
> > > > > भी इस छिनार शब्द का अनुवाद
> > > > > प्रौस्टीट्यूट किया गया
है।
> > > > > जो निहायत ग़लत है।
> > > > > प्रौस्टीट्यूट के लिए
रण्डी
> > > > > या वेश्या शब्द है। रसाल जी
> > के
> > > > > कोष में छिनार का अर्थ है
> > > > > व्यभिचारिणी, कुलटा,
> > > > > परपुरुषगामिनी, और इसकी
> > > > > उत्पत्ति छिन्ना+नारी से
> > > बताई
> > > > > गई है। इन्ही में इस शब्द की
> > > > > पूरी राजनीति छिपी हुई है,
वो
> > > > > राजनीति जो इस शब्द की आड़
> > लेकर
> > > > > महिला लेखकों पर हमला करने
> > > > > वाले विभूति नारायण राय और
> > > > > उनका उच्च स्वर से विरोध
> > करने
> > > > > वाले तथाकथित प्रगतिशीलता
> > के
> > > > > ठेकेदारों को एक ज़मीन पर
खड़ा
> > > > > कर देती है।
> > > > >
> > > > >
> > > > > वैवाहिक सम्बन्ध से इतर
> > > दैहिक
> > > > > सम्बन्ध बनाने से जिसका
> > > > > चरित्र खण्डित होता हो, वह
है
> > > > > छिनाल। हज़ारों सालों तक
थोड़े
> > > > > से भी दैहिक विचलन की कड़ी
से
> > > > > कड़ी सज़ा स्त्री को दी
जाती
> > रही
> > > > > है हर समाज में। आज भी कई
समाज
> > > > > ऐसे हैं जहाँ किसी भी
‘अवैध’
> > > > > सम्बन्ध की सज़ा अकेले
नारी
> > को
> > > > > ही मिलती है, पुरुष को कुछ
> > > > > नहीं। इसी तरह के दोहरे
> > > > > व्यवहार, दोहरी नैतिकता का
> > > > > नतीजा है यह छिनार का शब्द।
> > > > >
> > > > >
> > > > > स्त्री को अपने शरीर का
> > > > > स्वामित्व नहीं है। आज भी
कई
> > > > > समाज व नैतिक परम्पराएं
उसे
> > > > > गर्भनिरोध या गर्भपात नहीं
> > > > > कराने देतीं। कई उसे परदे
से
> > > > > बाहर नहीं आने देतीं।
स्त्री
> > > > > सम्पत्ति है इसीलिए उसका
> > > > > ‘स्वामी’ होता है, उसका
> > ‘पति’
> > > > > होता है। उसकी कोख पर उसका
> > > > > नहीं उसके स्वामी का
अधिकार
> > > > > है। इसीलिए अगर वह किसी
अन्य
> > > > > से यौन सम्बन्ध बनाये या
> > > > > गर्भधारण करे तो पापचारिणी
> > > > > कहलाती है। और सन्तान भी
> > > > > नाजायज़ हो जाती है। बहुत
हाल
> > > > > तक सन्तान की माता के प्रति
> > ही
> > > > > पूरे सत्यापन से कहा जा
सकता
> > > > > था, पिता के प्रति हरगिज़
> > नहीं।
> > > > > मगर फिर भी अज्ञात पिता
होने
> > > > > से, या वैधानिक पति की
सन्तान
> > > न
> > > > > होने से सन्तान अवैध /
नाजायज़
> > /
> > > > > हरामी हो जाती थी/ है।
> > > > >
> > > > >
> > > > > गर्भनिरोध आदि के ज़रिये
आज
> > > > > स्त्री के लिए अपने शरीर पर
> > > > > स्वामित्व और अधिकार पाना
> > > > > मुमकिन हो गया है। इतिहास
> > में
> > > > > पहली बार, सारे प्राणियों
से
> > > > > अलग, आज औरत के लिए यह सम्भव
> > है
> > > > > कि वह बिना गर्भधारण की
> > चिंता
> > > > > किए दैहिक सुख ले सके जैसे
> > > > > आदमी लेता रहे हैं हमेशा।
> > > > > लेकिन ‘पुरुष’ मानसिकता उस
> > > की
> > > > > इस आज़ादी के साथ सहज नहीं
है;
> > > वह
> > > > > उसे मातृत्व और पत्नीत्व
के
> > > > > दायरे में ही क़ैद रखना
चाहता
> > > > > है, जहाँ स्त्री मनुष्य
नहीं,
> > > > > देवी होती है, सती-सावित्री
> > > > > होती है। स्त्री यदि भोग की,
> > > > > दैहिक आनन्द की बात करती है
> > तो
> > > > > लोग असहज हो जाते हैं; कहते
> > > हैं
> > > > > कि बाक़ी सब बात करो, ये मत
बात
> > > > > करो!
> > > > >
> > > > >
> > > > > अपने साक्षात्कार में राय
> > > > > कहते हैं “इस पूरे प्रयास
> > में
> > > > > दिक्कत सिर्फ इतनी है कि यह
> > > > > देह विमर्श तक सिमट गया है
और
> > > > > स्त्री मुक्ति के दूसरे
> > > > > मुद्दे हाशिये पर चले गए
> > > हैं।”
> > > > > मेरा मानना है कि यह सलाह
> > वैसे
> > > > > ही है जैसे कि बहुत सारे लोग
> > > > > मायावती की राजनीति से
> > > नाक-भौं
> > > > > सिकोड़ते हैं कि वे
'जातिवाद'
> > > > > फैला रही हैं। वे कहते हैं
कि
> > > > > आरक्षण की बात मत करो,
> > योग्यता
> > > > > की बात करो। इसी तरह राय कह
> > > रहे
> > > > > हैं “देह से परे भी बहुत कुछ
> > > > > ऐसा घटता है जो हमारे जीवन
को
> > > > > अधिक सुन्दर और जीने योग्य
> > > > > बनाता है” मेरा कहना है कि
> > > > > ज़रूर होगा और ज़रूर है मगर
जिस
> > > > > आधार से स्त्री वर्ग को
> > > हज़ारों
> > > > > सालों से पीड़ित किया गया
हो
> > वो
> > > > > थोड़ी आज़ादी मिलने पर उस
आधार
> > > > > की उपभोग न करे, तो ये कैसे
> > > > > आज़ादी है? स्त्री का शोषण
और
> > > > > उत्पीड़न उसकी देह के आधार
पर
> > > > > ही हुआ है, तो अब यह लाज़िमी
है
> > > > > कि उसकी आज़ादी के संक्रमण
> > में
> > > > > दैहिक विमर्श एक केन्द्रीय
> > > > > भूमिका में रहे। और फिर
सबसे
> > > > > बड़ी बात ये भी है कि
> > स्त्रियां
> > > > > स्वयं तय करेंगी कि वे किस
> > > > > बारे में लिखना चाहेंगी और
> > > किस
> > > > > बारे में नहीं।
> > > > >
> > > > >
> > > > > अंत में मैं एक बात यह भी
> > > > > कहूँगा कि इस मसले पर
विभूति
> > > > > नारायण राय के जो विचार हैं
> > > > > उनसे मैं ज़रूर असहमत हूँ,
मगर
> > > > > निजी तौर पर मुझे उनमें ऐसा
> > > > > कुछ भी नहीं लगता कि जिस पर
इस
> > > > > तरह का 'राजनीतिक' बावेला
खड़ा
> > > > > किया जाय। ये सब साहित्य की
> > > > > अन्दरूनी बहस के मसले हैं
इन
> > > > > पर ज़ोरदार बहस होनी
चाहिये न
> > > > > कि लोगों का मुँह बन्द करने
> > की
> > > > > कोशिशें। छिनाल जैसा शब्द
> > > > > अपमानजनक ज़रूर है और
'नैतिक'
> > > > > आधार पर ग़लत भी, परन्तु उसी
> > > > > नैतिकता के आधार पर जिसकी
> > ऊपर
> > > > > चर्चा की गई। दूसरी ओर
छिनार
> > > > > के समान्तर अंग्रेज़ी के
> > 'स्लट
> > > > > 'और 'बिच' जैसे शब्द,
अपमानजनक
> > > > > बने रहते हुए भी, सहज
> > इस्तेमाल
> > > > > में आ गए हैं और नारीवाद ने
भी
> > > > > उन के अर्थों को
> > > > > पुनर्परिभाषित कर के समाज
को
> > > > > अपना रवैया बदलने पर मजबूर
> > > > > किया है।
> > > > >
> > > > >
> > > > > पिछले दिनों रवीश कुमार ने
> > भी
> > > > > पंजाब में आए एक नए बदलाव को
> > > > > पकड़ा। हज़ारों सालों से
> > > > > उत्पीड़ित दलित सीना ठोंक
कर
> > > गा
> > > > > रहे हैं-अनखी पुत्त चमारा
> > दे।
> > > > > जबकि दलित मामलों के प्रति
> > > > > संवेदनशील उत्तर प्रदेश
में
> > > > > इसी शब्द के इस्तेमाल पर
सज़ा
> > > > > हो सकती है।
> > > > >
> > > > >
> > > > > हिन्दी समाज की नैतिकता के
> > > > > रखवाले शब्दों के प्रति
कुछ
> > > > > अधिक ही संवेदनशील है और
> > समाज
> > > > > के 'सदाचार उन्नयन अभियान'
> > में
> > > > > संलग्न हैं। उल्लेखनीय है
कि
> > > > > शब्दों को लेकर सदाचारी और
> > > > > असहिष्णु रवैये की एक
> > > > > अभिव्यक्ति जौर्ज औरवेल के
> > > > > ‘१९८४’ जैसे समाज में भी
> > होती
> > > > > है।
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