[दीवान] (no subject)

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Sat Oct 12 05:45:21 CDT 2013


सोनिया गांधी एक सुपर प्राइमिनिस्टर


सोनिया गांधी सुपर प्राइमिनिस्टर कहलाती हैं। वे राजनीतिक हैसियत के शिखर पर
हैं। उनके 2016 में संन्यास लेने की बात अटकलबाजी है। 1991 में नरसिंह राव का
नाम बढ़ाकर उनसे जो गलती हुई थी, उसे उन्होंने पूरी तरह साध लिया है। अब
उन्हें चुनौती देने वाले गिनती के लोग हैं। मई, 2004 से वे इस मुकाम पर बैठी
हैं।

हालांकि, जब सोनिया 1968 में इंदिरा गांधी की बहू बनकर भारत आई थीं तो उनकी
राजनीति में कोई रुचि नहीं देखी गई थी। पर, दिलचस्प तथ्य है कि गत 15 सालों से
वे कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के 128 सालों के इतिहास में इतने
लंबे समय तक कोई अध्यक्ष नहीं रहा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जब सोनिया
गांधी भारत आईं, उन्हीं दिनों कांग्रेस पार्टी प्रवृत्तिगत बदलाव के दौर से
गुजर रही थी। वह धीरे-धीरे अपनी लोकतांत्रिक परंपरा की केचुल उतार रही थी। आज
जब सोनिया कांग्रेस की अध्यक्ष हैं तो इसकी  पहचान एक वंशवादी पार्टी के रूप
में स्थापित हो गई है। अब यहां चुनाव का वो पुराना रिवाज नहीं है, जिसपर कई
इतिहास लिखे गए। अब तो इच्छा से लोग नामित किए जाते हैं।

सोनिया गांधी 1991 से ही कांग्रेस पार्टी को परोक्ष रूप से नियंत्रित कर रही
हैं। उन्होंने एक समय इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीएन.हक्सर की सलाह पर
नरसिम्ह राव का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे किया था। हालांकि, सोनिया गांधी
को यह फैसला भारी पड़ा। 1991 से 1996 तक नरसिंह राव ने सोनिया गांधी को अधिक
महत्व नहीं दिया। वे समय-समय पर उनसे अपनी बात भी मनवाते रहे। हालांकि,
1991-96 तक अर्जुन सिंह लगातार सोनिया गांधी को पत्र लिखते रहे और उनसे अनुरोध
किया कि “आप कांग्रेस का नेतृत्व संभाले।” पर, सोनिया गांधी ने उन पत्रों का
कोई जवाब नहीं दिया। यह नरसिंह राव की सफलता है कि उनके रहते कांग्रेस में
सार्वजनिक तौर पर यह मांग कभी नहीं उठी कि सोनिया गांधी पार्टी संभालें। एक
रोचक किस्सा है, जिसे स्वयं अर्जुन सिंह ने अपने करीबी लोगों को बताया था।
1995 में ‘तिवारी कांग्रेस’ बनी थी। अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी उसके
कर्ता-धर्ता थे। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में उसका पहला अधिवेशन हो रहा
था। वहां सोनिया गांधी को भी आना था। मंच से लगातार इसकी घोषणा हो रही थी, पर
अंत तक वो नहीं आईं। अर्जुन सिंह ने बताया था कि नरसिंह राव के मना करने पर ही
सोनिया गांधी तालकटोरा स्टेडियम नहीं आईं।

खैर, जब राव के बाद सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो जरूर कई मोर्चों
पर उन्हें चुनौती मिलनी। धीरे-धीरे पार्टी के भीतर सोनिया गांधी की मांग उठने
लगी। 1997 के अंत में सोनिया गांधी ने कहा कि वे पार्टी के लिए चुनाव प्रचार
करेंगी। पार्टी में सोनिया के प्रति आग्रह और अपील बढ़ी तो सीताराम को अपमानित
होकर पद छोड़ना पड़ा। तबतक कांग्रेस पार्टी इसे अपनी नियति मान चुकी थी कि उसे
वंश परंपरा में ही चलना है। 1998 में सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं।
फिर ऐसी हवा बनाई गई थी कि कोई चमत्कार होगा। पर ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस
पार्टी चुनावों में असफल रही। हां, नाउम्मीदी के बीच 2004 में कांग्रेस को
सफलता मिली। इसके बाद सोनिया गांधी एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह अपने पत्ते खेल
रही हैं। लगातार पीएम हाउस में रहने के कारण राजनीति को सोनिया गांधी ने करीब
से देखा है। वह अनुभव उनके काम आ रहा है।

इसलिए जब प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी को चुनौती मिली तो सोनिया ने
मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में चुना। हालांकि, तब उनके पास प्रणब
मुखर्जी सरीखे कई विकल्प थे, पर सोनिया 1991 की गलती दोहराना नहीं चाहती थीं।
इस बार उनका निशाना सही लगा है। 10 साल बाद भी पार्टी और सत्ता में उनकी पकड़
मजबूत हुई है। वे सुपर प्राइमिनिस्टर कहलाने लगी हैं। 1991 में जो चूक उनसे
हुई थी, उसे उन्होंने पूरी तरह साध लिया है।

हालांकि, 2004 से बतौर कांग्रेस अध्यक्ष जो प्रयोग हो रहे हैं, वह कांग्रेस की
परंपरा के विपरीत है। यकीनन इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस की आत्मा चोटिल हुई
थी। पर, प्रधानमंत्री पद को उन्होंने मजबूत किया था। आज प्रधानमंत्री पद की
गरिमा भी नीचे आई है। यह पद अपेक्षाकृत कमजोर दिख रहा है। 1984-85 तक जिस
सोनिया गांधी का पसंदीदा स्थल दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय हुआ करता था, अब
वे प्रधानमंत्री के साथ देशभर के दौरे में व्यस्त हैं। इससे कई रिवाज टूटे
हैं, जिसका सीधा असर भारत के लोकतंत्र पर पड़ा है। दुर्भाग्यवश वह कमजोर हो
रहा है। यह कहा जाने लगा है कि सरकार गतिहीन और दिशाहीन हो गई है। जमीन पर
संगठन कमजोर हुआ है। गत 15 सालों में बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में
कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब हुई है। इसमें कोई सकारात्मक बदलाव आएंगे, ऐसी
कोई संभावना भी नहीं दिख रही है।
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