[दीवान]किसान विरोधी है फिल्म "पीपली लाइव'

Prakash K Ray pkray11 at gmail.com
Mon Aug 16 11:18:42 IST 2010


महमूद भाई,
कल रात को ही शशिकांत जी ने मान लिया की उन्होंने फ़िल्म नहीं देखी है. अब वह
पीपली से लौटने के बाद ही इस बारे में बतियाएंगे. नीचे मेरा और उनका मेलाचार
चिपका है:

*मेरा मेल:
शशिकांत भाई,
विदर्भ के किसानों को भड़काया जा रहा है. मैं दावे से कह सकता हूँ कि अभी तक उन
तक यह फ़िल्म नहीं पहुंची है. उनके नेताओं को पहले फ़िल्म देखनी चाहिए. फ़िल्म
उन विडम्बनाओं  की ओर हमारा ध्यान ले जा रही है जिनमें नत्था, बुधिया, धनिया,
अम्मा, होरी जैसे असंख्य किसान, ख़ासकर वैसे किसान जिनकी जोत काफ़ी कम है या
खेतिहर मज़दूर हैं, उलझ के रह गए हैं. रही बात आपकी, तो मैं आग्रह करूँगा कि
थोड़ा ग़ौर करें तो अपने को आप उस राकेश की तरह पाएंगे जो नत्था की तरह बच-बचा
कर शहर तो आ गया, लेकिन है वह दिहाड़ी का मज़दूर ही. आमदनी तो ज़िंदगी का एक
हिस्सा भर है शशि भाई.

यह फ़िल्म किसानों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई में एक छोटी-सी भागीदारी
है.

सफ़दर ने कहा था कि जब मेहनतकश नुक्कड़ पर खड़े हो कर अपनी ही ज़िंदगी बने नाटकों
के प्रहसन पर हँसता है तब वह असल में हुकमरानों के  ख़िलाफ़ बयान दे रहा होता
है. यदि पीपली लाइव किसान विरोधी है तो गोदान, मैला-आँचल, सावकारी पाश, इप्टा
के नाटक, घटक का मेलोड्रामा वगैरह सबको भांड़ में झोंक देना चाहिए.

*शशिकांत भाई का जवाब:

प्रकाश भाई,
आपने सफ़दर का नाम लिया. और लिखा, "सफ़दर ने कहा था कि जब मेहनतकश नुक्कड़ पर खड़े
हो कर अपनी ही ज़िंदगी बने नाटकों के प्रहसन पर हँसता है तब वह असल में
हुकमरानों के  ख़िलाफ़ बयान दे रहा होता है. यदि पीपली लाइव किसान विरोधी है तो
गोदान, मैला-आँचल, सावकारी पाश, इप्टा के नाटक, घटक का मेलोड्रामा वगैरह सबको
भांड़ में झोंक देना चाहिए."
आपकी इज्ज़त करते हुए फिल्म देख कर बात करूँगा. शुक्रिया.
-शशिकांत


2010/8/16 mahmood farooqui <mahmood.farooqui at gmail.com>

> "waqai aapne yadi ye sab film men dikhaya hai..."
>
> picturiya dekhi nahi hai kya aapne? Agar aap ise dekh len to aapke ghusse
> ko aur hawa milegi aur tab main aap se qaide se mafi bhi mang sakunga.
>
> Prakash--'ek hi jhatke men faisla. Zille-ilahi...' maza aa gaya parh ke, ek
> line men aisa visphotak mazaq!
>
> 2010/8/16 shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>
>
>> "किसान विरोधी है फिल्म पीपली लाइव<http://shashikanthindi.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html>
>> "
>>
>> <http://2.bp.blogspot.com/_TJ6Vb3l55wM/TGg2_J_nT9I/AAAAAAAACXo/fcNyjJDQnh4/s1600/Peepli+Live+%282010%29.jpg>
>>
>> " पीपली लाइव" फिल्म में दिखाया गया है कि पैसे की खातिर किसान आत्महत्या
>> करते हैं. यह सरासर ग़लत है. लगातार फसल खराब होने और बैंक के क़र्ज़ न चुका
>> पाने की वजह से मज़बूर होकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं..." आत्महत्या करनेवाले
>> एक किसान की बेवा ने कैमरे के सामने कहा.
>>
>>  विदर्भ में पंद्रह अगस्त, रविवार को आमिर ख़ान के विरोध में हज़ारों किसानों
>> ने प्रदर्शन किया.
>>
>> आत्महत्या करनेवाले किसानों की विधवाओं, उनके अनाथ बच्चों और उनके परिवार के
>> सदस्यों ने आज आमिर ख़ान का पुतला फूँका.
>>
>> ये क्या कर दिया आपने आमिर भाई, अनूषा जी और महमूद भाई?
>>
>> एक लाख रुपये की खातिर किसान आत्महत्या करते हैं?
>>
>> एक ग़रीब किसान का भाई ही पैसे के लोभ में अपने भाई को आत्महत्या करने के लिए
>> बाध्य करता है?
>>
>> भाई-बहन, वाकई आपने ये सब यदि फिल्म में दिखाया है तो भयानक है.
>>
>> आपकी यह फिल्म पूरी तरह किसान विरोधी है.
>>
>> अरे, आप दिल्ली, बम्बई वाले  क्या जानें किसानों को?
>>
>> नहीं कुछ तो यह फिल्म बनाने से पहले प्रेमचंद की "पूस की रात" कहानी ही पढ़
>> लेते.
>>
>> आपलोगों ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया.
>>
>> हिन्दुस्तान के किसान ईश्वर, खुदा, जीसस या कहें वाहे गुरु होते हैं. किसानों
>> को अमूमन मुनाफ़ा नहीं होता. वे नो प्रॉफिट नो लौस पर खेती करते हैं.
>>
>> जो फसल उपजाते हैं, उसे खुद नही खाते, गाय-भैंस पोसते हैं लेकिन सारा दूध बेच
>> देते हैं,ना खुद खाते ना अपने मासूम बच्चों को खिलाते हैं, मज़बूरन.
>>
>> (मैं बिहार के एक किसान परिवार से हूँ और मेरे तीनों बड़े भाई खेती करते है.
>> उन तीनों की सालाना आमदनी से ज़्यादा अकेली मेरीसालाना आमदनी है. जबकि मेरे पास
>> दिल्ली में  कोई नौकरी नहीं है, फ्रीलांसिंग करता हूँ.)
>>
>> ..और ऐसे किसानों का आपने अपनी "पीपली लाइव" फिल्म में मज़ाक उड़ाया है?
>>
>> आपलोगों ने ठीक से  होमवर्क नहीं किया.यह अच्छी बात नहीं है आमिर भाई, अनूषा
>> रिज़वी और महमूद फारूकी जी.
>>
>> माफ़ कीजिएगा.
>>
>> -शशिकांत
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-- 
Prakash K Ray
Research Scholar, Cinema Studies,
School of Arts & Aesthetics,
Jawaharlal Nehru University, New Delhi-67.

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