[दीवान]हिन्दुस्तान में 'उच्च शिक्षा का बंटाधार' साबित करती बीबीसीहिन्दी.कॉम की कपिल सिब्बली रपट
shashi kant
shashikanthindi at gmail.com
Mon Oct 21 08:23:02 CDT 2013
'भारतीय उच्च शिक्षा: 10 तथ्य, सैकड़ों सवाल'(रेहान फ़ज़ल), 'जहां साहित्य और
इतिहास को कोई नहीं पूछता' (अमरेश द्विवेदी) शीर्षक से बीबीसीहिंदीकॉम ने
पिछले दिनों दे दनादन कई रपटें अपने वेबसाईट पर स्कड मिसाइल की तरह दागी हैं.
ये रपटें हिन्दुस्तान में उच्च शिक्षा की भयावह तस्वीर पेश कर रही है. हालात
इतने भी बुरे नहीं हैं. इन रपटों को हिन्दुस्तान में उच्च शिक्षा के पूर्ण
निजीकरण की साजिश के तौर पर पेश की गई 'कपिल सिब्बली रपटें' कहनी चाहिए. ताकि
भारत सरकार को बताया जाए कि वह उच्च शिक्षा के नाम पर जो थोड़ी-बहुत राशि खर्च
कर रही है वह 'गोयठा में घी सुखा' रही है.
२०० साल की औनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के पश्चात विज्ञान, टेक्नोलॉजी, मानविकी
और साहित्य के क्षेत्र में हिन्दुस्तान के इन्हीं विश्वविद्यालयों से तालीम
हासिल करकरोड़ों हिन्दुस्तानी दीगर क्षेत्रों में अपना-अपना परचम लहरा रहे हैं.
भारत सरकार द्वारा पोषित मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों से तालीम पाकर लाखों
डाक्टर और इंजीनियर अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों और दुनिया के अन्य मुल्कों में
अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जिसका रोना हम वर्षों से रो रहे हैं.
हिन्दुस्तान की बहुलतावादी सामाजिक-राजनीतिक-भाषाई संस्कृति के विविध आयामों
की जटिलताओं और द्वंद्वों को मानविकी और साहित्यिक लेखन में जो अभिव्यक्तियाँ
मिली हैं उससे न केवल हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली मज़बूत हुई है बल्कि सदियों
सत्ता, समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारतीय समाज के कमज़ोर, गरीब,
पिछड़े, दलित, स्त्री, आदिवासी तबके की भागीदारी बढी है.
हिन्दुस्तान के पचास करोड़ से ज़्यादा युवा आज नए उत्साह और नई उम्मीद से सराबोर
है, बस, जरूरत है उन्हें सही दिशा दी जाए और उन पर भरोसा किया जाए. इसलिए
हिन्दुस्तान में 'उच्च शिक्षा का बंटाधार' साबित करती बीबीसीहिन्दी.कॉम की इस
कपिल सिब्बली रपट को हम खारिज करते हैं,
हाँ, इस रपट में यदि आंशिक सच्चाई भी है तो इस पर गंभीरतापूर्वक बात ज़रूर होनी
चाहिए और इसे सुधारने की दिशा में भारत सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय,
यूजीसी, मुल्क के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों और उनसे सम्बद्ध
बुद्धिजीवियों/शिक्षाशास्त्रियों को कमर कसनी चाहिए.
- शशिकांत
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