[दीवान]ओम थानवी से बातचीत पर आधारित
brajesh kumar jha
jha.brajeshkumar at gmail.com
Mon Jul 11 11:40:54 IST 2011
पिछले दनों प्रधानमंत्री कुछ चुने हुए संपादकों से मिले। इस मुलाकात के बाद जो
राय बनी उसपर कई सवाल हुए। इस बाबत नए-पुराने संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों से
बातचीत हुई है। प्रस्तुत है उसकी पहली खेप-
*मुलाकात का दायरा कुछ ज्यादा ही संकुचित था **: ** ओम थानवी* *(जनसत्ता के
संपादक)*
हमारे देश में ही ऐसा है कि जब संपादकों को प्रधानमंत्री से बातचीत के लिए
बुलाया जाता है तो संपादक उस बातचीत को इस तरह रिपोर्ट करते हैं जैसे कोई
रिपोर्टर किया करते हैं, जबकि संपादकों से खबरों के आर-पार देखने की आशा की
जाती है। प्रधानमंत्री जो कहते है, उसके बीच जो अनकहा है, उसे पकड़ने और
कहे-अनकहे का विश्लेषण करने की अपेक्षा संपादक से पाठक करते हैं। पिछले दिनों
प्रधानमंत्री ने कोई प्रेस वार्ता नहीं बुलाई थी। जिन अखबारों के संपादकों को
वहां बुलाया गया था, वे अपने-अपने अखबारों में जाकर बातचीत के हवाले से टिप्पणी
लिख सकते थे।
संपादकों से प्रधानमंत्री की मुलाकात को लेकर जो कवायतें हुईं, वह पीआर की कसरत
जैसी थी। इस मुलाकात को लेकर मैं सोचता हूं कि यदि बातचीत छपने के मकसद से की
जाती है तो प्रधानमंत्री को संपादकों की बजाय वरिष्ठ प्रत्रकारों और
प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज को कवर करते वालों से बातचीत करनी
चाहिए, क्योंकि
इससे सवाल-जवाब का सिलसिला बनता है। वे लोग प्रधानमंत्री के ज्यादा संपर्क में
हैं, उनके काम-काज को अधिक नजदीक से देखते हैं और सवाल भी खड़े कर सकते
हैं,जिससे प्रधानमंत्री की तरफ से ऐसी बातें निकलकर आ सकती हैं, जिनसे
बड़ी खबर
बनती हो।
संपादकों के साथ बातचीत तो आमतौर पर अनौपचारिक होती है। संपादक रिपोर्टर नहीं
होते, लेकिन यह अजीबोगरीब स्थिति हमारे यहां ही है कि संपादक से अपेक्षा की
जाती है कि अगर प्रधानमंत्री से बातचीत करें तो एक रिपोर्टर की तरह उस बातचीत
से निकलने वाले खबरी तत्वों को बीन लें और पाठकों-दर्शकों के सामने रखें। आप
देखेंगे कि जब प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर जाते हैं तो उस समय भी हमारे देश के
संपादक उनके साथ रिपोर्टिंग के लिए जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि और किसी देश
में ऐसा होता होगा। हमारे यहां अमेरिका के राष्ट्रपति आते हैं। मुझे याद नहीं
पड़ता कि कभी ‘न्यूयार्क टाइम्स’ और ‘वाशिंगटक पोस्ट’ के संपादक अपने
राष्ट्रपति के साथ रिपोर्टिंग करने के लिए यहां आए हों। ऐसा नहीं है कि एक
संपादक अच्छा रिपोर्टर नहीं हो सकता, लेकिन जब किसी काम के लिए विशेषज्ञ
रिपोर्टर तैनात है तो यह काम भी उन्हीं के जिम्मे आता है। प्रधानमंत्री चाहे
देश में बोल रहे हों या विदेश जाकर, पीएमओ कवर करने वाले संवाददाता की
जिम्मेदारी होती है कि वे इसकी रिपोर्टिंग करें। यह संपादक की जिम्मेदारी नहीं
है। संपादक के साथ अनौपचारिक बातचीत प्रधानमंत्री कर सकते हैं, संपादको को इससे
प्रधानमंत्री का मानस समझने में मदद मिल सकती है, लेकिन खबरों के प्रकटिकरण के
लिए, उनके प्रसार के लिए प्रधानमंत्री को वरिष्ठ पत्रकारों से मिलना चाहिए। न
कि संपादकों से। देवगौडा और वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तो उनके साथ संपादकों
की बातचीत में मैं शामिल हुआ। वह बातचीत हमेशा अनौपचारिक होती थी। उसमें
सवाल-जवाब भी होते थे, पर अनौपचारिक माहौल में ही, प्रेस वार्ता की शक्ल में
नहीं।
प्रधानमंत्री और संपादकों के बीच बेहतर संबंध बने, इसकी कोशिश प्रधानमंत्री के
सलाहकार करते हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं है, लेकिन मेरे ख्याल में ऐसा पहली बार
हुआ है कि प्रधानमंत्री पांच-पांच संपादकों के समूह से मिलें और उनके सवालों का
जवाब दें। मुझे हैरानी होती है कि देश में इतने संपादक हैं उन सबों से एक-एककर
मिलने में प्रधानमंत्री का कितना समय व्यतीत होगा। उन संपादकों में अनेक ऐसे
हैं जो अपने अखबारों या टेलीविजन चैनलों के मालिक हैं या फिर उनकी पूंजी में
भागीदार हैं। ऐसे लोगों के अपने स्वार्थ होंगे ही, तो जब वे इस तरह के संवाद
में हिस्सा लेने प्रधानमंत्री के घर जाएंगे तो सवाल पूछने से ज्यादा उनकी
दिलचस्पी उनसे अच्छे संबंध बनाने की होगी। इस तरह दोनों तरफ से ऐसी मुलाकातें
संबंध गांठने की कार्यवाही ज्यादा होकर रह जाएगी।
एक और बात है, प्रधानमंत्री के मानस को समझने की उम्मीद संपादक से होती है। वह
रिपोर्टर के रूप में पेश हो जाएं तो उनका समय ऐसे काम में व्यतीत होगा जिसे
कहीं ज्यादा रचनात्मक काम में लगाया जा सकता है। वैसे भी इस तरह की बातचीत का
केवल एक दौर पर्याप्त हो नहीं सकता तो क्या प्रधानमंत्री बारंबार संपादकों के
इन समुहों से मिलेंगे। प्रधानमंत्री का काम खबरें बांटना नहीं है, लेकिन
पत्रकार का स्वभाव प्रधानमंत्री से हर बातचीत में और हर जगह खबर का तत्व ढूंढ़ना
जरूर है। प्रधानमंत्री के पास अगर इतना समय मीडिया के लिए निकलता है तो वे
अपेक्षया बड़े समुहों के वरिष्ठ पत्रकारों से रू-ब-रू हों, न कि चुनिंदा
संपादकों के समूह से। प्रधानमंत्री की अबतक की प्रेस वार्ता का कलेवर यदि बहुत
विराट होता था तो संपादकों के साथ प्रेस वार्ता जैसी इन मुलाकातों का दायरा कुछ
ज्यादा ही संकुचित नजर आता है।
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