[दीवान]पीपली लाइव इसलिए अच्छी नहीं लगी.!
Prakash K Ray
pkray11 at gmail.com
Sat Aug 21 02:44:38 IST 2010
बस इक शेर-
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
-अदम गोंडवी.
2010/8/21 shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>
> पीपली लाइव इसलिए अच्छी नहीं लगी.....
>
>
> - आत्महत्या करने वाले बिना किसी को बताए चुपके से आत्महत्या कर लेते हैं,
> किसी को बताते नहीं, जो बताते हैं वे शोले के वीरू की तरह तमाशा करते हैं.
> नत्था और उसका भाई ऐसे शातिर और चालाक किसान हैं जो आत्महत्या का नाटक रच कर
> सबको पगला दिए हैं.
>
>
> - हिन्दुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान की या किसी अन्य मुल्क़ की शायद (अपवाद
> में गिनी-चुनी) ही कोई पत्नी मुआवजे कि ख़ातिर अपने पति के मरने के फ़ैसले को
> आसानी से स्वीकार कर लेगी- मरना चाह रहे हो, पता नहीं, उसे बाद भी मुआवज़ा
> मिलेगा कि नहीं.
>
>
> - जो साथी इसे व्यंग्य कि उत्कृष्ट फिल्म बता रहे हैं वे पता नहीं भीष्म
> साहनी का बहुचर्चित नाटक 'मुआवज़े' (एन.एस.डी. के कई शो देखे हैं मैंने, गज़ब
> का नाटक है) देखे हैं या नहीं, मैंने परसाई का व्यंग्य भोलाराम का जीव पढ़ा है,
> शरद जोशी को भी थोड़ा-बहुत, और चार्ली चैप्लिन इज माय फेवरेट. हाँ ये संभव है
> कि मुझे व्यंग्य की समझ नहीं.
>
>
> - मीडिया के इतिहास में कोई घटना तब तक खबर नहीं बनती जब तक वो घट नहीं
> जाती, ख़ासकर इलक्ट्रोनिक मीडिया के लिए. अव्वल ये कि हिन्दुस्तान में रोज़
> हज़ारों घटनाएं मीडिया रिपोर्टिंग से महरूम रह जाती हैं, बिना घटी घटनाओं कि
> रिपोर्टिंग का तो सवाल ही नहीं उठता.
>
>
> - हमारे मुल्क़ की मीडिया महानगर और शहर केन्द्रित है, गाँव और क़स्बे से
> उसका नहीं के बराबर सरोकार है. पीपली लाइव में मीडिया के इस बुनियादी सच को उलट
> दिखाया गया है.
>
>
> - चुनावी संहिता के रहते किसी एक व्यक्ति ही नहीं सामूहिक हित का भी कोई
> सरकारी डिसीजन नहीं लिया जा सकता, रूटीन कामकाज को छोड़कर.
>
>
> - आफ्टर पार्टीशन हिन्दुस्तान के ६२ साल के इतिहास में कोई भी कस्बाई स्तर
> पर बिना घटे कोई घटना तो दूर घटने के बाद भी चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दा नहीं
> नहीं बना, पीपली लाइव फिल्म को छोड़ कर.
>
>
> - टीवी रिपोर्टर कामचोर होते हैं, ख़ासकर महिला टीवी रिपोर्टर. वे घटना कि
> जगह पर आईने लेकर सजती-संवारती हैं, फीड में दीन-रात भूखे-प्यासे ख़ाक छानने
> वाले दीपक चौरसिया जैसे सीनियर रिपोर्टर को ख़बर के इम्पोर्टेंस की समझ नहीं,
> ज़मीनी सच से दूर दफ्तर में बैठा बॉस उसे हड़काता है कि उसेप्राइम टाइम में ये
> ख़बर चाहिए, चुनाव का नेशनल इश्यू नहीं, बकवास दि ग्रेट. काश, ऐसा
> होता!
>
>
> ( शेष अगली डाक में)
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Prakash K Ray
Research Scholar, Cinema Studies,
School of Arts & Aesthetics,
Jawaharlal Nehru University, New Delhi-67.
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