[दीवान]संजीव कुमार की कहानी "घोंघा"
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sat Jun 8 01:22:46 CDT 2013
अभी-अभी संजीव कुमार की कहानी "घोघा पढ़ा". पढ़ने के बाद टिप्पणी की शक्ल में
कई बार संबंधित ब्लॉग पर पोस्ट करने की कोशिश की लेकिन पता नहीं क्यों वो गया
नहीं. जो और जैसा लगा-
एक रौ में पढ़ गया और पढ़ने के बाद लगा कि कहानी की शुरुआत में जो परिचय दिया
है वो तर्कसंगत नहीं है. सबसे अच्छी बात लगी कि कहानी का मुख्य चरित्र या कहें
तो स्वयं आपने अपने को इस रुप में रखा है कि पाठक की बारीकी आपके प्रति कहीं
से भी श्रद्धाभाव नहीं जुड़ेंगे और जितुआ से बहुत अलग करार नहीं देंगे क्योंकि
जितुआ और इस मुख्य चरित्र की आदिमवृत्ति के स्तर पर कोई फर्क नहीं है. फर्क है
तो सिर्फ उसके थोड़ा फाइन हो जाने के और इस फाइन हो जाने में बुद्धिजीवी होने
की प्रक्रिया का कच्चापन लिए एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसके परिपक्व होने की
स्थिति में भी कहानी की दिशा या वो लड़की उसी धार में समाहित होती, कहना
मुश्किल है..
स्कूल और कॉलेज के दिनों में ऐसे हमने कई चरित्र देखें हैं,खासकर बाकी की
अपेक्षा अधिक-पढ़ने लिखनेवाले जो सेक्स,ब्लू फिल्म,लाइनबाजी वो सब करना चाहते
हैं लेकिन पढ़ने में बेहतर होना उसके भीतर इतनी सारी सामाजिक नैतिकता के
निर्वहन का दवाब पैदा कर देते हैं कि वो जितुआ नहीं हो सकता,वो घोंघा और
चुप्पा बनकर ही उससे गुजरेगा.
ये कहानी मध्यवर्ग के बीच से पैदा होनेवाले बुद्धिजीवी की कच्ची फसल का
प्रतिनिधित्व करती है जिसमें एक गुंजाईश ये भी है कि इससे गुजरकर पाठक अंदाजा
लगा सकें कि उसका परिपक्व रुप क्या होगा ? बाकी मानवीयता या सरोकार के कई रंग
हो सकते हैं. मसलन जितुआ मुख्यचरित्र की जगह दूसरे किसी ऐसे लड़के को भोग लेने
की नियत से ले जाता तो हो सकता है वो मुख्यचरित्र की तरह उसकी क्रिस्टल
ब्यूटी( नग्न सौन्दर्य कहना सही नहीं होगा), उसकी बेचैनी और विवशता के बीच
अपनी दमित इच्छा के बीच आंखमिचौनी खेलने के बजाय खुलकर बचाव में आता. तब लड़की
के कूदने के बजाय जितुआ के शरीर का चार टुकड़ा उस गंगाजी में तैर रहे होते और
उस तथाकथित चरित्रहीन, हॉस्टल में बदनाम उस पात्र का विरेचन हो जाता.आखिर समाज
में व्यक्तित्व का एक रेशा ऐसा भी तो रहा है न कि वो चाहे जितना भी बड़ा
बदमाश,गुंडा,मवाली रहा हो लेकिन स्त्री की इज्जत को लेकर वही राय रखता है जैसा
कि कहानी के मुख्य चरित्र में दिखाई दिया. लेकिन हां, इससे कहानी फिर
निर्धारित सत्य की तरफ बढ़कर कमजोरी हो जाती और यर्थाथ की पकड़ से ढीली होकर
काफी लिजलिजी भी.
http://tirchhispelling.wordpress.com/2013/06/06/घोंघा-संजीव-कुमार-कहानी-ब/
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