[दीवान]हंस और हंस के 25 साल
himanshu pandya
himanshuko at gmail.com
Tue Aug 2 13:10:44 IST 2011
आदरणीय ब्रजेश जी ,
हंस की गोष्ठी के बारे में आपकी राय पर मुझे कुछ नहीं कहना , वह ठीक ही होगी .
आपका प्रत्यक्ष अनुभव है . किन्तु मुझे 'जिंदगी और जोंक' के रजुआ से तुलना खल
गयी . वह पात्र मेरी दृष्टि में अदम्य जिजीविषा का प्रतीक और हिन्दी कहानी का
एक अविस्मरणीय चरित्र है . क्या आपको वह उपहास योग्य लगता है ?
सादर
हिमांशु पंड्या
2011/8/2 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>
> *जवान हंस का **पनछोट** जन्मदिन***
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> “ये अजय नावरिया कौन है?” फोन कर एक पत्रकार मित्र पूछ रहे थे। मैंने कहा, “साहित्यकार
> कहलाते हैं। हंस से जुड़े हैं।” इसपर उन्होंने तपाक से कहा, “ओह, बहुत खखोरता
> है, जौंक की तरह माइक से चिपक गया था।” इस बातचीत के बाद तत्काल “एक दुनिया
> समानांतर” कहानी संग्रह की याद आई। अरसा पहले इस संग्रह का संपादन स्वयं
> राजेंद्र यादव ने किया है, जिसकी पहली कहानी ही ‘जिंदगी और जौंक’ है। तो क्या
> अमरकांत का वह पात्र भिन्न परिस्थितियों में अब ‘हंस’ की गोष्ठियों में जीवित
> हो गया है ? यह फैसला तो वे लोग ही बेहतर कर पाएंगे जो गोष्ठियों के
> कायदे-वायदे को ज्यादा समझते हैं। और फर्क तब पड़ेगा जब इसपर विचार स्वयं
> राजेंद्र यादव करेंगे। हमें तो दो साल पहले हंस की ऐसी ही एक संगोष्ठी का
> संचालन करते संजीव कुमार याद आ रहे हैं। उस संचालन का भी अपना अंदाज था।
> बेहतरीन।
>
>
>
> बहरहाल, हंस ने अपने 25 साल पूरे करने पर गंभीर गोष्ठी की कल्पना की थी।
> भूमिका तो राजेंद्र यादव ने ऐसी ही बांधी थी। हंस पत्रिका ने “साहित्यिक
> पत्रकारिता और हंस” विषय पर बोलने के लिए प्रो. नामवर सिंह से कहा था। वे आए।
> बोले भी। पर उक्त विषय पर कोई बात नहीं की। कुछ चुटकियां लीं। नामवरी अंदाज
> में हकदार राजेंद्र यादव की तारीफ की। फिर गोष्ठी समाप्त। हंसी में जो गंभीर
> बात उन्होंने कही, उसका कोई ताल्लुक साहित्यिक पत्रकारिता से नहीं था। उसका
> संबंध साहित्यकारों की नई पीढ़ी को गुरु-मंत्र देने से था। कहा कि अब भी
> राजेंद्र यादव के पास जाव, “*कहानी छपवाने के लिए नहीं।** **कहानी लिखने की
> कला सीखने के लिए।**” **उन्होंने यह आरोप लगाया कि ऐसा लग रहा है कि हंस के
> 25 वर्ष पूरे नहीं हुए, बल्कि राजेंद्र 82 के हुए हैं। उनके कहने का अर्थ यह था
> कि गोष्ठी हंस की हो रही है पर राजेंद्र ही छाए हैं। दुख तब हुए जब स्वयं नामवर
> सिंह इससे आगे नहीं आए। ऐसा न था कि वे नहीं आ सकते थे। यकीनन, खूब बेहतर ढंग
> साहित्यिक पत्रकारिता के बाबत हम उनसे समझ-सुन सकते थे। पर, क्या है कि तलब भी
> कोई चीज होती है। समय हो जाए तो वह किसी की सुनती नहीं।***
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>
> कुल मिलाकर एक मित्र ने ठीक लिखा है, “हंस जैसी पत्रिका के 25 साल के इतिहास
> को इतने लिजलिजे और पनछोट तरीके से याद किया जाएगा, यह देख-सुनकर भारी निराशा
> हुई।”
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