[दीवान]परिचर्चा में मधुकर उपाध्याय

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Mon Jul 11 13:11:11 IST 2011


*लिखना या बोलना चाहिए तो अपनी पत्रकारिता के माध्यम से**: ** मधुकर उपाध्याय**
*(वरिष्ठ पत्रकार)

संपादकों की प्रधानमंत्री से मुलाकात शायद ऑफ दी रिकार्ड थी। पर ऐसी कोई भी
मुलाकात चाहे वह ‘ऑन द रिकार्ड’ हो या फिर ‘ऑफ द रिकार्ड’ बातचीत के दौरान अपना
बेहतर पक्ष ही रखेगा। यदि आप ऐसी किसी भी बातचीत से बाहर निकलकर बोलेंगे तो
आपके पास नकारात्मक कहने को ज्यादा कुछ नहीं होगा। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री
ने अपनी बातों को जिस तरह व्यक्त किया, ठीक उसी तरह इन संपादकों ने भी बाहर आकर
बातों को रखा। इस तरह वे वही काम कर गए जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय को करना
चाहिए था। तब बहुत सारे लोगों को ऐसा लगेगा कि वह प्रवक्ता की तरह बात कर रहे
हैं।


अब सवाल यह उठता है कि संपादकों को बाहर आकर इस तरह की बातें करनी चाहिए थी या
नहीं ? क्या वहां कोई ऐसे सवाल भी हुए, जिसपर इन लोगों ने कुछ नहीं कहा। यह
मुख्य बात है। इस तरह की मुलाकातें विदेशों में अकसर होती हैं। पर वहां कोई
पत्रकार इस तरह मीडिया में हीरो नहीं बनता। इससे संपादक का पद सवालों के घेरे
में आता है। यदि आप किसी के प्रवक्ता होना चाहते हैं तो यह अलग बात है। अगर
आपने अपने सोचने, समझने और विचार करने की शक्ति को छोड़ना तय कर लिया है तो कोई
क्या कर सकता है। हालांकि इससे पत्रकारिता की छवि पर सवाल नहीं उठाया जा सकता
है। यह व्यक्तिगत विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। इससे पत्रकारित की छवि पर
कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसी व्यक्तिगत मुलाकात सौ फीसद ऑफ द रिकार्ड थी। हां, अगर
आपको लगता है कि इस पर लिखना या बोलना चाहिए तो अपनी पत्रकारिता के माध्यम से
कहते।


यह प्रधानमंत्री के साथ संपादकों की पहली बैठक है और ऐसा भी नहीं है कि
संपादकों ने बाहर आकर पहली बार कुछ कहा हो। पहले भी ऐसा हुआ है। सवाल यह है कि
आप किस बात को उठा रहे हैं। क्या प्रधानमंत्री ने केवल इतना ही कहा और उनसे
इतना ही पूछा गया था,  जिससे सारी सकारात्मक बातें ही सामने आईं। पूरी दुनिया
में वरिष्ठ पत्रकारों की प्रधानमंत्रियों,  राष्ट्रपतियों से मुलाकातें होती
हैं। इसका मतलब यह तो नहीं है कि बाहर आकर आप एक खुशनुमा तस्वीर पेश करने लगें।
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