[दीवान]टीवी एंकर लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतराः मणिशंकर अय्यर

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Jan 30 18:56:33 IST 2013


1.पत्रकारिता की आचार संहिता जब तक मीडिया छात्रों के अच्छे नंबर से पास होने
के बाद रद्दी की टोकरी में फेंक देने की कवायद से आगे नहीं बढ़ती,तब तक
मीडियाकर्मियों को कभी भी कोई आतंकवादी,कोई हीरो और कोई देशद्रोही दिख जा सकता
है..वो गर्दन की नसें फुलाकर ग्रे से हरी कर लेता है तो एक तरह से घोषणा करता
है कि मैंने जीवन में कभी भी सोशल साइंस की पढ़ाई नहीं की( बुलेट बम औऱ चैंपिन
नोट्स के अलावे), संविधान का एक बार मुंह भी नहीं देखा, झुग्गी-झोपड़ियों को
समाज का कबाड़ समझा और जिस दस-बारह साल की जिंदगी बाबूजी की स्कूटर पर घसीटते
रहे, अब इएमआइ के दम पर फोर व्हीलर हांकने की स्थिति में रिक्शेवाले और बाइक
के लिए बैनचो..बैन की लौड़ी मेरे ख्याल से सबसे उपयुक्त शब्द है. उसे अपने से
नीचे तबके के लोगों से गुजरना,अतीत से गुजरने जैसा लगता है जिसमें कि वो
दोबारा झांकना नहीं चाहता और अपने से अधिक सम्पन्न लोग एक नंबर के करप्ट लगते
हैं. इसलिए आप देखते होंगे कि ऐसे मीडियाकर्मी,एंकर जब किसी शख्सियत को डिमीन
करते हैं तो उसके पहले उनकी तटस्थता,धैर्य और पत्रकारिता के मामूली संस्कार भी
कद्दू काटने चले जाते हैं. वो स्क्रीन पर,फेसबुक की दीवारों पर जो कुछ भी
बोल-लिख रहे होते हैं, अगर उसकी टेक्सट अरुणा ब्रूटा जैसे किसी मनोवैज्ञानिक
चिंतकों के हाथ सौंप दिए जाएं तो यकीन मानिए वो कहेंगे- इन्हें खबर
पढ़ने-लिखने के पहले सख्त इलाज की जरुरत है और इन्हें किसी भी हाल में अकेला
नहीं छोड़ा जाए, कभी भी कुछ भी कर बैठ सकते हैं.
[image: Photo: पत्रकारिता की आचार संहिता जब तक मीडिया छात्रों के अच्छे नंबर
से पास होने के बाद रद्दी की टोकरी में फेंक देने की कवायद से आगे नहीं
बढ़ती,तब तक मीडियाकर्मियों को कभी भी कोई आतंकवादी,कोई हीरो और कोई देशद्रोही
दिख जा सकता है..वो गर्दन की नसें फुलाकर ग्रे से हरी कर लेता है तो एक तरह से
घोषणा करता है कि मैंने जीवन में कभी भी सोशल साइंस की पढ़ाई नहीं की( बुलेट
बम औऱ चैंपिन नोट्स के अलावे), संविधान का एक बार मुंह भी नहीं देखा,
झुग्गी-झोपड़ियों को समाज का कबाड़ समझा और जिस दस-बारह साल की जिंदगी बाबूजी
की स्कूटर पर घसीटते रहे, अब इएमआइ के दम पर फोर व्हीलर हांकने की स्थिति में
रिक्शेवाले और बाइक के लिए बैनचो..बैन की लौड़ी मेरे ख्याल से सबसे उपयुक्त
शब्द है. उसे अपने से नीचे तबके के लोगों से गुजरना,अतीत से गुजरने जैसा लगता
है जिसमें कि वो दोबारा झांकना नहीं चाहता और अपने से अधिक सम्पन्न लोग एक
नंबर के करप्ट लगते हैं. इसलिए आप देखते होंगे कि ऐसे मीडियाकर्मी,एंकर जब
किसी शख्सियत को डिमीन करते हैं तो उसके पहले उनकी तटस्थता,धैर्य और
पत्रकारिता के मामूली संस्कार भी कद्दू काटने चले जाते हैं. वो स्क्रीन
पर,फेसबुक की दीवारों पर जो कुछ भी बोल-लिख रहे होते हैं, अगर उसकी टेक्सट
अरुणा ब्रूटा जैसे किसी मनोवैज्ञानिक चिंतकों के हाथ सौंप दिए जाएं तो यकीन
मानिए वो कहेंगे- इन्हें खबर पढ़ने-लिखने के पहले सख्त इलाज की जरुरत है और
इन्हें किसी भी हाल में अकेला नहीं छोड़ा जाए, कभी भी कुछ भी कर बैठ सकते हैं.]
<http://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200291597190266&set=a.1185073544689.2028672.1163764868&type=1&relevant_count=1>

1.टीवी एंकर लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है. मणिशंकर अय्यर की इस बात में
हायपरवॉलिक टोन हो सकती है लेकिन पिछले 15 दिनों में न्यूज चैनलों ने एक के
बाद एक घटनाओं के संबंध में जिस तरह के पैतरे लिए उससे साफ है कि हद दर्जे की
ब्रूटलिटी मेनिया के शिकार हैं. जरुरी नहीं कि इसके पीछे कोई दुर्भावना हो
क्योंकि वो उस टिपिकल हिन्दी सिनेमा देखकर संस्कारित हुए हैं जो धर्मेन्द्र की
मारधाड़ के बीच और मारो,और मारो केा जयकारा लगाते हुए अपनी ड्राइंगरुम से
न्यूजरुम तक पहुंच गए. खलनायक को बदतर हालत तक पहुंचाने और उसके लिए गुजारिश
करने की आदत बुरी नहीं है लेकिन ये काम चूंकि डायरेक्टर पहले से तय कर देता है
तो उनकी ये हरकत शगल बनकर रह जाती है लेकिन न्यूजरुम में वही आदत घिसते हुए ये
तो समझना ही होगा कि आखिर आप खलनायक बना किसे रहे हो, हीरो का ताज पहना किसे
रहे हो और इस नायक-खलनायक के खेल के बीच विवेक नाम की चीज किस ताक पर रख दी है
? कहीं न्यूजरुम में आकर टीनएज में अपने मोहल्ले के सबसे दबंग लौंडे से पिट
जान की पीड़ा और उसका बदला स्क्रीन पर आकर तो नहीं उतार रहे ?
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/01/130130_tv_controversy_ashisnandi_manishankar_adg.shtml

2. पत्रकारिता की आचार संहिता जब तक मीडिया छात्रों के अच्छे नंबर से पास होने
के बाद रद्दी की टोकरी में फेंक देने की कवायद से आगे नहीं बढ़ती,तब तक
मीडियाकर्मियों को कभी भी कोई आतंकवादी,कोई हीरो और कोई देशद्रोही दिख जा सकता
है..वो गर्दन की नसें फुलाकर ग्रे से हरी कर लेता है तो एक तरह से घोषणा करता
है कि मैंने जीवन में कभी भी सोशल साइंस की पढ़ाई नहीं की( बुलेट बम औऱ चैंपिन
नोट्स के अलावे), संविधान का एक बार मुंह भी नहीं देखा, झुग्गी-झोपड़ियों को
समाज का कबाड़ समझा और जिस दस-बारह साल की जिंदगी बाबूजी की स्कूटर पर घसीटते
रहे, अब इएमआइ के दम पर फोर व्हीलर हांकने की स्थिति में रिक्शेवाले और बाइक
के लिए बैनचो..बैन की लौड़ी मेरे ख्याल से सबसे उपयुक्त शब्द है. उसे अपने से
नीचे तबके के लोगों से गुजरना,अतीत से गुजरने जैसा लगता है जिसमें कि वो
दोबारा झांकना नहीं चाहता और अपने से अधिक सम्पन्न लोग एक नंबर के करप्ट लगते
हैं. इसलिए आप देखते होंगे कि ऐसे मीडियाकर्मी,एंकर जब किसी शख्सियत को डिमीन
करते हैं तो उसके पहले उनकी तटस्थता,धैर्य और पत्रकारिता के मामूली संस्कार भी
कद्दू काटने चले जाते हैं. वो स्क्रीन पर,फेसबुक की दीवारों पर जो कुछ भी
बोल-लिख रहे होते हैं, अगर उसकी टेक्सट अरुणा ब्रूटा जैसे किसी मनोवैज्ञानिक
चिंतकों के हाथ सौंप दिए जाएं तो यकीन मानिए वो कहेंगे- इन्हें खबर
पढ़ने-लिखने के पहले सख्त इलाज की जरुरत है और इन्हें किसी भी हाल में अकेला
नहीं छोड़ा जाए, कभी भी कुछ भी कर बैठ सकते हैं.
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