[दीवान] On Jai Bheem Comrade

Mihir Pandya miyaamihir at gmail.com
Tue Dec 24 06:43:28 CST 2013


From —
http://moifightclub.wordpress.com/2013/12/23/2013-rewind-15-film-fanatics-on-17-terrific-films-that-have-stayed-with-them/


*​'जय भीम कॉम्रेड़'*. ​
तय है कि अापने इस तीन घण्टे दस मिनट लम्बी वृत्तचित्र फिल्म का नाम ज़रूर
सुना होगा अौर अगर अाप थोड़े भी जागरुक पाठक हैं तो अब तक इस फिल्म की तमाम
घोर राजनीतिक समीक्षाएं भी पढ़ चुके होंगे. लेकिन अानंद पटवर्धन की ‘जय भीम
कॉम्रेड़’ मेरे लिए अपने मूल में नितान्त व्यक्तिगत फिल्म है. यह एक मित्र के
अचानक चले जाने के बाद उसके मित्र के अात्मसंशय से उपजी फिल्म है. अात्मसंशय,
कि कहीं अपने दृढ़ राजनीतिक विचारों की घटाटोप सामूहिकता के बीच हमने अपने
दोस्त को अकेला रह जाने दिया. यह फिल्म वो ईमानदार सवाल है जिसे अानंद स्वयं
से पूछ रहे हैं अौर यहाँ उनके ‘स्व’ में कहीं न कहीं हिन्दुस्तान का पूरा
प्रगतिशील विचार शामिल है. प्रगतिशील विचार जिसने ‘पहचान’ के सवाल को
वर्गसंघर्ष की महती लड़ाई के मध्य द्वितीयक पायदान पर रखते हुए सदा अप्रासंगिक
मान खारिज किया लेकिन स्वयं उसके बीच मौजूद भिन्न पहचान वाले कॉमरेड का
अकेलापन नहीं देख पाया. यह एक रचनाकार-फिल्मकार के ईमानदार अात्मसंशय से उपजी
फिल्म है अौर स्वयं पर सवाल खड़े करने की अौर उन सवालों के साये में खुद अपने
विचार को खुर्दबीन से परखने की यह ईमानदारी हमारे समय में दुर्लभ है. इसी संशय
के चलते अानंद अपने प्रगतिशील साथियों के सामने कुछ वाजिब सवाल खड़े करते हैं
अौर शायद एक पूरी विचारधारा के लिए अात्मपरीक्षण का वह दरवाज़ा खोलते हैं
जिसकी सांकल अभी तक उन्होंने स्वयं भीतर से बन्द कर रखी थी.

गौर से देखें तो सामयिक हिन्दुस्तान में मार्क्सवाद अौर अम्बेडकरवादी विचार के
मध्य के तनावपूर्ण अंत:संबंध को परखते इस घोर राजनीतिक वृत्तचित्र के मूल में
एक मित्र के असमय चले जाने की कसक मौजूद है. मित्र, जो चला जाता है लेकिन अपने
पीछे सवालों का एक बियाबान ख़ालीपन छोड़ जाता है. सन सत्तानवे में कवि विलास
घोगरे की अात्महत्या फिल्मकार अानंद पटवर्धन को झकझोर देती है. लेकिन इस
बियाबान ख़ालीपन का सामना अानंद रचनात्मक विकल्प तलाश करते हैं. एक प्रतिबद्ध
फिल्मकार अपने साथी की मृत्यु के बाद उसकी मुकम्मल पहचान की तलाश में निकलता
है, उसके जनगीतों के पीछे के असल कंठ को जानने निकलता है, उसकी कविताअों के
दृश्य ‘हम’ में मौजूद अदृ
​श्य​
‘मैं’ को खोजने निकलता है. यह एक दोस्त के चले जाने के बाद भी उसके मित्र की
अनवरत तलाश है जो अानंद को खैरलांजी तक लेकर जाती है. ‘कबीर कला मंच’ तक लेकर
जाती है. शीतल साठे अौर उनके क्रांतिकारी गीतों तक लेकर जाती है. एक दोस्त के
खुद को अकेला समझ चले जाने के बाद भी उसका मित्र उसका हाथ नहीं छोड़ता अौर
अस्सी के दशक में बनी अानंद की पहली फिल्म ‘बॉम्बे: हमारा शहर’ की शुरुअात में
“एक व्यथा सुनो रे लोगों…” गाते नवयुवक विलास घोगरे की उस छवि को अानंद मिटने
नहीं देते.
​ अाज​
‘कबीर कला मंच’ के शीतल साठे अौर सचिन माली जैसे नौजवान उसी खो गये मित्र
विलास की प्रतिछवि हैं. प्रेम जिसकी सीमाएं जात-धर्म के पार जाती हैँ अौर
अन्याय के खिलाफ प्रतिकार की वही साझा कॉमरेडशिप जिसका सपना विलास घोगरे की
कविताअों में झलकता था. अौर जब एक अाततायी सरकार द्वारा उन्हें नक्सलाइट कहकर
जेल में बन्द किया जाता है तो अानंद उसके खिलाफ डटकर लोहा लेते हैं. अापको पता
है, शीतल अौर सचिन ने अपने नवजात बच्चे का नाम क्या रखा है? ‘अभंग’. अभंग –
जैसे वह दोस्ती जिसे मृत्यु तोड़ती नहीं, सदा के लिए वापस जोड़ देती है.

‘अात्मसंशय’ हमारे समय के लिए एक नायाब पदबंध है अौर बेहद ज़रूरी भी. सच यह है
कि वर्तमान समय में विचारों का ऐसा एकवचनी कोलाहल मौजूद है कि शायद कभी एक
सवर्ण होने के नाते, कभी एक हिन्दू होने के नाते, कभी एक पुरुष होने के नाते
अौर कभी एक विषमलिंगी होने के नाते हमें सदा खुद से यह असुविधाजनक सवाल पूछना
चाहिए कि ऊपर से बराबर दिखते सामूहिकता के इस तुमुल कोलाहल के बीच वो एक कंठ
चुप क्यूं है? ‘जय भीम कॉम्रेड़’ उसी अकेले कंठ की समाज में वाजिब हिस्सेदारी
की चाह का दस्तावेज है मेरी नज़र में.


-- 

Mihir Pandya
New Delhi

Tweets at: https://twitter.com/miyaamihir
Blogs at: http://mihirpandya.com/
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20131224/328e7684/attachment-0003.html>


More information about the Deewan mailing list