[दीवान]विरासत अभी खत्म नहीं हुई है

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Aug 3 13:21:21 CDT 2015


जुझारु( जो अपने नियर-डियर की नौकरी के लिए जूझता हो) मास्टर-प्रोफेसर के
वक्ता होने पर तो फिर भी सभा-संगोष्ठी के बाबा छाप सत्संग की शक्ल लेते देर
नहीं लगती लेकिन बिना किसी ऐसे जुझारु की मौजूदगी के पचास से भी ज्यादा लोग
फिल्म और परिचर्चा मिलाकर तीन घंटे से भी ज्यादा समय तक टिके रहते हैं, इस बीच
न तो कोई फोन कॉल रिसीव करने बाहर निकलता है और न ही महामारी की तरह शक्ल
दिखाकर बाहर निकलते हों तो समझिए विमर्श की विरासत अभी पूरी तरह ध्वस्त नहीं
हुई है.

<http://3.bp.blogspot.com/-nwpTSuNkvZw/Vb-w4zRu6lI/AAAAAAAARj0/vfezL9_OfUs/s1600/Screen%2BShot%2B1937-05-12%2Bat%2B11.48.42%2Bpm.png>

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के जोशीले साथियों की ओर से जो फिल्म
क्लब शुरु किया गया है, जिन्हें काम करते देख हम जैसे मद्धिम पड़ रहे लोगों का
उत्साह रिन्यू हो जाया करता है..चारों तरफ बातचीत-बहस की तेजी से सिकुड़ती
दुनिया के बीच उम्मीद का जिंदा रहना है. पीएचडी, एम.फिल् के रिसर्च स्कॉलर की
ओर से ये पहल उस खुरदरे वक्त में हुई है जहां ठीक इसी दिल्ली विश्वविद्यालय
परिसर में चंद गुंड़ों की ओर से मुजफ्फरनगर अभी बाकी है जैसी जरुरी
डॉक्यूमेेंट्री फिल्म का प्रदर्शन बीच में रुकवा दिया जाता है. एफटीआईआई की
कपार पर ऐसा शख्स लाकर बिठा दिया गया है कि वो टाइम्स नाउ पर सिनेमा को
परिभाषित करने में ही लगे रहने के वाबजूद चूक जा रहा है. जब आप सिनेमा ही नहीं
देखने-बनाने-पढ़ाने देने का परिवेश बचा पा रहे हैं तो उस पर बात करने की
गुंजाईश कहां बची रह जाती है ?

दूसरा कि आज से चार-पांच साल पहले जब ये ऐसा कर रहे होते तब बात फिर भी समझ
आती कि इसमे अपेक्षाकृत सुरक्षित भविष्य है..तब साहित्य को नए अनुशासन और
माध्यम से जोड़कर देखना मानसिक स्तर का विकास माना जाता था जबकि अब ऐसा करना
साहित्य की जमीन को हड़प लेना है..
ये स्कॉलर ऐसे वक्त में सिनेमा प्रदर्शन और बातचीत के लिए मंच तैयार करने में
जुटे हैं जब इसे साहित्य के छात्रों के लिए नौकरी के लिए जा रहे इंटरव्यू में
लगभग गैरजरूरी करार दिया जाने लगा है. इन्हें ये बात ठीक से पता है कि जब
पक्की नौकरी के लिए इंटरव्यू में शामिल होंगे तो पहला सवाल यही किया जाएगा-
सिनेमा पर आपकी जो समझ है सो तो है लेकिन इससे साहित्यिक योगदान का क्या संबंध
है ?.. लेकिन इन सबके वाबजूद ये सब लगे हुए हैं.

हम जैसे लोग जो इसी विभाग से साहित्य,भाषा विज्ञान और काव्यशास्त्र के साथ-साथ
मीडिया, कल्चरल स्टडीज और सिनेमा की जो थोड़ी-बहुत समझ लेकर निकले और अभी भी
किसी न किसी बहाने जुड़े हैं, ये नजारा देखना एक गहरे सुकून से गुजरने जैसा है
कि अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है. यदि एक फेसबुक पेज पर अपडेट किए जा रहे
संदेशों और एक फोन कॉल-मैसेज पर पचास से भी ज्यादा लोग आंखों-देखी फिल्म देखने
और उस पर बात करने के लिए जुट रहे हैं, बातचीत के दौरान वो बता भी रहे हैं कि
हमने ये फिल्म पहले दो बार देखी है तो यकीन मानिए ये किसी भी पीआर एजेंसी के
माथे पर बल पड़ जाने से कम नहीं है. किसी से किसी को कोई लाभ नहीं. ये भी लोभ
नहीं कि जुझारु प्रोफेसर-मास्टर शक्ल देखेंगे तो आगे सुविधा होगी. सबकुछ
स्वेच्छा से,अपनी मर्जी से, शुद्ध अभिरुचि के दम पर.

ऐसे प्रदर्शन के बाद छापा लगी कोई टीशर्ट नहीं, प्रेस किट, बैग,पेन,चमकाने के
लिए फाइल-फोल्डर नहीं..बस परिचर्चा के बाद इन दोस्तों ने हमलोगों को चाय ऑफर
की. जाहिर है इसके पैसे भी इन्होंने खुद ही कन्ट्रीब्यूट किए होंगे, एक बार मन
किया, कहूं- आपलोग रहने दो, इन सबके पैसे हमें दे लेने दो लेकिन रुक गया
क्योंकि इस सिलसिले को अभी बहुत दूर तक जाना है और कई मौके आएंगे. टीवी टॉक शो
में, पांच सितारा सेमिनारों में जाने-बोलने के हमें ठीक-ठाक पैसे मिलते हैं
लेकिन अपने लोगों के बीच बोलने-सुनने के लिए मन तब भी कचोटता है- हिन्दी विभाग
में जब भी नए दोस्त ऐसी पहल करते हैं तो लगता है जैसे शरीर के डेड सेल फिर से
हरे हो गए हों..
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20150803/fe025c2e/attachment.html>


More information about the Deewan mailing list