[दीवान]गोरखपुरः 93 साल के एक इतिहासकार से मिलना

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sun Oct 20 23:54:32 CDT 2013


93 साल के उस इतिहासकार से जब मैंने कहा- अच्छा सर, अब चलता हूं,दिल्ली
पहुंचते ही आपकी किताबें पढ़कर फोन करुंगा, उनके दोनों हाथ मेरे कंधे से
खिसकते हुए हथेलियों तक आ गए और थोड़े वक्त के लिए पकड़े रहे..उस स्पर्श ने
मुझे भीतर तक बहुत गीला कर दिया था और आंखे पनिया गई थीं. हाथ छूटते ही वो
नमस्कार के लिए जुड़ने के बजाय अपने आप उनके पैर की तरफ चले गए और मैं इस बीच
उनके आगे झुक गया था..अगली बार आवोगे न और पहिलै से बता के रखोगे तो हम बाकी
चीजें निकालकर रखेंगे..पैर छूते हुए बीए की पढ़ाई के लिए घर से बाहर
निकलते,पापा को पैर छूते और उतनी ही बेरुखी से उनका पलटता चेहरा सब याद आ गया.
हमने उसके बाद कभी किसी के पैर नहीं छुए थे और 14 साल बाद ये पहले व्यक्ति थे
जिनके लिए ऐसा करने से रोक नहीं सका.
गाजियाबाद पहुंचने से घर आने तक के बीच उनसे तीन बार बात हो चुकी है..अपने
अंदाज से उन्होंने ट्रेन पहुंचने के वक्त फोन किया..पहुंच गए विनीत और फिर
पहुंचने तक के अपडेट्स..अच्छा सुनो, तुम घर तो पहुंच गए लेकिन बीच-बीच में
हमको फोन करते रहना. उनकी ये लाइन जैसे अटक गयी है मेरे भीतर. मुझे अंदाजा
नहीं था कि गोरखपुर मेरे लिए बिल्कुल अंजान शहर इतना आत्मीय, इतना भावुक कर
देनेवाला शहर होगा जहां मैं अगली छुट्टी मिलने पर जरुर जाना चाहूंगा.

हम इस इतिहासकार को सिर्फ फेसबुक स्टेटस पर नहीं, लंबा लिखकर आपको बताना
चाहेंगे कि कैसे कोई शख्स पहले आपको पत्रकार, फिर छात्र और फिर जाते-जाते बेटे
के अधिकार से काफी कुछ बोल-बता जाता है.
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