[दीवान]झारखण्ड: संगीनों पर सुरक्षित गांव
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Tue Apr 24 06:31:50 IST 2012
यह मार्च की पतझड़ का मौसम है. पेड़ों की पत्तियां सूख कर गिरचुकी हैं और रात
के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूलचुके हैं. झारखण्ड झाड़ों
का प्रदेश है और यहां घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि यहां राज्य,
नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुकेहैं. यह गढ़वा और लातेहार के बीच
की कोई जगह है. मेरे साथ दैनिक भास्करके पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने
पहले माओवादी होने के आरोप मेंपुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जा चुका है. सड़क
जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के
नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार
करती है. हम मोटरसाईकल को बार-बार रोक, पीछे मुड़ करदेखते हैं और स्वाभाविक भय
के साथ आगे बढ़ जाते हैं. सूखी पत्तियों परघूमते पहिए किसी के पीछा करने का
आभास देते हैं. यह पहियों के रौंदने सेपत्तियों के चरमराने की आवाज है. साखू
के फूल पूरे जंगल को खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और
आनंद पर भारी होता है. सतीश को इन इलाकों में जंगली जानवरों का उतना भय नहीं है
जितना कि कोबरा बटालियन का, जो कई बार ग्रीन हंट अभियान के दौरानरात को जंगलों
में रुक जाते हैं. यह अभियान “माओवादियों के सफाए” के लिएइन इलाकों में पिछले
दो वर्षों से चलाया जा रहा है. सतीश एक घटना का जिक्रकरते हैं जिसमे सी.आर.पी.
एफ. ने एक गूंगे बहरे चरवाहे की कुछ दिन पहलेगोली मारकर हत्या कर दी है. २०-२५
कि.मी. भटकने के बाद हमे वह रास्तामिल जाता है जिसके सहारे हम जंगल से बाहर
निकल पाते हैं. पूरी रिपोर्ट पढने के लिए... क्लिक करें.... दखल की
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chandrika c/o krishna rao nakhale
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