[दीवान]मीडिया ट्रेनिंग के नाम पर बंधुआ मजदूरी

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Aug 19 21:52:59 CDT 2013


1. आपको लगता है कि ये अखबार और टीवी चैनल के धंधे में लगे संस्थान जब मीडिया
स्कूल नाम से दूसरी दूकान खोलते हैं तो प्रोफेशनल पैदा करते हैं जिन्हें खबर,
कैमरे,प्रोडक्शन आदि की बेहतरीन समझ होती है..वो क्या ट्रेनिंग देते हैं,ये तो
हमें स्क्रीन और अखबार के पन्ने पर दिखाई देता ही है लेकिन वो एकमुश्त
बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं. मसलन पिछले बैच में टीवी टुडे नेटवर्क ने
कुल 35 लोगों को टीवीटीएमआई में दाखिला लिया और सिर्फ 4 लोगों को प्लेसमेंट
दी. इस बार कुल 95 लोगों को लिया है, अभी उनके कोर्स शुरु होने के एक ही दिन
हुए हैं कि वहां भी भारी छंटनी की संभावना जतानी शुरु हो गई है. ऐसे में इन 95
का क्या भविष्य है, आप समझ सकते हैं.

2. मेनस्ट्रीम मीडिया के अखबारों औऱ चैनलों ने मीडिया स्कूल की जो दूकान खोली
है, आप कोशिश करके एक सूची बनाएं कि अब तक किस संस्थान ने कितने छात्रों को
मीडियाकर्मी की ट्रेनिंग दी है और उनमे से कितने लोगों को नौकरी पर रखा.आपको
प्रोफशनलिज्म और हन्ड्रेड परसेंट प्लेसमेंट के बड़े-बड़े दावों के बीच का सच
निकलकर सामने आ जाएगा.

3. मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल अपने छात्रों को ट्रेनिंग और फर्स्ट
हैंड एक्सपीरिएंस के नाम पर उन्हें बंधुआ मजदूर बनाकर छोड़ देते हैं. उनसे
लाखों में फीस लेते हैं और आए दिन जो उनके कार्यक्रम होते हैं, अपने अखबार या
चैनल की टीशर्ट पकड़ाकर जमकर काम लेते हैं. माफ कीजिएगा, इसमे सबसे ज्यादा
बुरी हालत गर्ल्स स्टूडेंट की होती है. उनका काम आए अतिथियों,मंत्रियों को
बुके देने, चाय-नाश्ते का इंतजाम करने और मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस आगे
बढ़ाने से ज्यादा का नहीं होता. उनसे ऐसे कोई भी काम नहीं कराए जाते जो कि
पत्रकारिता के हिस्से में आते हों और जो आगे चलकर उन्हें इसकी बारीक समझ
विकसित करे. उन्हें प्रशिक्षु पत्रकार की नहीं, निजी कंपनी में रिस्पेशसनिस्ट
या एटेंडर की ट्रेनिंग दी जाती है. ये काम तो वो स्कूल के ही दिनों से करती
आयीं होती है और फिर इस तरह की सेवाटहल का काम तो सदियों से उसके जिम्मे में
थोप दिया गया है.

4. जितने पैसे देकर लोग मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थानों की मीडिया दूकान में
पत्रकार बनने की ट्रेनिंग लेते हैं, उसे अगर बैंक में जमा कर दें और सालभर
किसी सरकारी संस्थान से पढ़ाई करें तो कोर्स खत्म होते-होते सिर्फ ब्याज के
पैसे से एक ठीक-ठाक पत्रिका निकालने की हैसियत में होंगे.
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