[दीवान]६ ३ वीं पुण्य तिथि के विशेष अवसर पर (पटेल से संलाप: अगली किश्त)

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Mon Dec 16 17:24:48 CST 2013


दोस्तों, जब मैंने पटेल साहब से पूछा कि, 'तीस के दशक के पूर्वार्ध से प्रारंभ
हुआ गांधी जी और कांग्रेस का हरिजन आंदोलन समग्र रूप से जाति व्यवस्था की
आलोचना करने के बजाय मूलतः समाजिक सुधार के प्रयासों तक सीमित रहा। आप इस दिशा
में किये गए प्रयासों को किस नजर से देखते हैं?' तो उन्होंने यह कहते हुए कि
'मैं तुम्हारा प्रश्न नहीं समझा' मुझसे सवाल को कुछ और स्पष्ट करने की माँग
की। इस पर मैंने सवाल को दोहराते हुए कहा कि, सरदार साहब मैंने सुना है कि
डॉक्टर अंबेडकर ने यह कह कर   कि "जाति व्यवस्था को नष्ट किये बिना अछूतों का
उद्धार संभव नहीं है" गांधी जी के साप्ताहिक 'हरिजन' के लिए संदेश देने से
इंकार कर दिया था। वहीं दूसरी तरफ गांधी जी, जिन्होंने अपने आंदोलन को
सार्वजनिक कुओं, सड़कों और मंदिरों को हरिजनों के लिए खुलवाने तक सीमित रखा, ने
लोगों को रोटी-बेटी के व्यवहार में सावधानी बरतने की सलाह दी और मूल वर्णाश्रम
धर्म की हिमायत की। मैं जानना चाहता हूँ कि छुआछूत और दलितों से जुड़े मसलों पर
गांधी जी और कांग्रेस द्वारा निभायी भूमिका को आप किस नज़र से देखते हैं? शायद
प्रश्न अब एक हद तक स्पष्ट था और इसको सुनने के बाद मांत्रिक के शरीर में
प्रविष्ट सरदार पटेल की आत्मा ने अत्यंत उत्तेजित स्वर में कहना शुरू किया कि
सबसे पहले तो तुम ये जान लो कि १ ५ अप्रैल १ ९ ४ ७ को जब मुझे यह ज्ञात हुआ कि
डॉ. अंबेडकर का विवाह एक ब्राह्मण डॉक्टर महिला से हुआ है तो मैंने खुद उन्हें
इसके लिए शुभकामना संदेश भेजा। उस पत्र में मैंने यही लिखा था कि "मैंने
समाचार पत्र से जाना कि तुम्हारा विवाह आज ही हुआ है। कृपया सुखी वैवाहिक जीवन
के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करो। मुझे पूरा विश्वास है कि आज अगर
बापू जीवित होते तो वे अवश्य ही आशीर्वाद देते।" मेरे संदेश के जवाब में
अंबेडकर ने लिखा कि, "मैंने तथा मेरी पत्नी ने विवाह के इस अवसर पर तुम्हारी
ओर से भेजी गयी शुभकामनाएँ स्वीकार कर ली हैं और इसके लिए धन्यवाद। मैं इससे
सहमत हूँ कि बापू अगर आज जीवित होते तो वे आशीर्वाद देते।" लेकिन गांधी जी और
अंबेडकर पर बात करने से पहले तुम्हे यह भी पता होना चाहिए कि दलित जातियों के
बारे में कांग्रेस ने १ ९ १ ७ के अपने कलकत्ता अधिवेशन में ही वह प्रस्ताव पास
कर दिया था जिसमें कहा गया था कि "यह कांग्रेस भारतवासियों से आग्रहपूर्वक
कहती है कि परंपरा से दलित जातियों पर जो रुकावटें चली आ रही हैं, वे बहुत
दुःख देने वाली हैं और क्षोभ कारक हैं, जिससे दलित जातियों को बहुत कठिनाइयों
और असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। इस लिए न्याय और भलमनसी का यह तकाजा है
कि ये तमाम बंदिशें उठा दी जायँ।"

जहाँ तक गांधी जी का प्रश्न है वैसे तो सभी यह जानते हैं कि वो १ ९ १ ९ में
कांग्रेस में शामिल हुए और उन्होंने अपने सुधारों से कांग्रेस का स्वरुप ही
बदल डाला। गांधी जी के मन में दलितों और गरीबों के प्रति प्रारंभ से ही पीड़ा
थी। छुआछूत को वे भारी पाप समझते थे। मानव-मानव में भेद की बात उनकी कल्पना
में भी नहीं आ सकती थी। उनके जीवन दर्शन में प्रारंभ से ही हम इस बात को देखते
हैं कि भेद-भाव की बातों को ले कर दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने अपने घर में ही
कितना कुहराम मचा दिया था। इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि गरीबों की
दुर्दशा और अछूतों पर होने वाले जुल्मों को सुन कर उनका ह्रदय रो पड़ता था। इसी
लिए कांग्रेस में प्रवेश के बाद से गांधी जी दलित वर्ग की समस्याओं को कभी
नजरअंदाज नहीं कर सके। सबसे पहले गांधी जी ने दलितोद्धार के कार्य को बारदोली
कार्यक्रम में शामिल कर के इसे स्वामी श्रद्धानंद जी को सौंपा। परन्तु कार्य
के लिए आवश्यक धनराशि की व्यवस्था कांग्रेस द्वारा न हो पाने के चलते अंततः
स्वामी जी को त्यागपत्र देना पड़ा। जिसके बाद कांग्रेस ने दलितोद्धार का कार्य
हिन्दू महासभा को सौंपने का निश्चय किया। हालाँकि गांधी जी अपने स्तर पर इस
सवाल से लगातार जूझते रहे। कुल मिला कर मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि गांधी जी
और कांग्रेस का हरिजन आंदोलन तीस के दशक के पूर्वार्द्ध या सिर्फ अंबेडकर की
प्रतिक्रिया में नहीं बल्कि उससे बहुत पहले प्रारंभ हुआ।

देखा जाय तो लेवा गुजर पाटीदार होने के कारण मुझे हिन्दू समाज की जन्म आधारित
वर्ण-व्यवस्था की सताई हुई जातियों में गिना जा सकता है। फिर अपनी जाति के
भीतर बनी जातियों की श्रेणियों के कटु अनुभव भी मुझे होते रहे। और बाद तक
अंबेडकर के संबंध जवाहर लाल की अपेक्षा मुझसे कहीं बेहतर रहे। लेकिन यह भी समझ
लेना चाहिए कि गांधी जी के अनुसार वर्णाश्रम ऊँच-नीच का धर्म नहीं है। हाँ ये
कह सकते हैं कि एक खास अर्थ में गांधी जी वर्णाश्रम धर्म को शास्त्रवादियों से
अलग और अपने तरीके से पुनर्परिभाषित कर रहे थे। नवजीवन में प्रकाशित २९ जून १
९ २ ४ के अपने एक लेख में शास्त्रार्थवादियों से मुठभेड़ करते हुए उन्होंने कहा
कि, "...शास्त्रार्थ का पेशा वकीलों के पेशे की तरह है। शास्त्रार्थवादी स्याह
का सफेद और सफ़ेद का स्याह कर के दिखा सकता है। किसे इस बात का अनुभव नहीं
होता। बहुत से वेद-वादरत प्राणी वेदों से अनेक बातें साबित करते हैं और वैसे
ही नाम धारण करने वाले दूसरे कितने ही लोग उनके विरुद्ध बातें उतने ही जोरों
के साथ उनमें से सिद्ध करते हैं। मैं अपने जैसे प्रकृत मनुष्यों को एक आसान
तरीका बताता हूँ जिसका अनुकरण मैंने किया है। मैंने हर एक धर्म का विचार कर के
उनका लघुत्तम निकाल रखा है। कितने ही सिद्धांत अचल-वत् मालूम होते हैं। अनुभव
उनका अनादर नहीं कर सकता। भक्त तुलसीदास ने आधे दोहे में कह दिया है 'दया धर्म
को मूल है'। 'सत्य के बिना दूसरा धर्म नहीं' यह सनातन वचन है। किसी भी धर्म ने
इन सूत्रों को अस्वीकार नहीं किया है। ऐसे हरेक वचन को जिसके लिए धर्म-शास्त्र
का वचन होने का दावा किया गया हो, सत्य की निहाई पर दया-रूपी हथौड़े से पीट कर
देख लेना चाहिए। अगर वह पक्का मालूम हो और टूट न जाय तो ठीक समझना चाहिए। नहीं
तो हजारों शास्त्रवादियों के रहने पर भी 'नेति' 'नेति' कहते रहना चाहिए। अखा
(एक गुजराती कवि) की अनुभव वाणी में शास्त्रार्थ एक अन्धा कुआँ है। जो उसमें
गिरता है वही मरता है। आत्मा एक है शरीर मात्र में उसका निवास है। ऐसी दशा में
अस्पृश्य किसे कहना चाहिए?"

पटेल साहब ने कहना जारी रखा कि यह सच है कि १ ९ ३ ५ -३ ६ में जब से अंबेडकर ने
धर्म-परिवर्तन सम्बन्धी घोषणा की मेरा मन उनके प्रति कुछ खट्टा हुआ था। गांधी
जी बहुत पहले से अस्पृश्यता को हिन्दू धर्म का अनिवार्य अंग मानने के बजाय उसे
एक व्यवहारिक समस्या के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत करते आये थे। और इसके
व्यवहारिक समाधान की तात्कालिक जरुरत के मद्देनजर गांधी जी ने नवजीवन के अपने
उस महत्वपूर्ण लेख में भी, जिसका शीर्षक उन्होंने 'मैं हारा' रखा था, पाठकों
से यही कहा कि "हमें अस्पृश्यता का अर्थ भी समझ लेना चाहिए। रजस्वला स्त्री
अस्पृश्य है। स्मसान से आये हुए लोग अस्पृश्य हैं। मैला उठाने पर स्वच्छता न
होने तक मनुष्य अस्पृश्य है। इस अस्पृश्यता को तो हम अपने माता-पिता के साथ भी
पालते हैं। पर रजस्वला माता यदि बीमार हो और उसका लड़का उस समय उसकी सेवा न करे
तो वह नरकवासी हो। फिर भले ही वह अस्पृश्य क्यों न हो जाय। मैला उठाने वाले सब
अन्त्यज हैं। वे यदि मैला उठा कर न नहावे और हम उनसे छू कर नहाना चाहें तो नहा
डालें। परन्तु ऐसे मामूली और व्यवहारिक विचार में से अन्त्यज जाति को पैदा
करना और उन्हें गाँव के एक कोने में निकाल देना, जानवर से भी अधिक त्याज्य
मानना, वह चाहे मरे या जीये उसका ख्याल तक न करना, उसके पल्ले में जूठन और
सड़ा-गला खाना फेकना उसके बाल-बच्चों को न पढ़ाना, वे अगर बीमार हो जायँ  तो
उनकी दवा दरपन में मदद न देना, उन्हें मंदिरों में न पैठने देना और कुँए पर
पानी न भरने देना- यह धर्म नहीं अधर्म है। इसे हिन्दू धर्म का अंग मानकर हम
हिन्दू धर्म की जड़ उखाड़ने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसी अस्पृश्यता घातक है। यह
असहिष्णुता की पराकाष्ठा है। इसे दूर करने का प्रयत्न करना और ऐसा करते हुए मर
मिटना हर एक हिन्दू का परम-धर्म है।"

पटेल साहब ने आगे कहा कि मैं हिन्दू धर्म को श्रेष्ट मानता रहा हूँ, और गांधी
जी के इस विचार से मैं खुद को सहमत पाता आया हूँ कि वर्णधर्म जुदा-जुदा
मनुष्यों के कर्तव्यों को निश्चित करता है। वर्णधर्म के बारे में बापू का
स्पष्ट मानना था कि, "इस धर्म के अनुसार वही ब्राह्मण है जो सभी वर्णो का सेवक
है। शूद्रों और अस्पृश्यों का भी सेवक है। चारों वर्णों की सेवा करने के लिए
वह अपना सब कुछ अर्पण कर देता है और प्राणिमात्र की दया पर ही अपनी जीविका का
आधार रखता है। अधिकार, सम्मान और अपने हकों का दावा करने वाला क्षत्रिय नहीं
है। क्षत्रिय तो वही है जो समाज का रक्षण करने के लिए, उसकी प्रतिष्ठा करने के
लिए स्वार्पण कर देता है। अपने ही लिए कमाने वाला और संग्रह करने वाला वैश्य
नहीं है लेकिन चोर है।" बापू का कहना था कि, "हिन्दू धर्म की मेरी कल्पना के
अनुसार पाँचवां अर्थात अस्पृश्यों का वर्ण है ही नहीं। जिन्हें अस्पृश्य कहते
हैं वे दूसरे शूद्रों के सामान ही अधिकार रखने वाले समाज-सेवक हैं। मैं यह
मानता हूँ कि समाज का परम श्रेय करने के लिए सोची गयी उत्तमोत्तम प्रथा वर्ण
धर्म की प्रथा है। आज तो केवल उसकी विडम्बना हो रही है। यदि वर्ण-धर्म की
रक्षा करनी है तो वर्ण धर्म के इस उपहास योग्य ढांचे का नाश करके वर्ण-धर्म के
प्राचीन गौरव का पुनरुद्धार करना होगा।"

फिर बापू ने जहाँ एक तरफ अंबेडकर के नेतृत्व में चलने वाले महाड सत्याग्रह का
खुल कर समर्थन किया तो वहीं दूसरी तरफ वो सामाजिक सवालों के हल के लिए
राजसत्ता पर अतिशय निर्भरता को भी अनुचित मानते रहे। याद करो कि गोविंददास
जादवदास ने, जो स्वयं ढेड़ जाति के थे, जब एक पत्र लिख कर बापू से यह सवाल किया
कि 'अगर अस्पृश्यता को दूर करना है तो फिर अस्पृश्यों के लिए अलग स्कूल,
मंदिर, कुएं क्यों बनें?' तब गांधी जी ने हिंदी नवजीवन में २० जनवरी १ ९ २ ७
को अपने 'अस्पृश्यता की गुत्थियां' शीर्षक आलेख में गोविंददास के इस प्रश्न का
जवाब देते हुए कहा था कि, "दक्षिण अफ्रीका में ऐसा ही सवाल उठा था और अब भी
उठता है। वहाँ हिन्दुस्तानियों के लिए अलग स्कूल खोलने का अर्थ है उनकी
अस्पृश्यता की आयु बढ़ाना। यह दलील खुद मैंने की है।....किन्तु जहाँ मैंने देखा
कि जो चीज है ही उसकी हस्ती को न मानकर चलना ही मूर्खता है वहाँ मैंने भेद का
अस्तित्व जान समझकर ही अपना काम किया है। इस लिए वहाँ मैंने अलग स्कूलों की
बात स्वीकार कर ली। वहाँ रेलगाड़ियों में हिन्दुस्तानियों के लिए दूसरे और पहले
दर्जे के डब्बे अलग रखने की बात भी स्वीकार कर ली जैसे गोविंद भाई उसका विरोध
करते हैं वैसे मैंने भी किया। किंतु जहाँ जाति के अस्तित्व ही मिट जाने का भय
पैदा हुआ, वहाँ मैंने वैसे भेद को स्वीकार किया जो भेद में भी हलका से हलका
भेद हो। जैसे कि पहले हिंदुस्तानी लोग केवल तीसरे दर्जे में ही मुसाफिरी कर
सकते थे। आंदोलन के अंत में उनके लिए दूसरे और पहले दर्जे के भी टिकट काटने का
हुक्म हुआ। किन्तु उसके साथ ही हिन्दुस्तानियों के लिए पहले-दूसरे दर्जे की
गाड़ियाँ रखने को ठहरा। विरोध किया किंतु अंत में हमने इतना भेद स्वीकार कर
लिया। राजसत्ता सुभीता कर दे सकती है किंतु हमारे साथ बैठने पर दूसरों को
लाचार क्यों कर सकती है ?" लेकिन ऊँच-नीच की भावना के समर्थक गांधी जी कतई
नहीं रहे। १ २ नवंबर १ ९ २ ५ को हिंदी नवजीवन में प्रकाशित अपने लेख 'ऊँच नीच
का ख्याल' में बापू ने स्पष्ट कहा कि, "मेरे ख्याल से तो वे जो ऊँचा होने का
दावा करते हैं, अपने इसी दावे के कारण उसके लिए नालायक साबित होते हैं। सच्ची
और स्वाभाविक बड़ाई तो बिना दावे के ही मिल जाती है। जो सचमुच बड़ा है उसके कहे
बिना ही उसको सब लोग बड़ा कहते हैं और वह अपनी बड़ाई का इंकार करता है। केवल
आडम्बर से या झूठी नम्रता दिखाने के लिए नहीं लेकिन इस शुद्ध ज्ञान के कारण कि
जो अपने को नीचा मानता है उसकी आत्मा और अपनी आत्मा में कोई भेद नहीं है।
सृष्टि के सभी प्राणियों की एकता और अभेद के ज्ञान में ऊँच-नीच के भाव को कहीं
अवकाश ही नहीं होता है। जीवन तो कार्यक्षेत्र है, अधिकार और हकों का संग्रह
नहीं है। जो धर्म ऊँच-नीच के भेदों की प्रथा पर आधार रखता है उसका सर्वथा नाश
ही होगा।" तो वर्णधर्म से गांधी जी का मतलब ऊँच-नीच के ख्याल में विश्वास
हरगिज नहीं है।

दोस्तों, सच कहूँ तो, पटेल साहब द्वारा प्रस्तुत गांधी-दर्शन की बारीक़
अवधारणाओं के इस 'पाठ' को सुनते हुए मैं थोडा चट सा रहा था। इस लिए भी मैंने
ऐन मौके पर हस्तक्षेप करने का निर्णय किया। यहाँ मैंने बात में लात मारते हुए
यह सवाल रखा कि, पटेल साहब वह सब तो दुरुस्त है लेकिन कई प्रगतिशील इतिहासकार
गांधी जी के हरिजन आंदोलन पर यह आरोप भी लगाते रहे हैं कि यद्यपि अनेक हरिजन
खेतिहर मजदूर थे फिर भी समाज सुधार के प्रयासों तक सीमित गांधी जी के आंदोलन
ने आर्थिक मांगों से खुद को अलग रखा। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? मेरा
सवाल सुनकर मांत्रिक के शरीर में प्रविष्ट पटेल साहब की आत्मा ने अत्यधिक
उत्तेजित स्वर में कहा कि, ऐसे अनर्गल प्रचार बेबुनियाद है मैं इतना ही कहना
चाहूँगा। और साथ ही तुम्हे उस महत्वपूर्ण वक्तव्य की याद भी दिलाना चाहूँगा
जिसे बापू ने १ ९ ३ १ में गोलमेज परिषद् के दौरान इंग्लैंड में दिया था। तब
बालिग मताधिकार पर जोर देते हुए अपने एक भाषण में गांधी जी ने यह साफ कहा था
कि, "अंग्रेजों ने अपने वैज्ञानिक तरीकों से दलितों और पतितों को जिस भयंकर
दलदल में गिरा रखा है, उसमें से उन्हें बाहर निकालने के लिए भारत को
स्वतंत्रता के बाद लगातार बरसों तक कानून बनाते रहना पड़ेगा। यदि उन्हें इस
दलदल से बाहर निकाल कर राष्ट्रीय सरकार अपने घर को व्यवस्थित करना चाहती है तो
सबसे पहले उसे उन तमाम बोझों को उनके कन्धों पर से हटाना होगा जिनके नीचे आज
वे पिसे जा रहे हैं। यही नहीं, उन्हें लगातार संरक्षण भी देते रहना पड़ेगा।
इसलिए आज जो जो भी स्वार्थ विशेष प्रकार से लाभ उठा रहे हैं, वे सब --फिर वे
जमींदार हों, जागीरदार हों, धनिक हों, अंग्रेज हों या हिंदुस्तानी,--यदि अनुभव
करें कि उनके साथ ज्यादती हो रही है तो उनके साथ मेरी सहानुभूति तो होगी,
परन्तु शक्ति और संभव होने पर भी मैं किसी प्रकार भी उनकी मदद नहीं कर सकूँगा,
क्योंकि इस काम में मुझे उन्ही की मदद की जरुरत होगी। उनकी मदद के बगैर इन
गरीबों को उस दलदल से बाहर निकालना असंभव है।" और गांधी जी ने अपने उसी
वक्तव्य में आगे कहा था कि, "अस्पृश्यों की हालत पर जरा गौर तो कीजिये कि आज
वे कहाँ हैं। आज उनके पास जमीन नहीं है। वे उच्च वर्ण वालों की--और इस लिए
मुझे कहने दीजिये--राज्य की दया पर जी रहे हैं। उन्हें एक जगह से हटाकर कहीं
भी दूसरी जगह खदेड़ा जा सकता है। इसकी शिकायत किसी से वे नहीं कर सकते और न
कानून ही उनकी कोई सहायता कर सकता है। इस लिए किसी भी प्रकार की समानता लाने
के लिए सबसे पहला कदम यह होगा कि उन्हें कहीं न कहीं बिना मूल्य लिए जमीन देनी
होगी। परन्तु जिनके पास अधिक जमीन है या दूसरे अधिक साधन हैं, उनसे ले कर देनी
होगी; इनमें हिंदुस्तानी भी होंगे, अंग्रेज भी। इस लिए आप हरगिज यह न समझें कि
महज अंग्रेज होने के कारण आपके साथ कोई भेदभाव बरता जायेगा। यह नियम तो सभी को
लागू होगा, चाहे वह अंग्रेज हो, जापानी हो, भारतीय हो या और कोई हो।"

पटेल साहब ने कहना जारी रखा कि,यह सच है कि उस समय तक विधायिकाओं में दलित
जातियों के प्रतिनिधित्व के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। सर्वप्रथम डॉ
अंबेडकर (जो १ ८ जनवरी १ ९ २ ७ को बॉम्बे लेजिस्लेटिव कौंसिल में पाँच वर्षों
के लिए मनोनीत किये गए थे) ने १ ९ २ ८ में दलितों के लिए चुनाव में राजनीतिक
आरक्षण की माँग की। उन्होंने बॉम्बे लेजिस्लेटिव कौंसिल में १ ४ ० सीटों में
से २ २ सीटों की माँग की थी। और पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था की भी बात
उठाई। ७ सितम्बर १ ९ ३ १ को गोलमेज परिषद् में भी डॉ अंबेडकर ने अछूतों के
राजनीतिक अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने की बात कही। गोलमेज परिषद् में
भाग लेकर जब गांधी जी २ ८ दिसंबर १ ९ ३ १ को बम्बई लौटे तो सभी प्रांतों के
प्रतिनिधि उनका स्वागत करने के लिए वहाँ एकत्र थे। विधिवत स्वागत के बाद उनका
शानदार जुलूस निकला। आजाद मैदान में हुई सभा में अपूर्व भीड़ इकट्ठी थी। गांधी
जी ने उसके सामने अपने ह्रदय को खोलते हुए कहा कि, "मैं शांति के लिए अपने
बसभर कोशिश करूँगा और अपनी तरफ से कोई बात उठा नहीं रखूँगा।" फिर अपनी
प्रतिज्ञा दोहराते हुए उन्होंने कहा कि, "हिन्दू जाति से अस्पृश्यों को जुदा
करने वाले किसी भी प्रयत्न को मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा, बल्कि मौका पड़ने पर
उसके विरोध में मैं अपनी जान तक लड़ा दूँगा।" यही बात उन्होंने अल्पसंख्यक
जातियों की कमेटी की बैठक में इंग्लैंड में भी कही थी। परन्तु न तो तब और न इस
सभा में किसी का ध्यान उसकी गम्भीरता की तरफ गया। उधर ४ जनवरी को गांधी जी को
गिरफ्तार किया गया और उनके उस भीषण व्रत का समय भी शीघ्र आ गया जिसमें
उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। मताधिकार और निर्वाचन की सीटों का
निर्णय करने के लिए लोथियन कमेटी १ ७ जनवरी १ ९ ३ २ को भारत आ पहुंची थी।
गांधी जी ने भारतमंत्री सर सैमुअल होर को १ १ मार्च को पत्र लिखा जिसमें
निश्चय प्रकट किया कि यदि अस्पृश्यों या दलित जातियों के लिए सरकार ने पृथक
निर्वाचन रखा तो मैं आमरण उपवास करूँगा। १ ३ अप्रैल को सर होर का उत्तर आया जो
निस्सार और रुखा था। १ ७ अगस्त को प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनाल्ड ने इस संबंध
में अपना निश्चय भी सुना दिया। इसमें दलित जातियों को पृथक निर्वाचन का अधिकार
तो मिला ही साथ ही आम निर्वाचन में भी उम्मीदवार बनने और दुहरे वोट हासिल करने
का अधिकार भी दिया गया। इस पर यरवदा जेल में मेरे साथ ही कैद गांधी जी ने यह
निश्चय किया कि वे प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड के इस निर्णय के विरोध में २ ०
सितंबर को तीसरे पहर से अनशन करेंगे और इसकी सूचना उन्होंने प्रधानमंत्री को
भेज दी। प्रधानमंत्री ने आराम से ८ सितंबर को पत्र का उत्तर दिया, जिसमें
उन्होंने गांधी जी को दलित जातियों के प्रति शत्रुता भाव रखने वाला कहा। १ २
सितंबर को सारा पत्रव्यवहार प्रकाशित हो गया। अनशन २ ० सितंबर से प्रारंभ होने
वाला था। इस एक सप्ताह में सारे देश में और विदेशों में भी चिंता, क्षोभ और
दुःख फैल गया। ब्रिटिश सरकार अपना निश्चय पलटेगी इसकी कोई आशा नहीं थी। अतः
सर्वत्र यही महसूस किया जा रहा था कि स्वयं हिन्दू-समाज को ही आपसी समझौते
द्वारा इस समस्या को सुलझाकर गांधी जी की माँग पूरी कर इस संकट को दूर करना
चाहिए।

यह बड़ी अच्छी बात हुई कि दलित जातियों के एक नेता श्री राजा ने ही इस दिशा में
पहल की। उन्होंने पृथक निर्वाचन को धिक्कारा। २ ० सितंबर को सारे देश में
प्रार्थनाएं की गयीं। वैसे तो सारे प्रयत्नों और आंदोलन का मुख्य उद्देश्य
प्रधानमंत्री के निर्णय को बदलवाना ही था, परन्तु इस हलचल ने देखते देखते
अस्पृश्यता-निवारण का व्यापक रूप धारण कर लिया। जगह-जगह अस्पृश्यों के लिए
मंदिर खोले जाने लगे। पंडित मदन मोहन मालवीय ने नेताओं की एक परिषद् तत्काल
बुलाने का निर्णय किया। उसमें सवर्ण हिंदुओं और डॉ. अंबेडकर सहित अस्पृश्यों
के सब नेताओं ने भाग लिया और उपवास के पांचवें दिन सबने मिल कर एक योजना
स्वीकार की जिसके अनुसार दलित जातियों ने पृथक निर्वाचन का अधिकार त्याग दिया
और आम हिन्दू निर्वाचनों के लिए स्वीकृति दे दी। सवर्ण हिंदुओं ने बदले में
उन्हें महत्वपूर्ण संरक्षण प्रदान किये। ब्रिटिश प्रधानमंत्री के निर्णय से
अस्पृश्यों को जितनी जगहें मिलने वाली थीं, उससे दुगनी इस योजना के अनुसार
उन्हें मिल गयीं और कुल मिला कर अधिकतम प्रतिनिधित्व भी। इस योजना को ब्रिटिश
मंत्रिमण्डल ने भी स्वीकार कर लिया। अनशन के बाद से देश में अस्पृश्यता निवारण
एक मुख्य कार्य बन गया। ३ ० सितंबर १ ९ ३ २ को मालवीय जी की अध्यक्षता में
बम्बई में एक विशाल सभा हुई जिसमें अस्पृश्यता को दूर करने के लिए एक अखिल
भारतीय अस्पृश्यता विरोधी संगठन खड़ा किया गया। घनश्याम दास बिड़ला उसके अध्यक्ष
तथा अमृतलाल ठक्कर मंत्री चुने गए। यही संगठन बाद में 'हरिजन सेवक संघ' के रूप
में काम करने लगा। अस्पृश्यता निवारण के  कार्य को बल मिले इसलिए गांधी जी एक
समाचार पत्र भी निकालना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए सरकार की इजाजत माँगी और
उसे आश्वस्त कर दिया कि यह पत्र राजनीतिक नहीं होगा। सरकार से इसकी इजाजत
मिलते ही वे 'हरिजन' निकालने लगे। यह पूछे जाने पर कि जिन्हें हम अस्पृश्य मान
कर पाप करते हैं, उनको 'हरिजन' नाम देने का क्या अर्थ है? उन्हें यह नया नाम
क्यों दिया गया? --बापू बताते कि, "काठियावाड़ के एक अस्पृश्य भाई ने वर्षों
पहले मुझे लिखा था कि 'अन्त्यज', 'अछूत', 'अस्पृश्य' नाम से पुकारे जाने पर उन
भाइयों को दुःख होता है। उनका दुःख मैं समझ सकता हूँ। उस भाई ने बताया कि भक्त
कवि नरसिंह मेहता ने एक भजन में अछूत भाइयों का उल्लेख 'हरिजन' नाम से किया
है। यद्यपि जो भजन उस भाई ने अपनी बात के समर्थन में मुझे भेजा था, उसका अर्थ
तो जो वह बताते थे, ऐसा मेरी दृष्टि में नहीं था, तो भी मुझे 'हरिजन' नाम बहुत
प्रिय जँचा। 'हरिजन' का अर्थ है 'ईश्वर का भक्त', 'ईश्वर का प्यारा'। ईश्वर की
प्रतिज्ञा है कि दुखियों का वह बेली है, दया का सागर है, अशक्तों को शक्ति
देने वाला है, निर्बल का बल है, पंगु का पैर है, अंधों की आँख है, इस लिए दलित
लोग उसके प्यारे होने ही चाहिए। इस दृष्टि से अछूत माने जाने वाले भाईयों के
लिए 'हरिजन' शब्द सर्वथा उपयुक्त है, ऐसा मेरा विश्वास है।" यरवदा जेल में ही
गांधी जी ने साबरमती आश्रम हरिजनों के लिए दे देने का तय कर लिया था और शीघ्र
ही उसे 'हरिजन सेवक संघ' को दे दिया गया।

जल्द ही राजनीतिक क्षेत्र में निष्क्रिय रहने को विवश हो जाने पर गांधी जी ने
नवंबर १९३३ में हरिजन-कार्य के लिए दस महीने देश के हर प्रांत का दौरा किया।
बापू के लिए इन दस महीनों का प्रत्येक दिन अस्पृश्यता की समस्या का अध्ययन और
उस समस्या को हल करने के उपाय सोचने में बीता। देश में भयंकर आर्थिक मंदी थी।
फिर भी उनकी अपील पर अस्पृश्यता निवारण अभियान के लिये लगभग आठ लाख रुपया
एकत्र हुआ। इसी बीच दो बड़ी घटनाएं हुईं। २ ५ जून १ ९ ३ ४ को पूना नगर पालिका
की ओर से गांधी जी को मानपत्र दिया जाने वाला था। सभा स्थान पर मोटर में जा
रहे बापू पर किसी ने बम से हमला किया। इस हमले में वो बाल-बाल बच गए। बम
फेंकने वाले ने एक दूसरी कार को गांधी जी की कार समझ लिया था। ऐसा अनुमान किया
गया कि हमलावर गांधी जी के अस्पृश्यता-निवारण के काम से चिढ़ा हुआ था। दूसरी
घटना इसके दो हफ्ते बाद अजमेर में घटी। वहाँ किसी तेज मिजाज सुधारक ने बनारस
के पंडित लालनाथ, जो हरिजन कार्य के कट्टर विरोधी थे, का सर फोड़ दिया। इस
काण्ड के बाद गांधी जी ने लालनाथ को सभा में अपना मनोगत प्रकट करने को कहा। जब
लोगों ने सुनना नहीं चाहा तो गांधी जी ने कहा कि इस सभा में बोलने का जितना हक़
मुझे है उतना ही लालनाथ को भी है। यदि आप इनको बोलने नहीं देंगे तो मैं भी
नहीं बोलूँगा। अंत में इस घटना को ले कर गांधी जी ने सात दिन का उपवास किया।
गांधी जी ने जेल में अस्पृश्यता निवारण की सुविधा के लिए जो प्रयत्न--उपवास
आदि--किये, उससे कुछ लोगों खासकर समाजवादियों को शिकायत थी कि इससे
सविनय-अवज्ञा आंदोलन को धक्का पहुंचा है। इस लिए १ ७ सितंबर १ ९ ३ ४ को जब कुछ
सदस्यों से बढ़ते हुए मतभेद को नजर में रख कर गांधी जी ने कांग्रेस के साथ अपना
संबंध हटा लेना उचित समझा तो उस अवसर पर दिए अपने लंबे वक्तव्य में बापू ने
दूसरी वजहों के अलावा अस्पृश्यता निवारण के सवाल पर संगठन में उपजे मतभेद का
भी हवाला दिया। इस बारे में उन्होंने कहा कि, "अस्पृश्यता का प्रश्न मेरे लिए
एक धार्मिक और नैतिक प्रश्न है। बहुतों का विचार है कि इस प्रश्न को जिस तरह
और जिस समय हाथ में लिया है, उससे सत्याग्रह-आंदोलन की गति में बाधा पड़ी है।"
दरअसल जवाहरलाल जैसे नेता भी उस वख्त गांधी जी के हरिजन कार्यक्रम को
साम्राज्यवाद-विरोधी लड़ाई के प्रमुख कार्यभार से एक नियत भटकाव के रूप में ही
देख पा रहे थे।

(आगे भी जारी)
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