[दीवान]हंस और हंस के 25 साल
brajesh kumar jha
jha.brajeshkumar at gmail.com
Tue Aug 2 14:14:16 IST 2011
हिमांशुजी
यकीनन, वह अदम्य जिजीविषा का प्रतीक है। पर, क्या है कि यहां हम रजुआ के चरित्र
के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या नहीं कर रहे। बस, इतना भर कह रहे हैं कि कई दफा
यह समझा कठिन है कि वह जिंदगी से जौंक की तरह चिपका है, या फिर जिंदगी उससे
जौंक की तरह चिपकी है। लेखक स्वयं यह नहीं समझ पाता। सभागार में यही अनुभव हो
रहा था। बहुतेरों को हो रहा था। उसमें स्वयं राजेंद्र यादव भी थे।
2011/8/2 himanshu pandya <himanshuko at gmail.com>
> आदरणीय ब्रजेश जी ,
> हंस की गोष्ठी के बारे में आपकी राय पर मुझे कुछ नहीं कहना , वह ठीक ही होगी .
> आपका प्रत्यक्ष अनुभव है . किन्तु मुझे 'जिंदगी और जोंक' के रजुआ से तुलना खल
> गयी . वह पात्र मेरी दृष्टि में अदम्य जिजीविषा का प्रतीक और हिन्दी कहानी का
> एक अविस्मरणीय चरित्र है . क्या आपको वह उपहास योग्य लगता है ?
> सादर
> हिमांशु पंड्या
>
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> 2011/8/2 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>
>
>> *जवान हंस का **पनछोट** जन्मदिन***
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>> “ये अजय नावरिया कौन है?” फोन कर एक पत्रकार मित्र पूछ रहे थे। मैंने कहा, “साहित्यकार
>> कहलाते हैं। हंस से जुड़े हैं।” इसपर उन्होंने तपाक से कहा, “ओह, बहुत
>> खखोरता है, जौंक की तरह माइक से चिपक गया था।” इस बातचीत के बाद तत्काल “एक
>> दुनिया समानांतर” कहानी संग्रह की याद आई। अरसा पहले इस संग्रह का संपादन
>> स्वयं राजेंद्र यादव ने किया है, जिसकी पहली कहानी ही ‘जिंदगी और जौंक’ है।
>> तो क्या अमरकांत का वह पात्र भिन्न परिस्थितियों में अब ‘हंस’ की गोष्ठियों
>> में जीवित हो गया है ? यह फैसला तो वे लोग ही बेहतर कर पाएंगे जो गोष्ठियों
>> के कायदे-वायदे को ज्यादा समझते हैं। और फर्क तब पड़ेगा जब इसपर विचार स्वयं
>> राजेंद्र यादव करेंगे। हमें तो दो साल पहले हंस की ऐसी ही एक संगोष्ठी का
>> संचालन करते संजीव कुमार याद आ रहे हैं। उस संचालन का भी अपना अंदाज था।
>> बेहतरीन।
>>
>>
>>
>> बहरहाल, हंस ने अपने 25 साल पूरे करने पर गंभीर गोष्ठी की कल्पना की थी।
>> भूमिका तो राजेंद्र यादव ने ऐसी ही बांधी थी। हंस पत्रिका ने “साहित्यिक
>> पत्रकारिता और हंस” विषय पर बोलने के लिए प्रो. नामवर सिंह से कहा था। वे
>> आए। बोले भी। पर उक्त विषय पर कोई बात नहीं की। कुछ चुटकियां लीं। नामवरी
>> अंदाज में हकदार राजेंद्र यादव की तारीफ की। फिर गोष्ठी समाप्त। हंसी में जो
>> गंभीर बात उन्होंने कही, उसका कोई ताल्लुक साहित्यिक पत्रकारिता से नहीं था।
>> उसका संबंध साहित्यकारों की नई पीढ़ी को गुरु-मंत्र देने से था। कहा कि अब
>> भी राजेंद्र यादव के पास जाव, “*कहानी छपवाने के लिए नहीं।** **कहानी लिखने
>> की कला सीखने के लिए।**” **उन्होंने यह आरोप लगाया कि ऐसा लग रहा है कि हंस
>> के 25 वर्ष पूरे नहीं हुए, बल्कि राजेंद्र 82 के हुए हैं। उनके कहने का अर्थ यह
>> था कि गोष्ठी हंस की हो रही है पर राजेंद्र ही छाए हैं। दुख तब हुए जब स्वयं
>> नामवर सिंह इससे आगे नहीं आए। ऐसा न था कि वे नहीं आ सकते थे। यकीनन, खूब बेहतर
>> ढंग साहित्यिक पत्रकारिता के बाबत हम उनसे समझ-सुन सकते थे। पर, क्या है कि तलब
>> भी कोई चीज होती है। समय हो जाए तो वह किसी की सुनती नहीं।***
>>
>> *
>> *
>>
>>
>>
>> कुल मिलाकर एक मित्र ने ठीक लिखा है, “हंस जैसी पत्रिका के 25 साल के इतिहास
>> को इतने लिजलिजे और पनछोट तरीके से याद किया जाएगा, यह देख-सुनकर भारी
>> निराशा हुई।”
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