[दीवान]देवदत्त से बातचीत

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Mon Jul 11 11:50:25 IST 2011


*संपादकों ने अपनी नई भूमिका चुनी है- देवदत्त ** (**वरिष्ठ पत्रकार)*

प्रधानमंत्री ने संपादकों से अपनी बात कहने के लिए बुलाया था। इसके लिए
चार-पांच बड़े राष्ट्रीय अखबारों को ही चुना। पर इसकी कोई जरूरत नहीं थी। वे
प्रेस वार्ता करते, जहां खुले सवाल होते और खुली बातचीत भी होती। यह तो किसी
पत्रकार वार्ता से अधिक प्रधानमंत्री का अपना पीआर था। पहले भी संपादक
प्रधानमंत्री के पास जाते थे और उनसे बातचीत करते थे। जवाहरलाल नेहरू और
शास्त्रीजी के समय भी ऐसा होता था। वरिष्ठ पत्रकार निजी तौर पर भी जाते थे।
प्रधानमंत्री से बातचीत करते थे। इससे आपस में समझ बनती थी। पर, प्रधानमंत्री
का पीआर करना पहली बार हुआ है। मेरी समझ से यह नए लोगों का अपना नया ढंग है।
संपादकों की नई सोच है।


मेरा कहना यह है कि प्रधानमंत्री को अगर अपना पीआर करना है तो वह करें, पर उनका
यह माध्यम गलत है। संपादकों ने बाहर आकर प्रधानमंत्री के जिस मत को जाहिर किया
उससे आज के राजनैतिक माहौल या गतिविधियों पर अधिक रोशनी नहीं पड़ती। ऐसा पहली
बार ही हुआ है, जब प्रधानमंत्री संपादकों के एक समूह को अपने विश्वास में लेकर
पीआर करा रहे हैं। मेरी याद में तो ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। प्रधानमंत्री ने
राष्ट्रीय मीडिया को अधिक महत्व दे दिया है। हालांकि आज के दौर में उसका स्थान
स्थानीय मीडिया का भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे ऐसा
प्रतीत हो रहा है कि अब संपादक भी मत निर्माण के कार्य में एक कारक बनना चाहते
हैं। वे अपने स्वाभाविक कार्य पत्रकारिता से आगे की गतिविधि में भाग ले रहे
हैं। यह एक नया रिवाज शुरू हुआ है।


बतौर संपादक उन्हें जो करना है वह वे अपने अखबार के माध्यम से लिख-बोल कर करें,
लेकिन उनका जनता के बीच जाकर मत निर्माता बनना बिलकुल नया है। यह पत्रकारिता
परंपरा में नहीं है।
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