[दीवान]स्वागत कीजिए बिग बी का, वो विदर्भ को टेंशन फ्री कर रहे हैं
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon May 14 12:47:09 IST 2012
अमिताभ बच्चन ने विदर्भ के किसानों को कर्ज मुक्त करने का बीड़ा उठाया है.
उनकी संस्था इस काम के लिए जोर-शोर से काम कर रही है..न्यूज चैनलों पर ये खबर
ढोल-नगाड़े की तरह पीटने शुरु हो गए हैं. काश, न्यूज चैनलों की माइक में भी
ढोल होते जिससे कि चैनल के संवाददाता खबर के पहले पीटते- सुनो-सुनो-सुनो..आखिर
ये दुदुंभी सिर्फ एंकर ही क्यों बजाए,सिर्फ न्यूजरुम में ही ढन-ढन की आवाज
क्यों हो ? मीडिया के लिए ये सरोकारी चेहरे ( बॉलीवुड) खोजने का दौर है. इन
चेहरों में भी वरायटी जरुरी है. एक अकेले आमिर से दर्शक बोर नहीं हो जाएंगे
क्या ? और फिर आमिर तो दूसरे एनजीओ को प्रोमोट करते हैं, जिसके अपने हैं वो
क्यों न करें ? सलमान खान वीइंग ह्यूमन लेकर कहां सेंटिंग में पड़े हैं,
उन्हें भी आगे आना चाहिए.
ये दरअसल केबीसी के आने के पहले की तैयारी है. सरोकार के आगे इस सीजन में बाकी
के लटके-झटके अपदस्थ हो गए हैं. कल संभव है बॉलीवुड में टिकने का पैमाना अभिनय
में निष्णात होने के बजाय सरोकारी दिखने से तय होने लगे. न्यूज चैनलों को अभी
से ही पाला-पोसा जा रहा है ताकि केबीसी की स्थिर छवि से अलग वो मजबूत सरोकारी
छवि बने जिससे कि लोगों के बीच भरोसा पैदा हो कि गरीबी मनमोहन सिंह के
अर्थशास्त्र और मोंटेक सिंह आहलूवालिया की योजनाओं से नहीं, अमिताभ बच्चन के
सवालों के जबाव देने से दूर होंगे. आप सरकार से किसी बात का सवाल मत कीजिए,
सरकार ( अमिताभ बच्चन की फिल्म भी है संयोग से) के सवालों के जबाव भर दीजिए.
आपने देखा नहीं मोतिहारी के सुशील कुमार को. कैसे लग गया यूपीएससी की तैयारी
में इत्मिनान होकर. आपसे हमसे ज्यादा देरिदा,फूको औऱ ग्राम्शी की किताबें
खरीदकर सजाने की हैसियत रखता है.
वैसे तो केबीसी ने इस गेम शो को सरोकार से जोड़ने का काम आनेवाले एपीसोड से
ठीक पहले ही कर दिया था लेकिन उसके बीज कुछ इस तरह से डाले गए कि वो कांग्रेस
का "जय हो" वाले विज्ञापन के फूल खिलकर स्क्रीन पर चमके. वो नेहरु का समाजवादी
गुलाब बनकर रह गया, कमल की शक्ल में खिला नहीं जो कि दो-चार राज्यों के लिए
जरुरी है. अबकी बार सब तरह के फूल खिले जो कि निश्चित तौर पर सत्यमव जयते से
प्रेरित होगा, किसी एक रंग का खिलने के बजाय बराबर की खेती हो.
भरोसा कीजिए,यकीन मानिए..बॉलीवुड के इन्हीं सूरमाओं के जरिए देश की तकदीर
बदलनी है. आप इसमें खोट मत देखिए. आप ये सवाल मत कीजिए कि दिन-रात "एक बार आइए
तो गुजरात"( पतंग उड़ाने के लिए मोदी से सवाल करने नहीं) की अपील करनेवाले
अमिताभ विदर्भ की चिंता सीधे सरकार से व्यक्त क्यों नहीं करते ? आखिर किस
उम्मीद से गुजरात को इतना खुशहाल बताते हैं और दूसरी तरफ हालात सुधारने के लिए
प्रतिबद्ध हो रहे हैं. आप सवाल मत कीजिए क्यों सवाल समाज का खलनायक है जिसकी
नियति है कि वो नायक के हाथों मरे.
सवाल करनेवाले तो अभी भी सवाल कर रहे हैं कि भाई तुमने दूरदर्शन पर लाइव (
जबकि तब लाइव बहुत बड़ी बात होती थी ) क्यों कहा था कि ये मेरी मां का खून हुआ
है और इसके छींटे इनके हत्यारों पर भी पड़ने चाहिए. खून का बदला खून. कितना
खतरनाक होता है कई बार जब पर्दे का नायक, असल जिंदगी में नायक की भूमिका में आ
जाता है. हमें बहुत डर लगने लगता है तब..खलनायकों को खत्म करने के लिए
प्रतिबद्ध इन नायकों से सच में बहुत डर लगता है. फिलहाल, इस वीडियो से गुजरें,
फिर सवाल से गुजरे. क्या पता नायक के हाथों मौत सवाल पैदा होने की परंपरा को
खत्म कर दें.http://www.youtube.com/watch?v=wDgPwxt24hY
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