[दीवान]पीपली लाइव इसलिए अच्छी नहीं लगी.!
avinash das
avinashonly at gmail.com
Sat Aug 21 04:59:47 IST 2010
वाह वाह! वाह वाह!! वाह वाह!!!
2010/8/21 Prakash K Ray <pkray11 at gmail.com>
> बस इक शेर-
> जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
> आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
> -अदम गोंडवी.
>
> 2010/8/21 shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>
>
>> पीपली लाइव इसलिए अच्छी नहीं लगी.....
>>
>>
>> - आत्महत्या करने वाले बिना किसी को बताए चुपके से आत्महत्या कर लेते
>> हैं, किसी को बताते नहीं, जो बताते हैं वे शोले के वीरू की तरह तमाशा करते हैं.
>> नत्था और उसका भाई ऐसे शातिर और चालाक किसान हैं जो आत्महत्या का नाटक रच कर
>> सबको पगला दिए हैं.
>>
>>
>> - हिन्दुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान की या किसी अन्य मुल्क़ की शायद (अपवाद
>> में गिनी-चुनी) ही कोई पत्नी मुआवजे कि ख़ातिर अपने पति के मरने के फ़ैसले को
>> आसानी से स्वीकार कर लेगी- मरना चाह रहे हो, पता नहीं, उसे बाद भी मुआवज़ा
>> मिलेगा कि नहीं.
>>
>>
>> - जो साथी इसे व्यंग्य कि उत्कृष्ट फिल्म बता रहे हैं वे पता नहीं भीष्म
>> साहनी का बहुचर्चित नाटक 'मुआवज़े' (एन.एस.डी. के कई शो देखे हैं मैंने, गज़ब
>> का नाटक है) देखे हैं या नहीं, मैंने परसाई का व्यंग्य भोलाराम का जीव पढ़ा है,
>> शरद जोशी को भी थोड़ा-बहुत, और चार्ली चैप्लिन इज माय फेवरेट. हाँ ये संभव है
>> कि मुझे व्यंग्य की समझ नहीं.
>>
>>
>> - मीडिया के इतिहास में कोई घटना तब तक खबर नहीं बनती जब तक वो घट नहीं
>> जाती, ख़ासकर इलक्ट्रोनिक मीडिया के लिए. अव्वल ये कि हिन्दुस्तान में रोज़
>> हज़ारों घटनाएं मीडिया रिपोर्टिंग से महरूम रह जाती हैं, बिना घटी घटनाओं कि
>> रिपोर्टिंग का तो सवाल ही नहीं उठता.
>>
>>
>> - हमारे मुल्क़ की मीडिया महानगर और शहर केन्द्रित है, गाँव और क़स्बे
>> से उसका नहीं के बराबर सरोकार है. पीपली लाइव में मीडिया के इस बुनियादी सच को
>> उलट दिखाया गया है.
>>
>>
>> - चुनावी संहिता के रहते किसी एक व्यक्ति ही नहीं सामूहिक हित का भी कोई
>> सरकारी डिसीजन नहीं लिया जा सकता, रूटीन कामकाज को छोड़कर.
>>
>>
>> - आफ्टर पार्टीशन हिन्दुस्तान के ६२ साल के इतिहास में कोई भी कस्बाई
>> स्तर पर बिना घटे कोई घटना तो दूर घटने के बाद भी चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दा
>> नहीं नहीं बना, पीपली लाइव फिल्म को छोड़ कर.
>>
>>
>> - टीवी रिपोर्टर कामचोर होते हैं, ख़ासकर महिला टीवी रिपोर्टर. वे घटना
>> कि जगह पर आईने लेकर सजती-संवारती हैं, फीड में दीन-रात भूखे-प्यासे ख़ाक छानने
>> वाले दीपक चौरसिया जैसे सीनियर रिपोर्टर को ख़बर के इम्पोर्टेंस की समझ नहीं,
>> ज़मीनी सच से दूर दफ्तर में बैठा बॉस उसे हड़काता है कि उसेप्राइम टाइम में ये
>> ख़बर चाहिए, चुनाव का नेशनल इश्यू नहीं, बकवास दि ग्रेट. काश, ऐसा
>> होता!
>>
>>
>> ( शेष अगली डाक में)
>>
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