[दीवान]स्वच्छता अभियान और मनोरंजन
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Oct 26 13:46:09 CDT 2014
मूलतः प्रकाशित- जनसत्ता, 26 अक्टूबर 2014
स्वच्छता अभियान के तहत दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान और अभिषेक बच्चन ने कॉमेडी
नाईट्स विद कपिल के प्रेजेंटर कपिल शर्मा की झाडू से सफाई की. फिल्म हैप्पी
न्यू इयर की प्रोमोशन में आए इन सितारों ने पहले तो स्टूडियो की फर्श जो की
पूरी तरह साफ-सुथरा थे, पर झाडू फिराए, उसके बाद एक-एक करके कपिल शर्मा के
शरीर पर झाडू फिराना शुरु किया. जाहिर है ये सब मनोरंजन के लिए किया गया सो
स्टूडियो में मौजूद ऑडिएंस सहित स्वयं कपिल शर्मा इस पर लगातार हंसते रहे.
नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की स्वच्छता अभियान की लोकप्रियता जितनी तेजी से
बढ़ी है, उसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कॉमेडी नाईट्स विद
कपिल के अलावा बिग बॉस सहित ऐसे आधे दर्ज टेलीविजन शो में इसकी चर्चा किसी न
किसी रुप में हुई. कुछ में तो सीधे-सीधे पूरी क्र्यू( टीम) को सफाई करते हुए
दिखाया गया तो कुछ में संवादों के माध्यम से टीवी दर्शक को ये बताने की कोशिश
कि देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है.
ये बात अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि मनोरंजन चैनलों में स्वच्छता अभियान
को लेकर कंटेंट सामने आ रहे हैं, उसके लिए उसी तरह करोड़ों रूपये खर्च नहीं
किए जा रहे हैं जैसा कि समाचारपत्र, एफएम रेडियो, ओओएच( आउट ऑफ होम) और स्वयं
टेलीविजन पर प्रसारित स्वच्छ भारत विज्ञापन प्रसारित करने के उपर किए जा रहे
हैं. चूंकि ये अभियान लोगों के बीच इतना लोकप्रिय होता जा रहा है कि इस पर
कॉमेडी शो करने से लेकर चरित्रों के संवाद में शामिल करना बिल्कुल स्वाभाविक
है. वैसे भी टेलीविजन न केवल पॉपुलर जॉनर पैदा करता है बल्कि इससे इतर पब्लिक
स्फीयर के दूसरे माध्यमों के बीच ये बनते हों तो उन्हें पालने-पोसने का भी काम
करता है. लेकिन
मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रमों में इस अभियान को शामिल किए जाने की
स्वाभाविकता के बीच दो बुनियादी सवाल उठते हैं. पहला तो ये कि क्या इस
स्वाभाविकता का भी कोई अर्थशास्त्र है और दूसरा अगर ऐसे अभियान स्वाभाविक रुप
से टेलीविजन शो का हिस्सा बनते हैं तो इनका कोई अतिरिक्त संस्करण बनता है ?
बालिका वधू जैसे लोकप्रिय टीवी सीरियल के एक चरित्र को अचानक से दांत में
दर्द हो और तब न केवल उसका निदान सेंसोडाइन टूथपेस्ट में ढूंढा जाता है बल्कि
वहीं पंक्तियां उनके द्वारा दोहरा दी जाती है जो कि इस टूथपेस्ट के विज्ञापन
के दौरान इस्तेमाल किए जाते रहे हैं. कहना न होगा कि बालिक वधू के प्रसारण के
दौरान इस टूथपेस्ट के विज्ञापन आक्रामक अंदाज में आते रहे हैं. दर्जनभर
रियलिटी शो तो बहुत पहले से ही शुक्रवार को रिलीज होनेवाली हिन्दी फिल्मों के
लांच पैड बन चुके हैं और पूरा एपीसोड, प्रतिभागियों के लिए गाने या डांस की
थीम उन्हीं पर आधारित होते ही हैं, शुक्रवार के टीवी सीरियलों के एपीसोड इन
फिल्मों के हिसाब से तय की जाती है. गुरुवार के दिन ही सीरियल में ऐसी घटना
शामिल की जाती है कि अगले दिन आनंदी जैसी चरित्र( वालिका वधू) को बचाने के लिए
अभिषेक बच्चन की स्पेस बन जाए आ जाएं ताकि उस सप्ताह रिलीज होनेवाली फिल्म पा
की प्रोमोशन हो सके. ऐसे में मनोरंजन चैनल के लिए ये बेहद स्वाभाविक हो गया है
कि शुक्रवार को जो भी टीवी सीरियल या रियलिटी शो वो देखने जा रहे हैं, उसका
बड़ा हिस्सा कोई सिनेमा, उससे जुड़ी कहानी, स्टंट या परफॉर्मेंस होंगे. लेकिन
ये पहले स्तर की स्वाभाविकता है जिसकी ऑडिएंस अभ्यस्त हो चली है. ये जरूर है
कि ये स्वाभाविकता बेहद प्रयासजन्य है और जिसका अपना बड़ा अर्थशास्त्र है.
स्वच्छता अभियान ये दूसरे स्तर की टेलीविजन सामग्री है जो स्वाभाविक तो जान
पड़ती है लेकिन जिसका अर्थशास्त्र या कह लें पी आर प्रैक्टिस ऑडिएंस के लिहाज
से अदृश्य हैं. बहुत होगा तो बालिक वधू और सेंसोडाइन के आधार पर वो ये कह सकते
हैं कि चूंकि मनोरंजन चैनलों में भी इनके धुंआधार विज्ञापन आ रहे हैं इसलिए
इसे रियलिटी शो या सीरियल में शामिल किया जाने लगा है. टेलीविजन अगर किसी
उत्पाद, सेवा या अभियान का धुआंधार विज्ञापन कर रहा है तो ये उस पर नैतिक(
व्यावसायिक कह लें) दवाब है कि उसके अनुरूप माहौल भी निर्मित करे. अभियान के
अतिरिक्त संस्करण का सवाल इसी से जुड़ा है.
टेलीविजन जब भी किसी अभियान और उसकी लोकप्रियता को पालता-पोसता है,
प्रोत्साहित करता है, अपने भीतर उसका अपना शास्त्र रचता है. ये शास्त्र की
केन्द्रीयता न केवल मनोरंजन आधारित होती है बल्कि आस्वाद की भिन्नता पैदा करने
के लिए इसके विरोध में भी चली जाती है. उसकी पूरी जद्दोजहद इस बात को लेकर
होती है कि विज्ञापन, न्यूज चैनल और पब्लिक स्फीयर से लोकप्रियता के जिन
तत्वों को लिया है, उससे वो स्वायत्त सामग्री बना पा रहा है या नहीं ? मनोरंजन
चैनलों पर स्वच्छता अभियान का संस्करण इससे मुक्त नहीं है.
स्वच्छ भारत की सीरिज में जितने भी विज्ञापन शामिल किए गए हैं, उनका व्याकरण
स्केच या कार्टून आधारित है. कुछ-कुछ जगहों पर डॉक्यूमेंटरी फिल्म जैसी फुटेज.
गंदगी को कुछ बिखरी चीजों तक ही सीमित कर दिया गया और बाकी हिस्सा साफ है. इसे
हम उन बड़े और सिलेब्रेटी चेहरे जिसकी अभ्यस्त सरकारी मशीनरी भी दिखी, की ओर
से की गई सफाई में भी लगातार न्यूज चैनलों के मार्फत देखते आए हैं. कागज के
दो-चार बिखरे टुकड़े और पत्तियों को झाडू से समेटकर एक जगह कर देना स्वच्छता
को किसी कंपनी की ब्रांड लोगो( logo) की तरह समाहित करने जैसा होगा.
अब आप देखें कि मनोरंजन चैनल के किसी भी कार्यक्रम में साफ फर्श पर ही झाडू
फिराना भर स्वच्छता अभियान का प्रतीक बन गया जिसे आप चाहें तो सिग्नेचर ट्यून
या स्टाइल कह सकते हैं. इसके बाद जो ये अभियान आगे बढ़ता है उसमे स्वच्छता
मनोरंजन के वो सारे अर्थ ग्रहण करती है जिसमे झाडू से प्रेजेंटर का शरीर
झाड़ने से लेकर जोक्सः सिर्फ वयस्कों के लिए तक जाती है.
इधर स्वयं लोकप्रियता को केन्द्र में रखकर स्वच्छ भारत सीरिज में विज्ञापनों
का जोर इस बात को लेकर बढ़ चला है कि इनमे किसके गीत, किस राग और अंदाज में
शामिल किए जाएं, कार्टून नेटवर्क से लेकर कोरस गीतों का वो कौन सा चंक(
हिस्सा) इस्तेमाल किया जाए कि विज्ञापन अभियान को मजबूती देने से पहले, नागरिक
की हैसियत से जागरुक करने से पहले, टेलीविजन और एफएम के दर्शक-श्रोता की
हैसियत से लोगों का वैसा ही मनोरंजन करे जो कि दूसरे कार्यक्रम या विज्ञापन
करते हैं. ये अभियान का वो दूसरा संस्करण है जहां उसका मुकाबला स्वच्छता को
लेकर नहीं, वोडाफोन के जो-जो सीरिज जैसे विज्ञापन का असर पैदा करना है.
न्यूज चैनलों को ऐसे अभियान में सक्रिय राजनीतिक चेहरे, सरकारी मशीनरी की
गतिविधियों से तो फिर भी इतनी सामग्री मिल जाती है कि वो अपने दर्शकों का
स्वाद बदलते रहें, मनोरंजन चैनल जो स्वयं भी एकरस कार्यक्रमों का प्रसारण
करते-करते कॉन्सेप्ट के स्तर पर तंगहाल हो जाते हैं, उन्हें ऐसे अभियान के
विज्ञापन और उसके बीच से लोकप्रिय होते जॉनर मनोरंजन की दिलचस्प कच्ची सामग्री
मुहैया कराते हैं. कहना न होगा कि ये काम कोई तीन साल पहले( 5 अगस्त 2011 को
अन्ना ने इंडिया गेट से पहले सारेगम लिटिल चैम्पस से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
की शुरुआत की थी) हो चुका था और इस आंदोलन ने मटरु की बिजली का मंडोला फिल्म
से लेकर दर्जनों टेलीविजन शो के लिए सामग्री मुहैया कराया. अब इनमे शामिल रहे
लोग टेलीविजन और एफ एम चैनल के लिए धरना कुमार नाम से फीलर्स हैं.
यहीं पर आकर अभियान जबरदस्त लोकप्रियता होने के बावजूद उन व्यावहारिक पक्षों
से, असल जिंदगी से बिल्कुल जुदा हो जाते हैं जिसके बदलाव के लिए इसे
महत्वकांक्षी योजना के रुप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की जाती है. नहीं तो,
ऐसा तो नहीं है कि न्यूज चैनल हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव के
नतीजे दिखाने के साथ-साथ स्वच्छ भारत अभियान के विज्ञापन भी बैक टू बैक
प्रसारित कर रहे थे और बीजेपी के कार्यकर्ता सहित अध्यक्ष अमित साह ने न देखे
हों. इधर जिनकी सरकार भारत को प्रदूषण मुक्त भारत बनाने के लिए करोड़ों रुपये
के विज्ञापन खर्च कर रही है, उसी पार्टी का अध्यक्ष मुख्यमंत्री कौन के
पत्रकारों के सवाल के जवाब में यह कह रहा हो- अभी ये समय मुख्यमंत्री कौन पर
बात करने का नहीं, पटाखे जलाने का है..और हमने सचमुच देखा कि लगभग सभी न्यूज
चैनल के स्क्रीन पटाखे के धुएं से भर गए. आस्थावान समाज के लिए बेहतर है कि
टेलीविजन की सारी सामग्री को अभियान का दूसरा संस्करण ही माने, महज मनोरंजन और
मन बहलाव भर के लिए. बाकी जमीनी स्तर के काम टेलीविजन से बाहर तो होते ही हैं.
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