[दीवान]अविचल रहती है कुर्सी
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Mon Oct 21 16:24:29 CDT 2013
दोस्तों रात काफी हो चुकी है पर नींद ने आज मुझे धोखा दे दिया है। वजेह भी
बताऊंगा, हालांकि न तो मैं रामसेतु को ले कर परेशान हूँ और न हिंदुस्तान में
उच्च शिक्षा के बदहाल भविष्य की चिंता में दुबला हो रहा हूँ। मेरी परेशानी का
सबब तो आज के एक हिंदी अख़बार में छपी वो छोटी सी रपट है जिसे पढने के बाद सुबह
से ही मेरा माथा भन्ना रहा है। आप कहेंगे कि मियां ख़बरों से परेशां न होइए,
आराम बड़ी चीज है मुहं ढक के सोइये। तो मै यह भी बता दूँ कि पिछले कई घंटों से
मैं मुहं ढक के सोने का प्रयास कर रहा था लेकिन वाकई उस खबर ने मेरी नींद उडा
दी है। इस अनिद्रा से परेशान और लाचार हो के मैंने कमरे की बत्ती का स्विच एक
बार फिर से खटका दिया है, और नतीजे में कम्प्यूटर के सामने बैठा आप से मुखातिब
हूँ। अब आप ये कहेंगे की क्यों बौरा रहे हो, रात -बिरात जब सत्ता और विपक्ष
दोनों के ही लोग लम्बी तान के सो रहें हैं तब तुम्ही क्यों भूत बने जागते और
रिरियाते हो ! दरअसल, मैं रिरिया नहीं रहा और ये मसला भी किसी मामूली भूत का
नहीं बल्कि एक भयंकर देव का है। क्या कहा देव-दानव को नहीं मानते ? अरे बचपन
में वो किस्सा तो पढा ही होगा: जहाँ एक नौजवान यात्री घूमता फिरता शाम
ढलते-ढलते एक नगर में पहुँचता है। रात बिताने के लिए इस यात्री को एक ठिकाने
की तलाश है। और यह तलाश तब खत्म हो जाती है जब एक बुढिया उसे अपने घर में जगह
देने के लिए तैयार हो जाती है। वैसे बुढ़िया कुछ परेशां नज़र आ रही है और उसकी
परेशानी का सबब जानने के बायस ही कहानी का नायक याने हमारा नौजवान उस बुढ़िया
से पूछ बैठता है; क्या बात है माई, आप कुछ परेशान लग रही हो?. बुढिया पहले तो
टाल-मटोल करती है लेकिन नौजवान के थोडा ज़ोर दे कर पूछने पर बेबस हो कर अंततः
अपने ग़मों की गठरी उसके सामने खोल कर रख देती है। वो बताती है की उस नौजवान की
ही उमर का उसका अपना एक बेटा है जो आज की ही रात उसे छोड़ कर हमेशा के लिए इस
दुनिया से रुखसत हो जाने वाला है। नौजवान नायक को अव्वल तो इस बात का सिर पैर
कुछ समझ में नहीं आता और उसके दोबारा सवाल करने पर बुढिया तफ़सील में जा कर ये
बताती है की इस नगर के बाहर एक गुफा है जिसमें एक देव रहता है। इस नगर के राज
काज को चलाने वाली सभा के साथ उसका ये करार है की रोज उसके खाने के निमित्त
नगर से एक हट्टा कट्टा नौजवान शाम होते होते उसकी गुफा तक खुद ब खुद पहुँच
जायेगा, और जिस दिन गलती से भी ऐसा नहीं हुआ उस दिन वो भयंकर देव इस पूरे नगर
को तबाह कर देगा और एक- एक को जिन्दा चबा जायेगा। और, दुर्भाग्य से, आज की रात
उस बुढिया के लड़के को उस भयंकर देव का आहार बनना है। यह बयान सुन कर कहानी का
नायक याने हमारा नौजवान गुस्से से भर उठता है, और बुढिया के लड़के की जगह खुद
उस भयंकर देव की गुफा में जाने का फैसला कर वहां से चल पड़ता है। इतना ही नहीं
अपनी तलवार के जोर से कहानी का नायक उस देव के टुकड़े टुकड़े कर देता है और इस
तरह अन्याय का खातमा कर के खुशहाली और समृद्धि का राज कायम करता है। हाँ, हो
सकता है ये कोई जातक कथा हो! लेकिन मैं क्यों इसे लिख सुना कर आपका कीमती वख्त
बर्बाद कर रहा हूँ?
अरे हुजूर मैं कौन होता हूँ आपका कीमती समय बर्बाद करने वाला, मेरी तो अपनी
नींद उस खबर ने उड़ा दी है। क्या कहा समझ गए। अरे नहीं भाई आप गलत समझ रहे हैं,
मैं मुल्क की कंपनियों द्वारा एशिया और अफ्रीका में व्यावसायिक खेती के लिए
खरीदी जा रही जमीनों की बात नहीं कर रहा। मैं तो उस गोपनीय पुलिस रिकॉर्ड पर
आधारित खबर की बात कर रहा हूँ जिसके अनुसार दिल्ली में हर रोज पांच लोग आत्म
हत्या कर रहे हैं और इनमे से हर पांचवां बेरोजगारी के चलते अपनी जिन्दगी को
ख़त्म किये दे रहा है। हाँ आप सही कह रहे हैं इतनी बड़ी दिल्ली और वो भी इतने
बड़े राष्ट्र की राजधानी आंकड़ों के लिहाज से इसका कितना मतलब है। जनाब अगर
आंकड़ों के हिसाब से देखें तो ठीक है की यह संख्या महज १ ८ ० ० सालाना पहुंचती
है, उसमें भी बेरोजगारी से मरने वाले तो साल भर में बस ३ ६ ० ही हुए। महाराज,
मैं मानता हूँ की आप के हिसाब से यह कोई विशाल संख्या नहीं है और सिर्फ आंकड़ों
के जानिब तर्क वितर्क में मैं एक क्या अगली सात पीढियो तक इस मुद्दे की
गंभीरता के प्रति आपको सजग नहीं कर पाउँगा। लेकिन ३ ६ ० -६ ५ की ये जो संख्या
है क्या ये यह साबित नहीं करती की बेरोजगारी का देव या दानव अकेले दिल्ली नगर
में रोज एक जिंदगी का आहार प्राप्त कर रहा है। और वो भी तब जब मनमोहनी विकास
का माडल पूरी तरह मुस्तैद है। क्या कहा मैं शिला दीक्षित के बजाय मनमोहन को
क्यूं घेर रहा हूँ? अरे भाई साहब आप समझे नहीं न तो मैं मुख्य मंत्री और न ही
प्रधान मंत्री की बात कर रहा हूँ, मनमोहनी विकास से मेरी मुराद तो उन आर्थिक
नीतिओं से है जिन्हें ९ ० के दशक में लागू करते हुए यह सब्जबाग दिखाया गया की
इस फार्मूले में हर मर्ज की दवा है। हाँ ये हो सकता है की मैं बहोत भोला हूँ,
और खास कर तब जब आप ये मानते हैं की सोनिया गाँधी ने जो भोजन सुरक्षा सम्बन्धी
बिल पास करवाया है उसके बाद इन मौतों पर रोक लग जाएगी। हुजूर मैं दावे के साथ
यह कह सकता हूँ की विकास का ये जो मॉडल है यह दरअसल अवसाद की फसल खड़ी कर रहा
है, और राष्ट्रीय राजधानी में ही इस बढ़ते अवसाद की वजह से रोजाना एकाधिक लोग
आत्म हत्या का फैसला करते हैं। हाँ नगरीकरण के साथ तो ये सब होना स्वाभाविक ही
है, और वैसे भी छोटे-मोटे दंगों में इससे कहीं ज्यादा लोग मर जाया करते हैं।
आप शायद ठीक कह रहे हैं, लेकिन हमें तो दंगों की दरकार नहीं है और न ऐसे
मनमोहनी विकास की जहाँ रोज़ इंसानी खून की बलि चढ़ती हो । मैं क्या चाहता हूँ ?
सबसे पहले तो ये की सरकार अपनी जिम्मेवारी स्वीकार करे और इस बात की कायदे से
पड़ताल हो की बेगुनाहों को रोजाना बलि चढ़ने से कैसे जीवनदान मिले। क्या कहा
कुर्सी पर बैठे लोग सत्ता के मद में चूर हैं। सही कहा आप ने, और शायद इसी
लिए मुझे गोरख पाण्डेय की ये कविता सोने नहीं दे रही-
अविचल रहती है कुर्सी
माँगों और शिकायतों के संसार में
आहों और आँसुओं के
संसार में अविचल रहती है कुर्सी
पायों में आग
लगने
तक ।
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