[दीवान]विकास के मॉडल पर हो सार्थक बहस
Ashish Kumar 'Anshu'
ashishkumaranshu at gmail.com
Mon Nov 21 21:20:28 IST 2011
*आज विकास बहस का बड़ा मुद्दा बना है. कुछ लोग इसे विकास की राजनीति कहते हैं.*
दूसरे शब्दों में हम इसे विस्थापन की राजनीति कह सकते हैं. जल-जंगल और जमीन के
मुद्दे पर दो अक्टूबर से शुरू पूरे साल तक चलते वाली हमारी जन सत्याग्रह
यात्रा कन्याकुमारी से दिल्ली की तरफ बढ़ रही है. देश के विभिन्न हिस्सों में
हम किसी ना किसी ऐसे ही संघर्ष को देख रहे हैं. यह बात तो हम जैसे बहुत से
लोगों ने बहुत पहले ही समझ ली थी कि जो लोग विकास के इस मॉडल की कीमत चुका रहे
हैं, उन्हें बदले में कुछ मिल नहीं रहा है. वे वही लोग हैं, जिन्होंने विकास
के लिए अपनी वह जमीन खोई है, जहां उनके पुरखे रहते थे और जिस मिट्टी की
संस्कृति से उनकी पहचान हुआ करती थी.
हमने कोयला मंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध कर चुके हैं कि खनन की नई अनुमति से
पहले पुनर्वास पर विचार कीजिए. हमारा वन अधिकार कानून आदिवासियों के साथ
ऐतिहासिक अत्याचार का दस्तावेज बन गया है. उम्मीद है सरकार द्वारा इस अत्याचार
पर पाबंदी की व्यवस्था होगी या इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा. वैसे
आदिवासियों पर अत्याचार सिर्फ कोयला से जुड़ी कहानी नहीं है. इस तरह की
सैकड़ों कंपनियां हैं, जो अपने फायदे के लिए जमीन से नीचे हर चीज खोदकर निकाल
लेना चाहती हैं.
प्रोफेसर प्रवीण झा के नेतृत्व में बैंकाक की एक संस्था के साथ भिलाई और उसके
आस-पास खनन और उससे हुए विस्थापन से जुड़ा एक अध्ययन किया गया था, जिसमें यह
तथ्य सामने आया कि विस्थापन के बाद एक खास आदिवासी समूह का कोई सुराग नहीं मिल
पा रहा है. यह समुदाय उसी जगह रहता था, जहां आज ‘भिलाई स्टील प्लान्ट ऑफ सेल’
है. आजादी के ठीक बाद से देश में बिना रुकावट और चुनौती के विस्थापन जारी रहा.
अब जाकर जन जागरूकता के तहत अलग-अलग जगहों पर पीड़ितों ने विस्थापन को लेकर
सवाल उठाने शुरू किए हैं.
लोग विस्थापित हुए हैं, बड़ी बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर. तमिलनाडु के
कुडनकुलम का उदाहरण उनमें से एक है. यहां प्रस्तावित पावर प्लान्ट न सिर्फ
विस्थापित होने वालों के लिए मुसीबत है बल्कि जो लोग पावर प्लान्ट के आस पास
रहते हैं, उनके अंदर भी इसे लेकर दहशत है क्योंकि वे लोग जानते हैं कि जापान
के फुकुशिमा और रूस के चेनरेबिल के न्यूक्लियर प्लान्ट में क्या हुआ था?
उन्हें यह भी पता है कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड प्लान्ट के पीड़ितों के साथ
इस देश ने क्या किया? थिरूवन्नमाली जिले के अंदर कुप्पनाट्टम गांव के एक सौ
साठ परिवारों ने छोटे से बांध के लिए अपनी उपजाऊ जमीन खो दी और इन्हें मुआवजे
के तौर पर मात्र पचास हजार रुपए दिए गए. पैसे लेने वाले किसान बखूबी जानते थे
कि रकम जमीन के मुकाबले कम है और वे ठगी के शिकार हो रहे हैं. वे यह भी जानते
थे कि बांध से उन्हें बहुत लाभ होने वाला नहीं है. वे बार-बार सवाल पूछ रहे
हैं- हमें क्यों अपना जीवन और बच्चों का भविष्य ऐसी परियोजना या विकास मॉडल के
लिए दांव पर लगा देना चाहिए जो हमारे किसी काम का नहीं है? इसका सरकार कोई
जवाब नहीं दे पा रही है.
सरकार जिन परियोजनाओं पर विचार करती है दुर्भाग्य से उन पर उन लोगों की राय तक
नहीं लेती, जिनकी जमीने जाती हैं. यानी जो सीधे-सीधे प्रभावित होते हैं. अक्सर
परियोना की खबर प्रभावितों को तब मिलती है, जब उसे सरकार से हरी झंडी दे दी
जाती है. एक लोकतांत्रिक देश में इस तरीके से आर्थिक समृद्धि और जनहित के नाम
पर लादे जा रहे विकास को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? जनता के हित में क्या
है और क्या नहीं है, इसे कुछ नौकरशाह मिलकर कैसे तय कर सकते हैं? बात जनहित की
है तो फैसला भी जनता ही करे, जिसके हित में फैसला किया जा रहा है.
http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/133866/development-models-discussion-movement-satyagraha.html
--
आशीष कुमार 'अंशु'
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