[दीवान]सबाल्टर्नवाद का बतंगड
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Thu Jul 9 09:06:53 CDT 2015
*(दोस्तों, पिछले दिनों जनसत्ता के पृष्ठों से शुरू हुयी एक बहस को मैं दीवान
तक खींच लाया हूँ। इस बहस को आगे बढ़ाने के क्रम में, मैं विख्यात आलोचक
शंभुनाथ, आलोचना संपादक अपूर्वानंद, महेश जायसवाल और चारु सिंह को भी इस पोस्ट
की एक प्रति नत्थी कर रहा हूँ। ) *
सबाल्टर्नवाद का बतंगड संभव है कि भारतीय लोकतंत्र में लोकमन को आशा और भय जिस
तरह से संचालित करते हैं उसे समझने में समाज विज्ञान पूर्णतः विफल हो। मगर
शंभुनाथ जी का आलेख 'समाज विज्ञान का बिजूका' (जनसत्ता, १४ जून ) भी निश्चय ही
पाठकों को गहरे तक भयाक्रांत करने में अपना सानी नहीं रखता। अपने इस बेहद
आक्रामक आलेख के ज़रिये हो सकता है कि वे हमारा ध्यान किन्हीं महत्वपूर्ण
पहलुओं की तरफ आकर्षित करना चाहते रहे हों। लेकिन उनको पढ़ने और गुनने के क्रम
में एक प्राथमिक सवाल जो पाठक के दिलोदिमाग में बराबर उठता है वो ये कि, क्या
सच में हिंदी 'आलोचना' अब अन्हेरिया -पाख में दाखिल हो चुकी है? बेवजह परेशानी
के लिए माफ़ी चाहूंगा। दरअसल, भोजपुरी में 'अन्हेरिया -पाख' का मतलब होता है
'कृष्ण -पक्ष'। बहरहाल, परेशान करने वाली बात तो ये बेशक है ही ! क्योंकि, हम
अगर शंभुनाथ जी के पक्ष को शुरुआत से ही पूरा सच मान कर पढ़ें तो हिंदी आलोचना
हमें किसी अन्हेरिया- पाख में नहीं बल्कि सरापा 'सबाल्टर्नवाद' के दलदल में
भँसती नज़र आती है। और तब इसी संकटपूर्ण स्थिति के मद्देनज़र शंभुनाथ जी हमें उन
हिंदी बुद्धिजीवियों से विशेष कर आगाह कर देना चाहते हैं जो साहित्य को हेय
ठहराते हुए समाज विज्ञान के जरिये अपनी पहचान बदल डालने को आतुर हैं। सवाल
उठता है कि क्या वाकई हिंदी आलोचना ने कथा, कविता, आलोचना साहित्य की कीमत पर,
सामाजिक समझ को खंड -खंड करने वाली उस टेक्नोलॉजी को लोकप्रिय बनाने का फैसला
किया है जिसे बकौल शंभुनाथ विदेशी पूंजी, धर्म-निरपेक्ष राष्ट्रीय केंद्रवाद
और सबाल्टर्न अध्ययन की धारा से जुड़े समाज वैज्ञानिक मिल कर प्रचारित और
प्रसारित करना चाहते हैं। साथ ही, सवाल यह भी है कि क्या वाकई बज़रिये 'आलोचना'
सबाल्टर्नवाद और सेक्युलरवाद की कोई विरोधाभास-सी खिचड़ी पक रही है ?
एक ग़ौरतलब तथ्य यह भी है कि आलोचना के हालिया अंक (५३, ५४ ), जिनके माध्यम से
भारतीय जनतंत्र का जायज़ा लेने का प्रयास किया गया, पत्रिका की सम्पादकीय
जिम्मेवारी में बदलाव के साथ आये। खुद तिरपनवें अंक का सम्पादकीय वक्तव्य साफ
शब्दों में अपनी दिशा बयान करता है : 'तबदीली के साथ आलोचना की चिंताओं में एक
निरंतरता है -वह है आलोचना के अवकाश की रक्षा और उसे बढ़ाने का उद्यम।' अब जरा
ठहर कर सोचें तो क्या आलोचना के अवकाश की रक्षा का मतलब यहाँ कथा, कविता,
आलोचना साहित्य को तिलांजलि देना है ? और अगर भय के तार आलोचना के अवकाश को
बढाने के सहवर्ती उद्यम से जुडे हैं, जैसा कि महेश जायसवाल के हस्तक्षेप
('बेवजह बौखलाहट', २८ जून ) से भी लगता है। जहाँ फिर से एक सर्व-समावेशी '
सबाल्टर्न अध्ययन' जैसी कोटि के 'अंधानुकरण' वाली भ्रान्ति को दोहराया गया है।
तो शंभुनाथ जी को लगे हाँथ यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि उन्होंने स्वयं एक
महासंघर्ष के बिखराव के बाद नए उभारों मसलन पर्यावरणवाद, दलितवाद, स्त्रीवाद
और स्थानीय जातीयतावाद के मानवीय आशा का केंद्र बनने जैसी बात फ़िज़ूल
में क्यूँकर कही थी। इतना ही नहीं उन्होंने तो एक कदम आगे बढ़ कर 'अपनी सीमाओं
और संकीर्णताओं में भी ये उभार स्वागतयोग्य हैं' जैसा निर्णय भी सुना दिया था
(देखें, दुस्समय में साहित्य)। चलिए थोड़ी देर के लिए हम यह भी मान लेते हैं कि
इन नए उभारों में ठहराव, स्खलन और बिखराव भी परिलक्षित होता है फिर भी क्या
आशा के इन केन्द्रों से निरंतर संवाद की जरुरत अब वाकई ख़त्म हो गयी है ? अगर
नहीं, तो आज शंभुनाथ जी जिसे पूरी हिकारत से मार्क्सवाद और विकासशील राष्ट्रीय
विचारधाराओं के खिलाफ खड़ा सबाल्टर्नवादी शिविर बता रहे हैं, हम अकेले उसके
जिम्मे इन आशा केन्द्रों को भला क्यों छोड़ देना चाहेंगे ?
मुमकिन है कि शंभुनाथ जी के विवाद-जनक आलेख का मेरा अपना 'पाठ' पूरी तरह से
गलत और बचकाना हो। इसके बावजूद मुझे लगता है कि हमारे वरिष्ठ आलोचक राहुल
गांधी के 'सबाल्टर्न' दौरों से काफी भयभीत हैं। जी हाँ, मैं जानबूझ कर 'बेचैन'
शब्द का प्रयोग यहाँ नहीं कर रहा हूँ। क्योंकि मेरा अपना मानना है कि बेचैन तो
विजयदेव नारायण साही जैसे आलोचक उस समय हुए थे जब यूनिवर्सिटी यूनियन को
उन्होंने गाँधी जी की हत्या के बाद बाकायदा तेरह दिनों तक रोज़ शाम रामधुन बजा
कर शोक मनाते देखा था। वैसे खुद मैं इस बात से भयभीत हूँ कि हमारा मौजूदा
सेल्फी-प्रेमी प्रधानसेवक कोई नृप भयजीत नहीं है जो अपनी प्रजावत्सलता में यम
से भी टकरा जाये। और मुझे तो फासिस्ट परचम लहराते रामदास अठावले, उदितराज,
जीतन मांझी, रामविलास पासवान और मधु किश्वर इन दिनों सपनों में भी आ जा कर
अक्सर डरा देते हैं। खैर, हम यहाँ शंभुनाथ जी द्वारा उठाये गए उस प्रमुख सवाल
पर लौटते हैं कि क्या वाकई साहित्यक आत्मविसर्जन के प्रयासों के बीच बज़रिये
'आलोचना' सबाल्टर्नवाद और सेक्युलरवाद की कोई खिचड़ी पक रही है ?
दरअसल, इस बिंदु पर हिंदी के एक 'सबाल्टर्न' कथाकार गोपालराम 'गहमरी' के जासूस
पात्रों से अपना बुनियादी सबक लेते हुए, मतलब भ्रम के घटाटोप में फंसने से
बचने का प्रयास करते और सीधे शक के दायरे में आने वाले किरदारों (जैसे
देशी-विदेशी पूंजी, प्रेरणा के विलायती श्रोत, और अनुवादी भाषा, आदि) का ही
पीछा करने के बजाय, मैंने मामले की तह तक जाने का फैसला किया है। जाहिर है कि
ऐसी हिमाकत के लिए शुक्ल जी जैसे अभिजात साहित्यक कोटि निर्माताओं के फतवों की
अवहेलना का अभ्यास यहाँ मेरे लिए कम मददगार साबित नहीं हुआ। दरअसल, आलोचना के
५४ वे अंक की प्रस्तावना में आप वो सूत्र तलाश सकते हैं जिसके आधार पर शंभुनाथ
जी के उपरोक्त आक्षेप का निर्णय संभव है। इस सम्पादकीय में दिल्ली के
त्रिलोकपुरी में हुए हिंसात्मक दंगों के दौरान हस्तक्षेप के सवाल पर अलग -अलग
राजनैतिक पार्टियों की भूमिका का जिक्र है। और यह तथ्य उभर कर आता है कि उस
वक़्त काँग्रेस को छोड़ दें तो आप और वामपंथी दलों ने इस मामले में अहस्तक्षेप
की नीति ही अपनायी। मुझे लगता है कि आलोचना ने अगर यहाँ अप्रिय लगने वाला
कोई सत्य उजागर कर ही दिया है, तो कम से कम 'वैचारिक शिकार' जैसे कमजोर तर्क
की आड़ लेने या सबाल्टर्नवाद और सेक्युलरवाद की ' विरोधाभास -सी' खिचड़ी पकने
जैसी बोगस बातें कह कर हम महज़ थोड़ी देर के लिए ही खुद को भुलावे में रख
पाएंगे। क्योंकि सबाल्टर्नवाद के वैचारिक शिकार को फासीवाद का वास्तविक शिकार
बनते हुए देर तक देखना शायद उन गैर-काँग्रेसवादियों को भी बहुत रुचिकर न लगे
जो मार्क्सवाद और विकासशील राष्ट्रीय विचारधारा के विरोधी मूलतः नहीं हैं।
हालाँकि, शंभुनाथ जी यह भी मानते हैं कि आज अगर हिंदी के ज्ञानी संसार में
सबाल्टर्नवाद या अभिजात समाज वैज्ञानिकों के लेखन का 'अंधानुकरण' हो रहा है तो
इस आत्मविसर्जनकारी प्रवृत्ति के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार विदेशी पूंजी और
प्रेरणा से संचालित विकासशील समाज अध्ययन पीठ जैसा एक मुख्यालय है। और आशीष
नंदी जैसे सबाल्टर्नवादियों के नेतृत्व में यही संस्थान विदेशी पूंजी और धर्म
निरपेक्ष राष्ट्रीय केंद्रवाद को उसके लोकतान्त्रिक छद्मवेश की रक्षा के लिए
आवश्यक 'निर्मित' ज्ञान की आपूर्ति करता है। ताज्जुब की बात ये है कि जिस आशीष
नंदी की पहचान एज़ाज़ अहमद जैसे सुविख्यात सिद्धांतशास्त्री ने भी 'देशजवादी' कह
कर ही की है, उसी समाज मनोवैज्ञानिक को हमारा यह गंभीर आलोचक सबाल्टर्नवादी
साबित करने की भूल कर रहा है ! वैसे हैरत तो इस बात पर भी कम नहीं है कि हिंदी
ज्ञानी जगत को आत्मविसर्जन की हद तक बरगला पाने वाला सीएसडीएस का हेडक्वार्टर
इसी संस्थान से संबद्ध मोदीवादी मधु किश्वर, स्वराजवादी योगेन्द्र यादव,
उत्तर- मार्क्सवादी आदित्य निगम, और समाजवादी विजय बहादुर सिंह जैसों को
क्यों नहीं भ्रष्ट अभिजात्यवादी धर्म निरपेक्षता का पक्ष पोषण करने या
बहुराष्ट्रीय पूंजी के इशारे पर ज्ञानोत्पादन करने में संलग्न कर पा रहा है !
महत्वपूर्ण प्रश्न तब यहाँ यह भी उठता है कि क्या इस शीर्ष अध्ययन पीठ से जुड़ा
हर समाज विज्ञानी कुत्सित समाजशास्त्र का झंडाबरदार मतलब शंभुनाथ जी द्वारा
चिन्हित 'सबाल्टर्नवादी' है ?
जहाँ तक सीएसडीएस की धारा से जुड़े समाज वैज्ञानिकों द्वारा आत्मनिरीक्षण
करने, समाज विज्ञान के सामुदायिक न होने का दावा करने, बहुराष्टीय कंपनियों की
संस्कृति के अध्ययन, और अमीरों द्वारा संश्रय प्राप्त मौजूदा विकास के मॉडल की
आलोचना का सवाल है तो इस मुद्दे पर महेश जायसवाल जी को आदित्य निगम की लिखी एक
छोटी सी पुस्तिका 'डिज़ायर नेम्ड डेवलपमेंट' पर भी एक नज़र डाल लेनी चाहिए। एक
उत्तर -औद्योगिक समाज में जहाँ सामान्यतः हमारी सोच आर्थिक विकास, भौतिक
तृप्ति और अच्छे रहन -सहन से ज्यादा आगे सोचने में नाकाम है। वहां निगम यह
प्रस्ताव करते हैं कि, एक संभव वैकल्पिक विश्व निर्माण के लिए हमें ऐसे आणविक
व्यवहारों की एक पूरी श्रृंखला दरकार है, जो कोई महत विकल्प न होने के बावजूद,
हमारे सौंदर्यबोध में क्रांतिकारी बदलाव पैदा करने तक जाये। जिसके फलस्वरूप
आनंद और रूचियों का एक अलग किस्म का ख्याल संस्थागत हो। सरकारों और नीतियों
में भी उतना ही बदलाव हो जितना हमारे अपने उपभोग के व्यवहारों में। और जैसा कि
नंदीग्राम के असर ने दिखाया, एक वृहत्तर निदर्शनात्मक उलटफेर के लिए राजनैतिक
संघर्ष का क्षण महज़ उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि आणविक बदलावों के क्षण। हो
सकता है कि एक उत्तर -मार्क्सवादी की तरफ से आया यह प्रस्ताव बहुतों को उनकी
अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता के अनुकूल न जँचे। फिर भी मैं यकीन से कह सकता हूँ
कि निगम का उपरोक्त प्रस्ताव, एक सीमित अर्थ में ही सही, लेकिन खंड-खंड से आगे
कुछ सामान्य चुनौतियों को रेखांकित करने की हद तक जाता है ।
वैसे हम सभी के लिए यह जानना कम महत्वपूर्ण नहीं होगा कि अंतर-अनुशासनिक
अनुसंधानों को बढ़ावा देने के क्रम में विदेशी विश्वविद्यालयों ने कम से कम
नृतत्व शास्त्र की पद्धत्ति और शोध विषयों के मामले में एक हद तक सकारात्मक
विकास भी दर्ज किया है। जिसका एक सीधा परिणाम तो यह है कि विदेशी शिक्षा
संस्थानों में किया जा रहा भारत संबंधी नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन अब सिर्फ गायें
और मुर्गियां गिनने और विभाजन पैदा करने तक ही महदूद नहीं है। सच तो ये है कि
आदित्य निगम की उपरोक्त पुस्तिका से मेरा परिचय उस विदेशी युवा शोधार्थी ने
करवाया जो उड़ीसा के आदिवासी इलाको में अपने अध्ययन के सिलसिले से कुछ साल पहले
भारत आयी थी। वह शोधार्थी उड़ीसा के गांवों में रह कर एक आदिवासी समुदाय की
कानून सम्बन्धी प्रक्रियागत समझ कैसे बनती है जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न का जवाब
तलाशने की कोशिश कर रही थी। विशेष कर उन गांवों में जहाँ अनपढ़ ग्रामीण अपनी
सामुदायिक संपत्ति बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने के खिलाफ मोर्चा खोले हुए
थे। हालाँकि शोधवृत्ति न मिल पाने के चलते उस उत्साही शोधार्थी को जल्द ही
वापस अपने मुल्क लौट जाना पड़ा। और यहाँ से लौट कर भी उसने यूरोपीय घुम्मकड़
पशुपालकों की कानूनी ढांचे से टकराहट जैसे किसी संवेदनशील मसले पर काम करने के
अलावा, उड़ीसा के आंदोलनकारी आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों के पक्ष में, और
ला फॉज जैसे किसी बहुराष्ट्रीय निगम के विरोध में, जनमत बनाने की यूरोपीय पहल
में बेहद सक्रिय हिस्सेदारी की है। कहना नहीं होगा कि विलायती शिक्षण प्रणाली
के भी अपने खास अंतर्विरोध हैं। इसीलिए यह कतई असंभव नहीं कि एक नितांत
व्यक्तिवादी समाज से ताल्लुक रखने वाला शोधार्थी भी यूरोप या हिंदुस्तान के
किसी समुदाय विशेष का 'सबाल्टर्नवादी' अध्ययन करने के क्रम में सामूहिकता का
कोई बगावती सबक पढ़ जाये!
बचपन में कभी सुना था कि देवासुर संग्राम में जब असुर अपने विरोधी सुरों को
लगातार पराजित कर उनका नाश करते जा रहे थे तब सुरों ने उच्चतर शक्तियों के
सुझाव पर सागर मंथन के जरिये अमृत की प्राप्ति का फैसला किया। इस भारी- भरकम
उद्योग के लिए असुरों को भी तैयार किया गया। इसी सागर मंथन से लक्ष्मी निकलीं
और अमृत भी। लक्ष्मी ने तो विष्णु का वरण किया और अमृत को स्वयं मोहिनी रूप
धारी विष्णु ने सुरों के मध्य बाँटा। लेकिन कालकूट या ऐसा ही कोई विष जो इसी
सागर मंथन से निकला था जब उसके समाधान का प्रश्न उपस्थित हुआ तो सामने आए
देवाधिदेव महादेव जिन्होंने उस विष का न केवल पान किया बल्कि उसे अपने कंठ में
धारण कर नीलकंठ कहलाये। हाल-फ़िलहाल बंगाल जा कर पता चला कि पूरा किस्सा यहीं
ख़त्म नहीं हुआ था। क्योंकि विष का पान करने के साथ ही महादेव जी तो हो गए थे
बेकल और तब खुद उनकी रक्षा करने स्वयं महाविद्या तारा को मातृ रूप में भाग कर
आना पड़ा था। बहरहाल, तो क्या यह तय माना जाय कि हिंदी आलोचना ने भारतीय
जनतंत्र पर जो सबाल्टर्नवादी वैचारिक मंथन अपने पिछले अंकों में प्रारम्भ किया
मात्र उसी के परिणाम स्वरुप निकले हलाहल को कंठ में धारण करने से अब शंभुनाथ
जी जैसा समर्थ आलोचक बेकल हो रहा है ? जी नहीं।
दरहक़ीक़त इस मामले में एक बड़ा भीषण चक्र और है। शंभुनाथ जी के अतिशय भयाक्रांत
और उतना ही आक्रामक होने की मूल वजेह सबाल्टर्न इतिहासकार प्रथमा बनर्जी
द्वारा 'अर्ली- मॉडर्न' जैसी किसी श्रेणी की वह मानीखेज आलोचना है जो आधुनिक
को अंतहीन और कालातीत बनाने के खिलाफ है। तभी तो सबाल्टर्नवाद का बतंगड़ बना कर
शंभुनाथ जी वास्तव में कुल जमा इतना ही कहना चाहते हैं कि, 'आधुनिकता के
कारखाने में जब हिंदी पर विचार होता है तो आधुनिकता काट -छांट कर उन्नीसवीं
सदी में कैद की जाती है, पुराने औपनिवेशिक विचारों की छाया में निर्मित इस
ज्ञान में हिंदी का संबंध इसके बारह सौ साल लंबे इतिहास से पूरी तरह कट जाता
है।' शंभुनाथ जी की ही तरह मुझे भी इस बात का भय है कि बारह सौ साल पुराने एक
समृद्ध अतीत पर अपना दावा छोड़ कर हिंदी निश्चय ही विपन्न होगी। लेकिन यह आशा
भी कि बदलते दौर के सवालों के साथ हिंदी की आधुनिकता शायद कई नए इतिहास अभी और
लिखेगी। फिलवक्त तो मैं ईच्छा -ज्ञान -क्रिया शक्ति समन्विता कालातीत रूपिणी
महाविद्या से सिर्फ यह प्रार्थना ही कर सकता हूँ कि वह शंभुनाथ जी सहित हम
सब के तापों का विमोचन करें !
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