[दीवान]टुडे इन इण्डिया, नो मीडिया ... नो अंडरवर्ल्ड

Ashish Kumar 'Anshu' ashishkumaranshu at gmail.com
Wed Dec 7 15:45:06 IST 2011


‘इंडिया टुडे’ के किसी संपादक को लेकर शायद ही इतनी चर्चा पहले कभी हुई हो,
जितनी दिलीप मंडल के संपादक बनने पर इन दिनों हो रही है। दिलीपजी जो मीडिया को
अंडरवर्ल्ड कहकर दलाली का अड्डा बताते रहे, मीडिया के अंदर बैठे लोगों पर सवाल
उठाते रहे, एक समय उनसे यह उम्मीद जगी थी कि वे वैकल्पिक मीडिया को मुख्यधारा
की मीडिया के समानान्तर खड़ा करने की कुवत रखते हैं। लेकिन अचानक पाला बदलकर
दिलीप मंडल मुख्य धारा की मीडिया के कमण्डलधारी क्यों हो गये? मुख्यधारा की
मीडिया को गंदा धंधा बतानेवाले दिलीप मंडल उसी धंधे में क्यों उतर गये?

उनके फेसबुक वॉल पर डाले गए एक-एक कमेन्ट पर दहाई को पार कर कमेन्ट सैकड़ा में
आते रहे हैं। उन्हें लोग फेसबुक एक्टिविस्ट के तौर पर जानने लगे थे। वैसे उनके
इंडिया टुडे में जाने पर हम जैसों की आपत्ति नहीं है, सवाल सिर्फ इसलिए है
क्योंकि दिलीप मंडल अब एक संस्था में बदल गए थे। उनके लिखे पर एक बड़ा समाज आंख
बंद करके विश्वास करने लगा था। आईआईएमसी जहां दिलीपजी बच्चों को पत्रकारिता
पढ़ा रहे थे, वहां कई ऐसे उत्साही युवा थे, जिन्होंने दिलीपजी को पढ़कर, उनसे
प्रभावित होकर मुख्य धारा की मीडिया में ना जाने का निर्णय लिया था। दिलीपजी
के इस कदम से उन बच्चों पर क्या बीती होगी?

दिलीपजी को हम जैसे लोगों ने फेसबुक की वजह से ही जाना। उनका जो प्रोफाइल
फेसबुक पर उनकी पहचान बना था, फेसबुक पर लोग-बाग जिस प्रोफाइल की वजह से
उन्हें पहचानते थे, इण्डिया टुडे की नौकरी के साथ क्यो वह प्रोफाइल भी डिलीट
हो गया? क्या इसका अर्थ मान लिया जाए कि उन्हें अपने फेस-बुक एक्टिविज्म पर
अफसोस रहा, और फेसबुक प्रोफाइल डिलीट का अर्थ उनका माफी नामा है? या फिर
दिलीपजी के ही शब्दों में कहूँ कि मीडिया के अंडरवर्ल्ड में शामिल होते -होते
उन्होंने मीडिया के कायदों को कबूल है - कबूल है - कबूल है, कर लिया। अब उनके
पक्ष में लगातार लिखने पढने वालों को भी इस चूक पर जरुर कुछ कहना चाहिए। चूक
पर भले ही लोगों ने कुछ नहीं कहा हो लेकिन उनके पक्ष में कुछ लोगों ने जरूर
लिखा और कहा है। मसलन  डॉ सुनील कुमार सुमन ने लिखा कि पत्रकार,लेखक और
एक्टीविस्ट दिलीप मंडल ‘इंडिया टुडे’ के कार्यकारी संपादक बनाए गए हैं।
सामाजिक न्याय की लडाई में दिलीपजी अपनी पूरी वैचारिक ऊर्जा और कमिटमेंट के
साथ लगातार सक्रिय हैं और बिना किसी की ‘आंय बांय सांय’ पर ध्यान दिए अपने
अभियान में मुस्तैद रहते हैं। अगर हम उनसे यह अपेक्षा करते हैं कि वे ‘इंडिया
टुडे’ में जाकर कोई वैचारिक क्रांति कर देंगे तो यह मंडलजी के साथ ज्यादती
होगी, जाहिर है यह एक नौकरी है। लेकिन वंचित तबके के एक जागरूक व्यक्ति का
यहाँ तक पहुँचना समूचे बहुजन समाज के लिए खास मायने रखता है। दिलीपजी की
प्रखरता और आलोचकीय धार निरंतर बनी रहे, इन शुभकामनाओं के साथ उन्हें ढेर सारी
हार्दिक बधाइयां।’

डॉ सुनील ने नहीं बताया कि कहां गया उनका वह अभियान जिसके लिए वे बिना किसी
‘आंय बांय सांय’ पर ध्यान दिए मुस्तैद रहते थे और दूसरी बात उनसे वैचारिक
क्रांति की बात सोचना क्यों उनपर ज्यादती होगी। इसका मतलब पिछले डेढ़ साल से
दिलीपजी स्वयं जो कर रहे थे, वह ‘नौकरी’ करने वालों पर ज्यादती ही थी? दिलीपजी
को वंचित दलित पीड़ित बताने वाले लोग भी यह जानते हैं, वे किस तरह की चालाकी कर
रहे हैं। दिलीपजी स्वयं कहते हैं कि बुद्धिजीवी दलित नहीं होता। बुद्धिजीवी,
बुद्धिजीवी होता है। कभी दिलीपजी का परिचय दलित चिन्तक के नाम से गया हो तो
बताइएगा, वे स्वयं इसके विरोधी रहे और आज उनके पक्ष में माहौल बनाने के लिए
लोग उनके दलित होने को  हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। दूसरी बात दिलीपजी
को इंडिया टुडे की नौकरी दलित होने की ‘काबलियत’ की वजह से नहीं मिली है।
उन्होंने अपनी योग्यता से इसे हासिल किया है। हो सकता है, उनके प्रतिस्पर्धा
में कई राजपूत, ब्राम्हण, कायस्थ भी रहे होंगे।

वैसे कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव को देखते हुए दिलीपजी
को संपादक बनाया गया है। वे अपने दम पर उत्तर प्रदेश से मोटी रकम ला सकते हैं।
अंडरवर्ल्ड में सिर्फ एक ही भाषा लोगों की समझ में आती है, कमाई की भाषा।
मायावती का दलित कार्ड और दिलीपजी का दलित प्रेम दोनों मिलकर उत्तर प्रदेश के
चुनाव में कुछ ना कुछ नया करेंगे ही।

दिलीप मंडल साहब वाली बातचीत में पत्रकार अरविन्द शेष का यह सवाल भी
महत्वपूर्ण है कि ‘अगर मंगलेश डबराल इंडिया टुडे के संपादक बनते तो इस पर आप
सबकी प्रतिक्रिया क्या होती? इसका जवाब मोहल्ला के मॉडरेटर अविनाश दास की तरफ
से कुछ यूं था- ‘मंगलेश डबराल घटिया संपादक होते। दिलीप मंडल मंगलेश डबराल से
अधिक डिजर्व करते हैं। दिलीप मंडल की सामाजिक-राजनीतिक समझ मंगलेश डबराल के
मुकाबले कहीं अधिक तीक्ष्ण, तार्किक और न्यायसंगत है। लेकिन अरविंद जी, लोग
इसलिए भौंचक हैं - क्योंकि खुद दिलीप मंडल कॉरपोरेट मीडिया को दलाली की गली के
रूप में रेखांकित करने लगे थे।’

अरविन्द शेष आगे कहते हैं- जहां तक मेरी जानकारी है, दिलीप जी ने करीब साल भर
पहले मुझे बताया था कि कम से कम तीन बार उनका फेसबुक अकाउंट हैक करने जैसी
कोशिश हो चुकी है और लगता है कि अब दूसरे अकाउंट के जरिए काम करना होगा। करीब
डेढ़ दो महीने पहले उनके नाम से कई जगहों (फेसबुक पर) पर वैसी टिप्पणियां आईं,
जिन्हें उनके मुताबिक उन्होंने नहीं की थी। उन्हें लगा कि कोई गड़बड़ है और
उन्होंने वह अकाउंट बंद कर दिया। यह इंडिया टुडे की नौकरी... के साथ नहीं,
बल्कि उससे काफी पहले की बात है। अब वे अपने एक दूसरे अकाउंट से काम कर रहे
हैं। लेकिन अगर वे चुप भी होंगे तो मैं हड़बड़ी में यह नहीं कहूंगा कि यह उनका
माफीनामा होगा। यह सिर्फ उन लोगों के लिए परेशान होने वाली बात है जिन्होंने
उन्हें फेसबुकिया एक्टीविस्ट घोषित कर रखा था।’

वैसे अरविन्द भाई की बातों से पूरी तरह सहमत होने के बावजूद कुछ सवाल अब भी
अनुत्तरित ही हैं. पहला उनकी प्रोफाइल पर सक्रियता कंम होने को लेकर यहां सवाल
नहीं है, उनका पूरा का पूरा प्रोफाइल ही गायब है। क्या यह किसी हैकर की वजह से
हुआ? क्योंकि दिलीप जी जो पोस्ट डाल रहे थे, वह बेहद महत्वपूर्ण थी, उनका
फेसबुक प्रोफाइल हैक हो जाना बड़ी बात है. किसी भी मुद्दे पर उनकी बात सुनी
जाती है, क्या पूरे का पूरा प्रोफाइल कोई हैक करके डिलीट कर दे और दिलीपजी एक
शब्द ना कहे, यह विश्वसनीय है? दूसरी बात नए अकाउंट में उन्होंने पुराना
अकाउंट डिलीट करने के सम्बन्ध में कुछ लिखा है क्या?

इस सारी बात में समर अनार्य की यह टिप्पणी भी महत्पपूर्ण है, बेशक ऐसे कदमों
के अपने खतरे होते हैं जिनमें बिक जाने का खतरा भी शामिल है. और बिकने को तो
फिर दिलीप मंडल ही नहीं, कोई भी बिक सकता है। पर फिर, उम्मीद साईनाथ जैसों के,
अरुंधती जैसों के न बिकने से पालें, या फिर हमारी बुर्जुआ नैतिकता के चरम
विस्फोट में बिकने को ही नियति मान लें? और फिर, दिलीप मंडल अंतिम संघर्षशील
साथी तो हैं नहीं कि अगर वह बिक भी गए (जिसकी उम्मीद मुझे नहीं है) तो बदलाव
के रास्ते बंद ही हो जायेंगे। दिलीप मंडल के ’सम्मानित’ नेताओं में से एक शरद
यादव दशक भर से भी ज्यादा से भाजपा के साथ हैं, तो क्या बदलाव की लड़ाई रुक
गयी? या फिर दिलीप मंडल की राजनीति से उम्मीद रखने वाले सारे शरद के साथ चले
गए?’

बहरहाल असली चिन्ता यही है कि उनके पाले में खड़े लोग भी संभल-संभल कर अपनी बात
रख रहे हैं, मसलन ‘अधिक उम्मीद ना पालें’ और ‘यदि बिक भी गए तो पहले आदमी तो
होगे नहीं’। जब आप इतना कुछ मानने को तैयार ही है तो मेरा भी इससे ज्यादा कुछ
कहने का इरादा नहीं है।

स्त्रोत: http://visfot.com/home/index.php/permalink/5391.html


-- 
आशीष कुमार 'अंशु'
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