[दीवान](no subject)
naresh goswami
naresh.goswami at gmail.com
Tue Apr 12 18:26:32 IST 2011
शशि भाई,
आप अपनी प्रतिक्रिया में उत्तरी ध्रुव पर पहुँच गए हैं. और ये मानने को तैयार
नहीं हैं कि परिवर्तनकारी शक्तियों का पर्यावास बीच की जमीन पर भी हो सकता
है.
मित्र, मैं अन्ना परिघटना को दूसरे जाविये से देखना चाहता हूँ. समाज ने अन्ना
हजारे से कभी नहीं कहा होगा कि आप सामाजिक कार्यकर्त्ता बनिए. यह उनका निजी
फैसला रहा होगा. उन्होंने जनता के बीच काम किया और उसी की तरह साधारण बन कर रहे
और जिए. तो उनके पीछे जो ताकत रही वह आम आदमी की ताकत थी. हम जैसे भद्र
नागरिकों की दिक्कत ये है कि हम संस्थाओं की भाषा में सोचने के आदि हो गए हैं.
हमें यह लगता ही नहीं कि प्रतिरोध के स्थापित तरीकों से हटकर भी कोई मुहीम शुरू
की जा सकती है. आप जिन संस्थाओं की साख को लेकर चिंतित हैं और जिनके हवाले से
अन्ना का गिरेबान पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं दरअसल वही संस्थाएं - संविधान,
संसद आदि ताकतवर लोगों और लॉबियों की सौदेबाजी और डीलिंग का अड्डा बन गई हैं.
वहां जनता के लिए थोड़ा बहुत इसलिए किया जाता है क्योंकि इसके बिना उनकी कोई
वैधता नहीं रही जाएगी. अगर यह बात रिटोरिक लग रही हो तो इस पर विचार करें कि वे
निर्वैयक्तिक और अमूर्त हो गई हैं. उनके लिए आदमी आंकड़ा बन कर रह गया है. आप
ध्यान दें कि हर आधुनिक राज्य ने कानूनों का एक ऐसा विशाल और बहुपरती जाल बना
लिया है जिसे वही लोग समझ सकते हैं जो उसके मुहावरे में शिक्षित-दीक्षित हैं.
ऐसे में आम आदमी की मुक्ति के लिए यह लाजमी हो जाता है कि बात मुख़्तसर अंदाज़
में की जाय. अन्ना ने शायद कुछ ऐसा ही किया है. उन्होंने मालिक (जनता) और सेवक
(नेता, सरकार) का बुनियादी सवाल उठाया है. इस वर्गीकरण से बहुतों को दिक्कत हो
सकती है. मुझे भी है पर इस मेटाफर के लफड़े में न पड़कर बस इस बात को सचित्र
याद करने कि कोशिश करें कि हमारे यहाँ सरकार का अदने से अदना अहलकार आम आदमी से
किस तरह पेश आता है. और किस तरह ग्राम प्रधान से लेकर पार्षद, विधायक और सांसद
अपने इलाके से फैलकर देश के संसाधानों पर काबिज हो जाते हैं. तो भाई जी ऐसे में
अन्ना टाइप तरीके से ही बात बन सकती थी. बाकी तमाम तरीकों- जांच-पड़ताल-आयोग
आदि के कारनामों से हम अच्छी तरह वाकिफ रहे ही हैं.
मुझे लगता है कि अन्ना के इस औचक हमले से सबसे ज्यादा मध्यवर्ग के बौद्धिक
बौखलाए हैं. क्योंकि इस बार उन्हें पूछा नहीं गया. एक तो बारीक कताई-बुनाई के
उस्तादों को इस बात की भनक नहीं लगी कि क्या होने जा रहा है: वे इसे एक निरीह
गांधीवादी धरना मानकर चल रहे थे. दूसरे, उन्हें यह भी नहीं लगता था कि इस देश
और समाज में एक टोपी धारी बाबा या ताऊ जैसा दिखने वाला आदमी कैसे जनता को
लामबंद कर सकता है. आलमी इदारों में पढ़कर और राज्य-समाज-क्रांति के अनंत पेचों
में उलझी प्रतिभाएं कई बार आसन्न सच्चाई को नहीं पढ़ पाती. अन्ना के मामले में
ऐसा ही हुआ है. और आखरी बात ये कि अन्ना और उनके गिरोह की इस 'जुर्रत' के बाद
दुनिया ख़त्म नहीं हो जाएगी. जिन्हें अन्ना की इस जुर्रत में संविधान और
लोकतंत्र का स्थापित ढांचा टूटता दिखाई दे रहा है उन्हें भी इसे दुरुस्त करने
के मौके मिलेंगे. फिलहाल जरूरी यह है कि पहले थान तैयार कर लिया जाय. पच्चीकारी
बाद में भी की जा सकती है.
-नरेश
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