[दीवान]सदाचारऔरछिनार

giriraj kiradoo rajkiradoo at gmail.com
Sun Aug 15 18:56:51 IST 2010


इस सिलसिले में यह भी पठनीय:



(Lawrence Summers lost his job as Harvard president for a much smaller sin,
all things considered: for merely floating the thought-bubble about women’s
under-representation in the sciences, and the reasons underlying them.)

http://www.indianexpress.com/news/textual-violence/654764/


2010/8/15 ravikant at sarai.net <ravikant at sarai.net>

> भैया अविनाश,
>
> एक शब्द के कई शब्दार्थ या
> रूपकार्थ हो सकते हैं मैंने
> इसके हल्के अर्थ की ओर इसलिए
> इशारा किया था कि हमारा
> 'गुरु-गंभीर पॉलिटिकली करेक्ट'
> हिन्दी जनपद थोड़ा ये सोचे कि
> वह अपनी पॉलिटिकली इन्करेक्ट
> जड़ों से दूर होकर साफ़-सुथरा
> बनने की कोशिश करते हुए कितना
> हास्यास्पद हो जाता है कि कभी
> कृष्ण बलदेव वैद फ़ोहश साबित
> होते हैं, कभी अशोक चक्रधर को
> जोकर माना जाता है। कभी उदय
> प्रकाश को सूली पर चढ़ा दिया
> जाता है। कभी विक्रम सिंह को
> लेकर अनावश्यक अटकलपच्ची की
> जाती है। कुल मिलाकर यह माहौल
> घुटन पैदा करता है, इस तरह की
> स्थिति में भाषा का रचनात्मक
> इस्तेमाल न करके लोग एक
> सेंसरशिप से डरकर जिएँगे, जो
> कुल मिलाकर साहित्य और
> प्रतिबद्धता दोनों के लिए
> मुश्किलें पैदा कर सकता है। अब
> जहाँ तक इन कोशों की बात है तो
> सहज-समांतर कोश थिसॉरस है,
> जिसमें हर शब्द दूसरे का एकदम
> पर्यायवाची नहीं होता, और
> अलायड को मैं गंभीरता से नहीं
> लेता,चाहे कमलकिशोर गोयनका
> कहें या तुम कहो, क्योंकि अपनी
> देसी हिन्दी और अंग्रेज़ी
> दोनों पर मुझे काफ़ी भरोसा है।
> अगर उलटना ही है तो फ़ैलन का कोश
> उलटकर देखो, अगर तुम्हें अपनी
> देसी ज़बान की छटा या उनकी
> स्मृति पर भरोसा नहीं रहा। यह
> लगभग उसी तरह की सेंसरशिप है
> जिसके चलते आजकल आप जातिवाचक
> नाम नहीं ले सकते, भले ही जाति
> की हक़ीक़त से हमेशा त्रस्त
> रहते हों।
>
> रविकान्त
>
> On Sun, 15 Aug 2010 14:23:59 +0530 avinash das <avinashonly at gmail.com>
> wrote
>
> > *रविकांत जी के लिए*
>  >
> > विभूति का यह कथन गलत है कि
> ‘छिनाल’ का अर्थ वेश्या नहीं
> है। अरविंद कुमार के
> > ‘सहज समांतर कोश’ में ‘छिनाल’
> का अर्थ कुलटा और वेश्या दिया
> गया है, जिसका इसी
> > शब्दकोश में ‘अवैध यौन संबंध
> रखने वाली स्त्री’,
> ‘दुराचारिणी’, ‘पतुरिया’,
> > ‘हरजाई’ और ‘कुतिया’ तक का
> > अर्थ दिया गया है। अलाइड के
> > प्रसिद्ध हिंदी-अंग्रेजी
> > कोश में ‘छिनाल’ के लिए
> > ‘प्रोस्टिट्यूट’ शब्द मौजूद
> > है। हिंदी विश्वविद्यालय का
> > कुलपति इस अर्थ को नहीं जानता
> और बिना जाने ही उसका प्रयोग
> करता है, क्या यह
> > मानने योग्य बात है? जाहिर है,
> > विभूति इस अर्थ के प्रति
> > अनभिज्ञता दिखा कर अपनी
> > रक्षा ही कर रहे हैं। लेकिन
> दुर्भाग्य से वे अगले ही वाक्य
> में इस छिनालत्व को
> > स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि
> ‘कितने बिस्तरों पर कितनी बार’
> लेखिका की आत्मकथा
> > का शीर्षक हो सकता था। यानी वे
> खुद ‘छिनाल’ शब्द का वही अर्थ
> ले रहे हैं जो
> > शब्दकोशों में है और जो हिंदी
> समाज समझता है।
> >
> > *आज के जनसत्ता में कमल किशोर
> गोयनका के लेख से उधार...*
> >
> > 2010/8/15 ravikant at sarai.net <ravikant at sarai.net>
> >
> > > माफ़ी अभय...
> > >
> > > ..की परवाह किए बग़ैर किया।
> > > उन्हें कहना चाहिए कि जिस तरह
> > > 'कौए के टरटराने से धान का
> सूखना
> > > बंद नहीं हो जाता'; हम जो
> मर्ज़ी
> > > लिखेंगे, जितना लिखा है, उससे
> भी
> > > ज़्यादा लिखेंगे, और विभूति
> > > नारायण या कोई भी कुछ कह ले, हम
> > > तो बेबाक लिखेंगे! जब तक हम
> ऐसा
> > > नहीं कहते दोनों पक्षों की
> > > बातों में कोई मूलभूत अंतर
> > > करना मुश्किल है।
> > >
> > > रविकान्त
> > >
> > >
> > > On Sun, 15 Aug 2010 12:42:01 +0530 "ravikant at sarai.net" <
> > > ravikant at sarai.net>
> > > wrote
> > >
> > > > गतांक से आगे...
> > > >
> > > > जैसा कि मैं आपके शब्दचर्चा
> > > > समूह पर कह रहा था कि कम-से-कम
> > > > बिहार की ज़बानों में ये
> शब्द
> > > > स्त्री-पुरुष दोनों के लिए
> > > > इस्तेमाल होता है, और
> > > > चुहलबाज़ी के अर्थ में,
> > > > छेड़-छाड़ करनेवालों के लिए,
> > > और
> > > > गाली के अर्थ में भी। 'वेश्या'
> > > > वाली नैतिक निंदा का वज़न
> > > > इसमें नहीं है। आपने सही कहा
> > > कि
> > > > अंग्रेज़ी तर्जुमा में बात
> > > > ज़्यादा बिगड़ गई है। लोग
> > > > कहेंगे कि 'कितने बिस्तरों
> में
> > > > कितनी बार'से उनकी बात पुष्ट
> > > > होती है लेकिन मसला इतना
> नहीं
> > > > है।
> > > >
> > > > जैसे मायावती को ये नसीहत
> देने
> > > > से पहले लोग ये नहीं सोच पाते
> > > कि
> > > > जातिवाद के ख़िलाफ़ जंग का
> > > > रास्ता जाति के रणक्षेत्र से
> > > > ही जाता है, वैसे ही
> > > > स्त्री-दैहिकता में लिपटी
> > > > पुरुष नैतिकता के पर्दाफ़ाश
> > > का
> > > > रास्ता स्त्री देह की मुक्ति
> > > के
> > > > ज़रिए ही संभव है, जिस पर लेखन
> > > कई
> > > > लेखक-लेखिकाओं ने नैतिक
> > > > ठेकेदारो
> > > >
> > > > On Sun, 15 Aug 2010 12:25:38 +0530 "ravikant at sarai.net" <
> > > ravikant at sarai.net>
> > > > wrote
> > > >
> > > > > बहुत ख़ूब अजय,
> > > > >
> > > > > कल लगभग यही बात हो रही थी
> > > दो-एक
> > > > > दोस्तों से। दीवान डाक सूची
> > > से
> > > > > यही उम्मीद भी की जाती है
> > > > > सनसनीख़ेज़ बना दी गई
> घटनाओं
> > > > > पर यहाँ ठहर कर सोचा जाए न कि
> > > > > बग़ैर पढ़े-लिखे, सोचे-समझे
> इस
> > > > > या उस अभियान की वकालत कर दी
> > > > > जाए। क्योंकि ऐसे लोगों
> > > भतेरे
> > > > > हैं हिन्दी जनपद में जो
> नैतिक
> > > > > झंडा लेकर अपनी शर्तों पर आज
> > > > > भगवान गढ़ते हैं, और कल अगर
> उस
> > > > > भव्य गगनचुंबी आसन से गिर
> जाए
> > > > > तो उसे संगसार करने से नहीं
> > > > > चूकते हैं - मध्यकालीन
> > > > > भीड़तंत्र को फ़ौरी न्याय
> > > > > चाहिए। अपने गिरेबान में भी
> > > > > नहीं देखते लोग, कुछ करने से
> > > > > पहले।
> > > > >
> > > > > शब्दचर्चा पर ये बात भी चली
> थी
> > > > > कि 'छिनाल' शब्द समदर्शी है
> > > > > कम-से-कम मगही मे
> > > > >
> > > > >
> > > > > On Thu, 12 Aug 2010 16:47:43 +0530 "Abhay Tiwari" <
> abhaytri at gmail.com>
> > > > > wrote
> > > > >
> > > > > > सदाचार और छिनार
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > हिन्दी जगत आजकल एक नैतिक
> > > > > > अत्याचार की भावना से उबल
> > > रहा
> > > > > > है। निन्दा और भर्त्सना
> > > > > > प्रस्ताव निकाले जा रहे
> हैं,
> > > > > > ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के
> > > नारे
> > > > > > लगाए जा रहे हैं। आप समझ ही
> गए
> > > > > > होंगे कि मैं विभूति
> नारायण
> > > > > > राय के कुख्यात बयान और
> उससे
> > > > > > उपजी प्रतिक्रियाओं की बात
> > > > कर
> > > > > > रहा हूँ। इसके पहले कि मैं
> > > > > > अपनी बात रखूँ मैं मैरी ई
> जौन
> > > > > > नाम की एक नारीवादी के एक
> > > ईमेल
> > > > > > का उद्धरण देना चाहूँगा।
> वे
> > > > > > इसी विवाद के सन्दर्भ में
> > > > > > लिखती हैं-
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > "हम उस नैतिक आघात से सहमत
> > > > नहीं
> > > > > > है जो वेश्यावृत्ति या
> > > > बेवफ़ाई
> > > > > > के उल्लेख भर से मीडिया में
> > > > > > आता रहा है। बल्कि हम यक़ीन
> > > > > > करते हैं कि यौनिकता के
> मसले
> > > > > > गम्भीर मसले हैं, जिन पर और
> > > > > > सार्वजनिक बहस और समझदारी
> की
> > > > > > ज़रूरत है। नारीवाद के
> नज़रिये
> > > > > > से यौनिकता के मामले को और
> > > > > > समझने के लिए हमें राय जैसे
> > > > > > लेखकों को चुनौती देनी
> > > > चाहिये
> > > > > > ना कि सार्वजनिक नैतिकता
> में
> > > > > > उलझना चाहिये।"
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > मैरी जौन ने सहज रूप से इस
> > > > > > मामले के मूल में बैठी
> > > समस्या
> > > > > > को रेखांकित कर दिया है।
> > > मेरी
> > > > > > नज़र में हिन्दी जगत से अभी
> तक
> > > > > > एक भी प्रतिक्रिया ऐसी
> नहीं
> > > > आई
> > > > > > जिसने इस मसले को नैतिक
> > > > > > अतिक्रमण से अलग किसी
> नज़रिये
> > > > > > से देखने की कोशिश की हो।
> > > > > > उपकुलपति महोदय ने कहा,
> > > > > > “लेखिकाओं में होड़ लगी है
> यह
> > > > > > साबित करने के लिए उनसे
> बड़ी
> > > > > > छिनाल कोई नहीं है।” उसके
> > > > जवाब
> > > > > > में कहा गया “..लेखिकाओं के
> > > > > > बारे में अपमानजनक
> वक्तव्य..
> > > न
> > > > > > केवल हिंदी लेखिकाओं की
> > > > गरिमा
> > > > > > के खिलाफ है, बल्कि उसमें
> > > > > > प्रयुक्त शब्द
> स्त्रीमात्र
> > > > > > के लिए अपमानजनक है।”
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > देखने में दोनों एकदम
> विपरीत
> > > > > > बयान मालूम देते हैं मगर एक
> > > > > > जगह जाकर दोनों एक हो जाते
> > > > हैं-
> > > > > > राय जब वर्तमान स्त्रीलेखन
> > > > को
> > > > > > छिनाल के अपमानजनक विशेषण
> से
> > > > > > नवाजते हैं तो वे छिनाल का
> > > > > > इस्तेमाल इस अर्थ में करते
> > > > हैं
> > > > > > कि छिनालपन एक निन्दनीय
> > > > कृत्य
> > > > > > है जिस से बचा जाना चाहिये।
> > > और
> > > > > > दूसरी तरफ़ उनका विरोध
> करने
> > > > > > वाले इस बात पर आपत्ति करते
> > > > > > हैं कि राय गरिमामय हिन्दी
> > > > > > लेखिकाओं के लिए 'छिनाल'
> जैसा
> > > > > > अपमानजनक शब्द कैसे प्रयोग
> > > > कर
> > > > > > सकते हैं? ‘छिनाल’ के
> > > > अपमानजनक
> > > > > > होने पर दोनों की सहमति है!
> > > > > > दोनों ही परोक्ष रूप से मान
> > > > > > रहे हैं कि स्त्री का
> वांछित,
> > > > > > नैतिक रूप 'सती-सावित्री'
> > > वाला
> > > > > > ही है।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > एक और मज़े की बात यह है कि
> एक
> > > > > > पेटीशन जो राय साहब को
> हटाने
> > > > > > के लिए नेट पर चलाया जा रहा
> > > है,
> > > > > > उस में और अंग्रेज़ी प्रेस
> > > में
> > > > > > भी इस छिनार शब्द का अनुवाद
> > > > > > प्रौस्टीट्यूट किया गया
> है।
> > > > > > जो निहायत ग़लत है।
> > > > > > प्रौस्टीट्यूट के लिए
> रण्डी
> > > > > > या वेश्या शब्द है। रसाल जी
> > > के
> > > > > > कोष में छिनार का अर्थ है
> > > > > > व्यभिचारिणी, कुलटा,
> > > > > > परपुरुषगामिनी, और इसकी
> > > > > > उत्पत्ति छिन्ना+नारी से
> > > > बताई
> > > > > > गई है। इन्ही में इस शब्द की
> > > > > > पूरी राजनीति छिपी हुई है,
> वो
> > > > > > राजनीति जो इस शब्द की आड़
> > > लेकर
> > > > > > महिला लेखकों पर हमला करने
> > > > > > वाले विभूति नारायण राय और
> > > > > > उनका उच्च स्वर से विरोध
> > > करने
> > > > > > वाले तथाकथित प्रगतिशीलता
> > > के
> > > > > > ठेकेदारों को एक ज़मीन पर
> खड़ा
> > > > > > कर देती है।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > वैवाहिक सम्बन्ध से इतर
> > > > दैहिक
> > > > > > सम्बन्ध बनाने से जिसका
> > > > > > चरित्र खण्डित होता हो, वह
> है
> > > > > > छिनाल। हज़ारों सालों तक
> थोड़े
> > > > > > से भी दैहिक विचलन की कड़ी
> से
> > > > > > कड़ी सज़ा स्त्री को दी
> जाती
> > > रही
> > > > > > है हर समाज में। आज भी कई
> समाज
> > > > > > ऐसे हैं जहाँ किसी भी
> ‘अवैध’
> > > > > > सम्बन्ध की सज़ा अकेले
> नारी
> > > को
> > > > > > ही मिलती है, पुरुष को कुछ
> > > > > > नहीं। इसी तरह के दोहरे
> > > > > > व्यवहार, दोहरी नैतिकता का
> > > > > > नतीजा है यह छिनार का शब्द।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > स्त्री को अपने शरीर का
> > > > > > स्वामित्व नहीं है। आज भी
> कई
> > > > > > समाज व नैतिक परम्पराएं
> उसे
> > > > > > गर्भनिरोध या गर्भपात नहीं
> > > > > > कराने देतीं। कई उसे परदे
> से
> > > > > > बाहर नहीं आने देतीं।
> स्त्री
> > > > > > सम्पत्ति है इसीलिए उसका
> > > > > > ‘स्वामी’ होता है, उसका
> > > ‘पति’
> > > > > > होता है। उसकी कोख पर उसका
> > > > > > नहीं उसके स्वामी का
> अधिकार
> > > > > > है। इसीलिए अगर वह किसी
> अन्य
> > > > > > से यौन सम्बन्ध बनाये या
> > > > > > गर्भधारण करे तो पापचारिणी
> > > > > > कहलाती है। और सन्तान भी
> > > > > > नाजायज़ हो जाती है। बहुत
> हाल
> > > > > > तक सन्तान की माता के प्रति
> > > ही
> > > > > > पूरे सत्यापन से कहा जा
> सकता
> > > > > > था, पिता के प्रति हरगिज़
> > > नहीं।
> > > > > > मगर फिर भी अज्ञात पिता
> होने
> > > > > > से, या वैधानिक पति की
> सन्तान
> > > > न
> > > > > > होने से सन्तान अवैध /
> नाजायज़
> > > /
> > > > > > हरामी हो जाती थी/ है।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > गर्भनिरोध आदि के ज़रिये
> आज
> > > > > > स्त्री के लिए अपने शरीर पर
> > > > > > स्वामित्व और अधिकार पाना
> > > > > > मुमकिन हो गया है। इतिहास
> > > में
> > > > > > पहली बार, सारे प्राणियों
> से
> > > > > > अलग, आज औरत के लिए यह सम्भव
> > > है
> > > > > > कि वह बिना गर्भधारण की
> > > चिंता
> > > > > > किए दैहिक सुख ले सके जैसे
> > > > > > आदमी लेता रहे हैं हमेशा।
> > > > > > लेकिन ‘पुरुष’ मानसिकता उस
> > > > की
> > > > > > इस आज़ादी के साथ सहज नहीं
> है;
> > > > वह
> > > > > > उसे मातृत्व और पत्नीत्व
> के
> > > > > > दायरे में ही क़ैद रखना
> चाहता
> > > > > > है, जहाँ स्त्री मनुष्य
> नहीं,
> > > > > > देवी होती है, सती-सावित्री
> > > > > > होती है। स्त्री यदि भोग की,
> > > > > > दैहिक आनन्द की बात करती है
> > > तो
> > > > > > लोग असहज हो जाते हैं; कहते
> > > > हैं
> > > > > > कि बाक़ी सब बात करो, ये मत
> बात
> > > > > > करो!
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > अपने साक्षात्कार में राय
> > > > > > कहते हैं “इस पूरे प्रयास
> > > में
> > > > > > दिक्कत सिर्फ इतनी है कि यह
> > > > > > देह विमर्श तक सिमट गया है
> और
> > > > > > स्त्री मुक्ति के दूसरे
> > > > > > मुद्दे हाशिये पर चले गए
> > > > हैं।”
> > > > > > मेरा मानना है कि यह सलाह
> > > वैसे
> > > > > > ही है जैसे कि बहुत सारे लोग
> > > > > > मायावती की राजनीति से
> > > > नाक-भौं
> > > > > > सिकोड़ते हैं कि वे
> 'जातिवाद'
> > > > > > फैला रही हैं। वे कहते हैं
> कि
> > > > > > आरक्षण की बात मत करो,
> > > योग्यता
> > > > > > की बात करो। इसी तरह राय कह
> > > > रहे
> > > > > > हैं “देह से परे भी बहुत कुछ
> > > > > > ऐसा घटता है जो हमारे जीवन
> को
> > > > > > अधिक सुन्दर और जीने योग्य
> > > > > > बनाता है” मेरा कहना है कि
> > > > > > ज़रूर होगा और ज़रूर है मगर
> जिस
> > > > > > आधार से स्त्री वर्ग को
> > > > हज़ारों
> > > > > > सालों से पीड़ित किया गया
> हो
> > > वो
> > > > > > थोड़ी आज़ादी मिलने पर उस
> आधार
> > > > > > की उपभोग न करे, तो ये कैसे
> > > > > > आज़ादी है? स्त्री का शोषण
> और
> > > > > > उत्पीड़न उसकी देह के आधार
> पर
> > > > > > ही हुआ है, तो अब यह लाज़िमी
> है
> > > > > > कि उसकी आज़ादी के संक्रमण
> > > में
> > > > > > दैहिक विमर्श एक केन्द्रीय
> > > > > > भूमिका में रहे। और फिर
> सबसे
> > > > > > बड़ी बात ये भी है कि
> > > स्त्रियां
> > > > > > स्वयं तय करेंगी कि वे किस
> > > > > > बारे में लिखना चाहेंगी और
> > > > किस
> > > > > > बारे में नहीं।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > अंत में मैं एक बात यह भी
> > > > > > कहूँगा कि इस मसले पर
> विभूति
> > > > > > नारायण राय के जो विचार हैं
> > > > > > उनसे मैं ज़रूर असहमत हूँ,
> मगर
> > > > > > निजी तौर पर मुझे उनमें ऐसा
> > > > > > कुछ भी नहीं लगता कि जिस पर
> इस
> > > > > > तरह का 'राजनीतिक' बावेला
> खड़ा
> > > > > > किया जाय। ये सब साहित्य की
> > > > > > अन्दरूनी बहस के मसले हैं
> इन
> > > > > > पर ज़ोरदार बहस होनी
> चाहिये न
> > > > > > कि लोगों का मुँह बन्द करने
> > > की
> > > > > > कोशिशें। छिनाल जैसा शब्द
> > > > > > अपमानजनक ज़रूर है और
> 'नैतिक'
> > > > > > आधार पर ग़लत भी, परन्तु उसी
> > > > > > नैतिकता के आधार पर जिसकी
> > > ऊपर
> > > > > > चर्चा की गई। दूसरी ओर
> छिनार
> > > > > > के समान्तर अंग्रेज़ी के
> > > 'स्लट
> > > > > > 'और 'बिच' जैसे शब्द,
> अपमानजनक
> > > > > > बने रहते हुए भी, सहज
> > > इस्तेमाल
> > > > > > में आ गए हैं और नारीवाद ने
> भी
> > > > > > उन के अर्थों को
> > > > > > पुनर्परिभाषित कर के समाज
> को
> > > > > > अपना रवैया बदलने पर मजबूर
> > > > > > किया है।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > पिछले दिनों रवीश कुमार ने
> > > भी
> > > > > > पंजाब में आए एक नए बदलाव को
> > > > > > पकड़ा। हज़ारों सालों से
> > > > > > उत्पीड़ित दलित सीना ठोंक
> कर
> > > > गा
> > > > > > रहे हैं-अनखी पुत्त चमारा
> > > दे।
> > > > > > जबकि दलित मामलों के प्रति
> > > > > > संवेदनशील उत्तर प्रदेश
> में
> > > > > > इसी शब्द के इस्तेमाल पर
> सज़ा
> > > > > > हो सकती है।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > हिन्दी समाज की नैतिकता के
> > > > > > रखवाले शब्दों के प्रति
> कुछ
> > > > > > अधिक ही संवेदनशील है और
> > > समाज
> > > > > > के 'सदाचार उन्नयन अभियान'
> > > में
> > > > > > संलग्न हैं। उल्लेखनीय है
> कि
> > > > > > शब्दों को लेकर सदाचारी और
> > > > > > असहिष्णु रवैये की एक
> > > > > > अभिव्यक्ति जौर्ज औरवेल के
> > > > > > ‘१९८४’ जैसे समाज में भी
> > > होती
> > > > > > है।
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > >
> > > > > > http://nirmal-anand.blogspot.com/
> > > > >
> > > > >
> > > > > _______________________________________________
> > > > > Deewan mailing list
> > > > > Deewan at sarai.net
> > > > > https://mail.sarai.net/mailman/listinfo/deewan
> > > > >
> > > >
> > > >
> > > > _______________________________________________
> > > > Deewan mailing list
> > > > Deewan at sarai.net
> > > > https://mail.sarai.net/mailman/listinfo/deewan
> > > >
> > >
> > >
> > > _______________________________________________
> > > Deewan mailing list
> > > Deewan at sarai.net
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> > >
> >
>
>
> _______________________________________________
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>



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for all your seriousness, i am a joke.
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