[दीवान]Kapil Sibal is an Idiot … #IdiotKapilSibal
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Dec 7 13:10:44 IST 2011
*♦ विनीत कुमार*
बड़ा फ्री टाइम है सिब्बल जी के पास जो वो Facebook पर सोनिया जी के फोटोज
ढूंढ़ते रहते हैं [image: :)]
*» स्वप्निल नरेंद्र*
काफिला पर शिवम विज की पोस्ट *kapil sibal is an
ediot*<http://kafila.org/2011/12/06/kapil-sibal-is-an-idiot/> पर
अंग्रेजी में आयी टिप्पणियों की भीड़ के बीच ये टिप्पणी न केवल हिंदी होने की
वजह से अलग से पहचान में आती है बल्कि ह्यूमर पैदा करने की नीयत से की गयी इस
टिप्पणी में कपिल सिब्बल सहित सरकार के रवैये को बेपर्द करने की भरपूर क्षमता
है। मजाक-मजाक में ही सही किंतु टिप्पणीकार ने यह बता दिया कि सोशल मीडिया की
प्रकृति क्या है और कपिल सिब्बल सहित सरकार को लेकर उसकी कितनी गहरी समझ है?
कपिल सिब्बल साहब ने सोशल मीडिया खासकर फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस और याहू को
लेकर जो बयान दिये हैं और उसे सरकारी जट्टे से नाथने की जो कोशिश की है, वो
अपने आप में ये बताने के लिए काफी है कि लोकतंत्र में तानाशाह शासक से कहीं
ज्यादा खतरनाक मूर्ख शासक होता है। ऐसा इसलिए कि तानाशाह शासक को इस बात की
सलाहियत होती है कि सत्ता कायम रखने के लिए किस स्तर तक के संतुलन की जरूरत
होती है लेकिन मूर्ख शासक लोकतंत्र की डुगडुगी बजाने के बजाय ये समझने की
कोशिश में लग जाता है कि भीतर क्या है जो आवाज आ रही है और इस जिज्ञासा में
डुगडुगी के पर्दे को ही फाड़कर भीतर की हवा पर लगाम कसने लग जाता है। सिब्बल
साहब सोशल मीडिया में कंटेंट पब्लिश करने के पहले प्रीस्क्रीन करने की बात
करके दरअसल उसी हवा की लगाम कसने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें कौन समझाये कि
आप पड़ोसी मुल्क में जब तरंगों पर पहरेदारी नहीं लगा सकते तो सोशल साइट्स पर
लगाम लगाना कैसे संभव है? शिवम विज ने अपनी पोस्ट में उनकी इसी मूर्खतापूर्ण
समझदारी पर कहीं मौका हाथ से छूट न जाए की तर्ज पर लोगों से इस बात की अपील की
है कि kapil sibal is an idiot को आप अपनी फेसबुक स्टेटस के तौर पर लगाएं,
हैशटैग लगाकर ट्विटर पर #IdiotKapilSibal लिखें और इसी शीर्षक से ब्लॉग पोस्ट
लिखें, क्या पता सिब्बल साहब की चाबुक आप पर पड़े और वो आपको ऐसा करने से रोक
दें।
*सोशल मीडिया को लेकर* कपिल सिब्बल ने जो बयान दिये कि फेसबुक, ट्विटर, गूगल
और माइक्रोसॉफ्ट के फ्लेटफार्म पर कुछ ऐसी सामग्री आयी है, जो कि लोगों की
धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा सकती है, दरअसल ये सोशल मीडिया की पूरी
गतिविधियों के प्रति उनकी अज्ञानता से कहीं ज्यादा इस बात की तरफ इशारा करता
है कि भाई लोग, ये तो सांप्रदायिक दंगे फैलाने का इतना सहज माध्यम है, फिर अब
तक ऐसा आपलोगों ने कुछ किया क्यों नहीं? उनके इस बयान को ध्यान में रखते हुए
कल देश के दो प्रमुख चैनलों (आइबीएन7 और एनडीटीवी) ने सोशल मीडिया पर जो बहस
करायी, उसमें शिवम विज सहित दूसरे स्पीकरों द्वारा मूर्ख बताने की कोशिशें साफ
दिखीं। दोनों चैनलों पर जो बहसें हुई और इसके अलावे स्टार न्यूज सहित दूसरे
चैनलों ने सिब्बल के इस बयान को जिस रूप में पेश किया, उससे ये स्पष्ट है कि
सिब्बल को आनेवाले समय में भी मूर्ख नेता के तौर पर पेश किया जाएगा। किसी नेता
के करियर के लिए तानाशाह के बजाय मूर्ख कहलाना ज्यादा घातक स्थिति हो सकती है।
लेकिन सवाल है कि कपिल सिब्बल को इडियट या मूर्ख करार देने के बाद क्या? क्या
ये सिब्बल की मूर्खताभर का हिस्सा है कि जो शख्स मोबाइल से रोज एसएमएस की शक्ल
में कविताएं लिखता रहा और साल 2008 में बाजे-गाजे के साथ पेंग्विन से किताब की
शक्ल में छपवा लाया, वही शख्स फेसबुक और ट्विटर पर लाखों लोगों के ऐसा किये
जाने का विरोध माध्यम की अज्ञानता के कारण कर रहा है?
*मेनस्ट्रीम मीडिया में* सिब्बल के बयान को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया आयी
और लोगों ने जो अपने विचार रखे, उसका बड़ा हिस्सा इस तर्क की तरफ मुड़ता है कि
सोशल मीडिया ऐसा माध्यम है, जिस पर कि लगाम लगायी ही नहीं जा सकती। सिब्बल
साहब अकेले सिर्फ सोनिया गांधी की तस्वीरें खोजने लग जाएं, तो सिर पटकते रह
जाएंगे कि कहां-कहां किसने उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की है और यहां तो
पूरे सोशल मीडिया पर निगरानी रखने की बात है। तकनीक और अपनी प्रकृति में ही
सोशल मीडिया इस तरह के रेगुलेशन के खिलाफ है। जिस-जिस स्तर के रेगुलेशन होने
चाहिए, वो या तो इसमें पहले से मौजूद हैं और अगर नहीं हैं, तो उल्लंघन किये
जाने की स्थिति में कानूनी प्रावधान है। पहले से मौजूद संवैधानिक प्रावधानों
के अलावे इसी साल के अप्रैल महीने में लागू आईटी कानून इस दिशा में सख्ती से
चेक एंड बैलेंस का काम कर सकता है। इसमें सिब्बल साहब को अलग से बांग देने की
जरूरत नहीं है। लेकिन सवाल है कि जो थोड़े से सेनसेशन में तनकर खड़ा न हो जाए,
वो नेता काहे का? कांग्रेस के नेताओं की स्थिति इससे अलग नहीं है। ये स्थिति
अपने आप में दयनीय है कि जो कपिल सिब्बल टेलीकॉम जैसे मंत्रालय को संभालते
हैं, उनकी चर्चा इसलिए हो रही है कि वो सोशल मीडिया पर लगाम कसने जा रहे है।
सरकार एक तरफ तो हर हाथ में मोबाइल और माउस पहुंचाना चाहती है और दूसरे हाथों
को अपने सरकारी जट्टे से बांधना चाहती है। ऐसे में ये समझना जरूरी है कि लगाम
लगाने की जो बात व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं है, उसे सिब्बल साहब और उनकी
सरकार लगातार कर रही है, उसका आशय क्या है?
*ये बात* कपिल सिब्बल बहुत बेहतर तरीके से जानते हैं कि उनके सिर्फ कह देने और
फेसबुक, गूगल के प्रतिनिधियों को अपने ऑफिस में बुलाकर हड़का देने भर से इस पर
लगाम नहीं लगायी जा सकती। उन्हें ये भी पता है कि अगर उन्होंने ऐसा करने की
लगातार कोशिश की तो मीडिया (बड़े हद तक कांग्रेस का दुमछल्ला होते हुए भी) और
देश की जनता उस पर वही कालिख पोतेगी, जो कभी इंदिरा गांधी के समय मीडिया को
नियंत्रित करने की कोशिशों के खिलाफ पोत दी थी। दूरदर्शन पर इस कालिख के निशान
इतने गहरे हैं कि प्रसार भारती जैसी स्वायत्त संस्था के अंतर्गत काम करने के
बावजूद आज भी सरकारी भोंपू से अलग उसकी पहचान नहीं बनने पायी है। लेकिन सच्चाई
है कि एक हद तक अगर वो सोशल मीडिया की प्रकृति को नहीं समझ पा रहे हैं, तो भी
उससे कहीं ज्यादा यहां के लोगों की नब्ज को समझते हैं। उन्हें पता है कि सोशल
मीडिया का इस्तेमाल करनेवाला एक बड़ा वर्ग इस बयान भर से ही सकते में आ गया
होगा और अगर नहीं आया होगा तो फौरी तौर पर दो-चार लोगों पर कार्रवाई कर दी
जाएगी, तो बाकी के लोग भी सटक जाएंगे। व्यक्तिगत स्तर पर यदि कुछ लोगों को चोट
पहुंचाने का काम किया गया, तो बाकी लोगों की जुबान अपने आप बंद हो जाएगी। ऐसा
पढ़ते हुए आपने मन में एकबारगी खुन्नस जरूर उठेगा कि मैं इस देश की जनता को
बहुत कमतर करके आंक रहा हूं, लेकिन ये कड़वा सच है कि सरकार ने अगर हमें झुकने
कहा है, तो हम पहले से ही लोटने की प्रवृत्ति के अभ्यस्त रहे हैं। इस देश में
ब्लॉगिंग ने अभी दस साल भी पूरे नहीं किये कि वो अब लगभग छिन्न-भिन्न (हिंदी
ब्लॉगिंग) हो गया है। दिलचस्प है कि उसे छिन्न-भिन्न होने में सिर्फ सरकारी
हथकंडे ने सक्रिय भूमिका नहीं निभायी बल्कि इसे बरखा दत्त जैसी मीडिया
शख्सीयतों ने तोड़ने और कमजोर करने की कोशिश की, जो ऐसे मुद्दों पर जनता के
पक्ष से उबाल मारने लग जाते हैं। शिवम विज जब आइबीएन 7 पर कह रहे थे कि सिब्बल
साहब गुप-चुप तरीके से चाहते हैं कि सब नियंत्रित हो जाए तो ये नहीं चलेगा।
सही बात है कि नहीं चलेगा, चलनी भी नहीं चाहिए लेकिन मेरे मन में अभी भी सवाल
है कि क्या हम मीडिया के भरोसे से ऐसा दंभ भर सकते हैं?
*आज मामला गर्माया है* क्योंकि ऐसी खबरों की एक तो जोरदार टीआरपी है और दूसरा
कि यही वो गिने-चुने मौके होते हैं, जहां कि मेनस्ट्रीम मीडिया अपने को
प्रोपीपल दिखा सकती है। अपनी मिट्टी में मिल चुकी साख पर पर्दा डाल सकता है।
लेकिन क्या वो आगे आनेवाले चुनाव के लिए करोड़ों रुपये के मिलनेवाले
विज्ञापनों से हाथ धो बैठना पसंद कर सकता है? फिर हमारी इस अकड़ का क्या होगा?
फेसबुक और ट्विटर पर सिब्बल का बयान आया तो हंगामा मच गया लेकिन इसी ट्विटर और
फेसबुक पर लिखने के चलते किसी की नौकरी चली जाती है, किसी को बुलाकर बुरी तरह
हड़काया जाता है और इतना ही नहीं चैनलों की ओर से ही हटाने के लिए दबाव बनाये
जाते हैं, तो मेनस्ट्रीम मीडिया उस घटना को कितना स्पेस देता है? सवाल सिर्फ
ट्विटर और फेसबुक की आजादी को बचाने का नहीं है, उनलोगों की आजादी को बचाने का
भी तो है, जो इस पर काम करते हैं और माफ कीजिएगा मैं ये बात दावे के साथ कह
सकता हूं कि ऐसे में मेनस्ट्रीम मीडिया उस शख्स या संस्थान का साथ नहीं देगा।
आपको क्या लगता है कि मीडिया जो इसके बचाव में जो हांक लगा रहा है, वो सिर्फ
आमफहम की आवाज बचाने के लिए कर रहा है? नहीं, सोशल साइट दरअसल मेनस्ट्रीम
मीडिया के लिए बिना किसी लागत की सबसे असरदार न्यूज एजेंसी है और इस पर सरकार
की तरफ से चोट करने का मतलब है, फ्री ऑफ कास्ट मीडिया की बनती न्यूज एजेंसी को
ध्वस्त करना। सोशल मीडिया, मेनस्ट्रीम मीडिया की लागत में कटौती लाते हैं
जिससे कि एडिटिंग मशीन पर ही खबरें गढ़ी जा सके। जिस दिन इस सोशल मीडिया पर
खुद मीडिया से जुड़ी खबरों के खुलासे होने लगेंगे और हार्डकोर न्यूज की तरफ
लोगों का रुझान बढ़ेगा, मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए सोशल मीडिया का अर्थ वही हो
जाएगा, जो कि अब ब्लॉग के लिए हो गया है। सवाल है कि कैग की रिपोर्ट के साथ ही
न्यू मीडिया और इंटरनेट कंटेंट पर जब लगाम लगा दी गयी, तो आपने कहीं सुना कि
मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसका विरोध किया?
*आखिरी बात* कि ये बात सरकार को भी पता है और मीडिया को भी कि फेसबुक, ट्विटर
जैसे सोशल मीडिया और इस मिजाज के फीचर के कारण इस देश में मोबाइल और इंटरनेट
का कारोबार कितना बढ़ा है और इससे कितने कमीशन और विज्ञापन के स्पेस पैदा होते
हैं? आप और हम सरोकार के मसले पर ही उलझ कर रह जाइए लेकिन फिक्की-केपीएमजी की
अब रिपोर्ट भी आनी शुरू हो गयी है कि इसके बिना पर बाजार की वॉल्यूम कितनी
बढ़ने जा रही है? सरकार और मीडिया बाजार में उस शख्स की तरह बिस्किट लेकर चलता
है कि रास्ते में कुत्ते भौंकते जाएंगे और उन्हें पीछे पड़ने देने के पहले ही
बिस्किट गिराते जाना है। हम मीडिया और सरकार के लिए वही कुत्ते हैं, जो थोड़ी
देर तक भौंक सकते हैं लेकिन आगे या तो उसी बिस्किट से या तो चाबुक से सुस्त
पड़ जाएंगे। आप बताइए न, सरकार की ओर से आये दिन मीडिया में अश्लीलता और
धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचानेवाली सामग्री पर चर्चा होती है और नियम बनाये
जाते हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन चैनलों की मॉनिटरिंग के लिए जो टीम
गठित की है, उनकी ओर से पचास हजार फॉल्ट दर्ज की जाती हैं और महीने-दर-महीने
वो आखिर में आकर तीस भी नहीं बचती है। बिग बॉस के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाती
है और समाचार चैनलों को निर्देश देती है कि डेढ़ मिनट से ज्यादा फुटेज नहीं
दिखा सकते और चैनल अगले ही दिन आधे घंटे की स्टोरी प्रसारित कर देता है। कोई
कहने-सुननेवाला नहीं है। ऐसे में, इस पूरे प्रकरण में मेरी अपनी समझ सिर्फ
इतनी ही बनती है कि या तो ढीठ बनकर कि कुछ नहीं होगा, लिखते रहिए जो लिखना
चाहते हैं, जैसा कि कल एनडीटीवी इंडिया पर कार्टूनिस्ट तैलंग ने कहा कि जूते
मारते रहिए या फिर अभी से ही सहम जाइए कि सरकार के खिलाफ चूं तक नहीं करना है।
लेकिन बस अपील है कि ऐसा करते हुए दोनों ही स्थिति में मेनस्ट्रीम मीडिया की
आस में मत रहिए क्योंकि उसकी जुबान बदलते देर नहीं लगेगी। आज आपके साथ है, कल
सरकार विरोधी को आतंकवादी बताने में एक मिनट नहीं लगाएगा।
मूलतः प्रकाशित-
mohallalive<http://mohallalive.com/2011/12/07/kapil-sibal-is-an-idiot/>
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