[दीवान]परिचर्चा में प्रदीप सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Mon Jul 11 13:19:58 IST 2011


*संपादकों का व्यवहार प्रोफेशनलिज्म से परे** :  **प्रदीप सिंह*  ( वरिष्ठ
पत्रकार)

कुल पांच संपादक प्रधानमंत्री से मिलने गए थे, उनमें से तीन संपादकों ने मीडिया
से कोई बातचीत नहीं की। उनका जो व्यवहार था, वह प्रोफेशनल था। पत्रकारिता के
मानक के अनुरूप था। उनसे यही अपेक्षा भी थी कि प्रधानमंत्री से बातचीत के बाद
उनकी जो राय बनी है उसे वे अपने अखबार, एजेंसी या फिर पत्रिका जिससे जुड़े हैं
उसमें लिखेंगे और अपने पाठकों को बताएंगे। किसी से यह अपेक्षा नहीं थी कि वे
सरकार के प्रवक्ता की तरह बोलने लगेंगे। सरकार के लिए वह बड़ी अच्छी स्थित होती
है जब पत्रकार खास तौर पर वरिष्ठ पत्रकार सरकार के प्रवक्ता की तरह बोलने लगे।

प्रधानमंत्री या सरकार का तो काम ही है कि वह अपना पक्ष रखे और अपने पक्ष से
ज्यादा से ज्यादा लोगों को सहमत करे। अब अगर आप मीडिया में हैं तो आपकी
जिम्मेदारी है कि एक निरपेक्ष आकलन लोगों के सामने प्रस्तुत करें। यह बताएं कि
सरकार जो कह रही है और जो कर रही है, उसकी जो नीति और नियत है उसमे क्या फर्क
है। या फिर दोनों एक है। जनता को यह बताने की जिम्मेदारी मीडिया की है।


हालांकि उनके इस व्यवहार से लोगों के मन में जो पत्रकारों की छवि है उसमें कोई
खास बदलाव नहीं आने वाला है। इससे सिर्फ यह लगेगा कि सरकार के प्रति झुकने के
लिए काफी लोग बहुत जल्दी तैयार हैं। जिन लोगों ने प्रधानमंत्री से बातचीत की
उनके प्रोफेशनल कमिटमेंट पर हम सवाल नहीं उठा सकते। वे बड़े पत्रकार रहे हैं।
हो सकता है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा उससे वे पूरी तरह सहमत थे। फिर भी अच्छा
होता कि वे अपनी बात संबद्ध अखबार के जरिए कहते।



आमतौर पर होता यह है कि प्रधानमंत्री खुली प्रेस वार्ता बुलाते हैं या फिर ऑफ
दी रिकार्ड ब्रिफिंग करते हैं। कोई बहुत गंभीर मुद्दा हो जैसे- देश की सुरक्षा
का मामला या देश की अर्थव्यवस्था से सम्बंधित कोई बड़ा फैसला करना हो तो उससे
पहले एक तरह की बातचीत होती है। इसका उद्देश्य स्थिति को समझना होता है, लेकिन
इस तरह का प्रयोग पहली बार हुआ है। सिर्फ पांच लोगों को बुलाया गया। यह चुनाव
किस आधार पर हुआ, यह सरकार जानती होगी। खैर, बुलाया गया और प्रधानमंत्री से
बातचीत हुई तो उन संपादकों से अपेक्षा थी कि वे अपने अखबारों में विचार रखेंगे,
जिससे लोगों को पता चलेगा की प्रधानमंत्री की क्या राय है। विभिन्न विषयों पर
जो विवाद उठ खड़ा हुआ है उसपर प्रधानमंत्री क्या राय रखते हैं। पर ऐसा नहीं
हुआ। मालूम होता है कि यह प्रयोग मीडिया को मैनेज करने के लिए किया जा रहा है।
अब यह मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह मैनेज होता है या नहीं। यदि प्रतिशत में
इसे देखें तो पांच में से दो संपादक ऐसे थे जो मीडिया के सामने बोले। इस तरह
साठ प्रतिशत मीडिया तो मैनेज नहीं हुआ। मतलब बहुमत तो मैनेज नहीं हुआ।


प्रथम प्रवक्ता
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