[दीवान]तब पल-पल की कवरेज थी, अब चौबीस घंटे की रनडाउन पर चूं तक नहीं

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sun Aug 30 10:56:51 CDT 2015


<http://4.bp.blogspot.com/-_vyrcrQiYr8/VeMne6CMonI/AAAAAAAARp8/dDjqc1Mh9XQ/s1600/Screen%2BShot%2B2015-08-30%2Bat%2B9.23.59%2Bpm.png>

उसी अमेरिका में काम कर रहे सौ से भी ज्यादा अकादमिक दुनिया के लोगों ने
नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की जमकर आलोचना की है जहां उन्हें पिछले साल जमकर
वाहवाही मिली थी. इस वाहवाही का नतीजा था कि अपने यहां जिन चैनलों को
मीडियाकर्मी को समय पर वेतन देने तक के पैसे नहीं होते, वहां कवरेज के लिए
तैनात रहे. कॉलेज फेस्ट की तरह एक-एक चीज दिखाते-बताते रहे.
देखते-देखते देश के प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यक्रम को इवेंट मैनेजमेंट का
हिस्सा बना दिया गया और निजी स्तर पर हाइप क्रिएट करके कार्यक्रम कराए गए.

हवा-हवाई इस कार्यक्रम पर प्रायोजकों, पीआर प्रैक्टिसनर और उन सैकड़ों बिचौलिए
की साख दाव पर लगी थी जो प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा को छोटे शहर में लगे
डिजनीलैंड मेला जैसा पॉपुलर बनाने में लगे थे. उसका परिणाम भी आया. चौतरफा
इसकी कवरेज से ऐसा लगा कि देश के प्रधानमंत्री अमेरिका गए नहीं है, वापस ये
देश ही उठाकर ला रहे हैं..इस वक्त की न्यूज चैनलों की कवरेज को याद करें तो
आपको लगेगा कि ये प्रधानमंत्री की नहीं, चैनलों के अपने-अपने मालिक और सीइओ की
यात्रा की कवरेज है. लेकिन

अब जबकि प्रधानमंत्री के करीब सवा साल के इस कार्यकाल की जमकर आलोचना करते हुए
अमेरिका का अकादमिक वर्ग निवेश के पहले अमेरिकी निवेशकों को आगाह कर रहा है तो
मीडिया में चारों तरफ सन्नाटा है. इस खबर की कहीं कोई चर्चा नहीं. आपको याद
होगा कि अमेरिका यात्रा के पहले दिन चैनलों पर कुछ घंटे के लिए छिटपुट ढंग से
ये भी खबर चली थी कि सड़कों पर से जब नरेन्द्र मोदी बतौर भारत के प्रधानमंत्री
गुजर रहे थे तो लोगों में कोई जिज्ञासा नहीं थी, पहचान तक नहीं रहे थे लेकिन
निजी इवेंट के आयोजन के बाद से ऐसा माहौल तैयार किया गया कि जैसे अमेरिका का
बच्चा-बच्चा नरेन्द्र मोदी को टेक्सट बुक और कार्टून चैनलों के मार्फत पहले से
आत्मीय है.

समझने की जरुरत है कि पीआर एजेंसी कैसे राज्य जैसी संस्था को, उसकी व्यवस्था
को मद्धिम करके आक्रामक ढंग से अपनी एक व्यवस्था रचती है जिसमे कि मीडिया
एजेंट का काम करता है और जैसे ही मामला उल्टा पड़ता है, फुस्स कर जाती है.
प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा की कवरेज और अकादमिकों की ये चेतावनी दरअसल
छवि निर्माण और वस्तुस्थिति को समझने का बेहतरीन जरिया है.
अकादमिकों की इस एप्रोच को बकवास बताने के लिए ही सही, मीडिया इस मुद्दे पर
बात तो करे. ‪#‎मीडियामंडी‬
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