[दीवान]ताकि मीडिया की फसल चौपट होने से बच जाए

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sat Nov 8 00:32:03 CST 2014


Bonnie Anderson की किताब न्यूज फ्लैश जब मैंने पढ़ी, उसके बाद जब भी किसी टॉक
शो में जाता, मीडिया सेमिनारों में टेलीविजन दिग्गजों से मुलाकात होती,अपील
करता..प्लीज आपलोग भी लिखिए न ऐसी किताब..किसी और के लिए नहीं तो कम से कम हर
साल ग्रेजुएट हो रहे उन हजारों मीडिया स्टूडेंट के लिए जिन्हें मीडिया की पूरी
ट्रेनिंग क्लासरूम को यज्ञशाला बनाकर दी जाती है..मैं इन बच्चों से सीधे
संपर्क में हूं. मैं जानता हूं कि मीडिया की पूरी की पूरी फसल कैसे चौपट हो
रही है. ये ज्ञान वो लेकर न्यूजरूम में हवन कर सकते हैं, न्यूज के साथ, तकनीक,
व्यावसायिक दवाब को झेलते हुए भी संवेदनशील होकर खबर नहीं कर पाते.

एन्डरसन ने जिस अंदाज में किताब लिखी है, अपने सालों के सीएनएन के अनुभव और
छोड़ने की पूरी घटना के साथ जिस तरह टेलीविजन को डिफाइन किया है, अद्मभुत है.
आप जब खुद इस किताब को पढ़ेंगे तो लगेगा कि कई शख्स तमाम तरह के दवाब को झेलते
हुए भी कैसे उसी पैशन से सालों तक काम करता रह गया और जब वही सारी बातें किताब
में आती हैं तो फ्रस्ट्रेशन में नहीं बल्कि उस खुरदरे यथार्थ की शक्ल में
जिससे गुजरकर हर न्यूकमर अपने को मानसिक रूप से बेहतर तैयार कर सकता है. खैर

मुझे कुछ लोगों ने आश्वस्त किया है कि वो जरूर किताब लिखेंगे..वैसी नहीं जो
मीडिया में नौकरी करते हुए, आनन-फानन में इसलिए किताब लिख रहे हैं कि मौका
मिलते ही वो किताबें लेक्चरशिप के लिए जुगाड़ फिट करने के काम आ सके..ऐसी
किताब जिसके लिखने के पीछे ध्येय हो कि हमने काम करते हुए मीडिया को किस रूप
में देखा, सत्ता-राजनीति और उसके चरित्र मीडिया की शक्ल कैसे बदलते हैं औऱ वो
खुद को भी.

राजदीप ने आज से चार साल पहले जब एक सेमिनार में कहा कि हम मालिकों के हाथों
मजबूर हैं. आप यहां रानीतिक खबरों की पेड न्यूज की बात करते हों, बिजनेस और
एन्टरटेन्मेंट की खबरों पर बात करें, आपको ये पैटर्न का हिस्सा लगेगा..उस वक्त
हमने इसे लेकर सोशल मीडिया पर लिखा और बाद में अपनी किताब मंडी में मीडिया में
भी शामिल किया..अंदाज थोड़ा तंज ही था..लेकिन

एक बात पर अटक भी जा रहा था कि राजदीप जैसे लोग किताब लिखेंगे तो कितनी
दिलचस्प, मौलिक और विश्लेषणपरक होगी. आज सुबह उनकी किताब हाथ में है..चुनाव के
दौरान, बीजेपी स्ट्रैटजी के हवाले से जो बातें उन्होंने मीडिया को लेकर की है,
टुकड़ों-टुकड़ों में वो सारी बातें सोशल मीडिया में किसी न किसी रूप में आती
रही है...लेकिन राजदीप ने जिस अंदाज में और जिन तथ्यों के साथ कहीं है, उन
सबको और विश्वसनीय बनाता है. खासकर multimedia is the message चैप्टर तो ऐसा
है कि जिस पर अलग से पूरी किताब लिखी जा सकती है.

किताब के कुछ ही पन्ने से गुजरा हूं और इसे वायपास की तरह सांय से गुजरना भी
नहीं चाहता, ठहरकर, आराम-आराम से बल्लीमारान के जाम से गुजरते हुए पढ़ना चाहता
हूं..लेकिन इतना तो जरूर है कि राजदीप जैसे मीडियाकर्मी कुछ नहीं तो ऐसी एक
किताब लिख जाते हैं तो हमारी मीडिया की वो फसल चौपट होने से बच जाएगी और काफी
हद तक मीडिया की अकादमिक दुनिया भी जिसकी क्लासरूम की दुनिया और न्यूजरूम की
दुनिया दो अलग-अलग उपग्रह हैं..इस किताब को ज्यादा से ज्यादा पढ़ा जाना चाहिए
और अपनी बात रखी जानी चाहिए..
[image: Vineet Kumar's photo.]
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