[दीवान]आतंकवादी हिंसा से मुकाबिल भोजपुरी मानस की पीड़ा

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Mon Nov 30 18:14:23 CST 2015


दोस्तों, अपनी सुरीली आवाज में, श्रवण साज ने, लंबे समय से आतंकवादी हिंसा का
सामना कर रहे भोजपुरी मानस के दर्द को यहाँ पूरी तरह से उघाड़ कर रख दिया है (
https://www.youtube.com/watch?v=vYtyG9Lz7C0)। वास्तव में, अपने इस खास गीत
के जरिये हमारे इस व्यवसायिक भोजपुरी कलाकार ने बहुत लंबे समय से उत्तर प्रदेश
और बिहार को व्यथित करने वाली जिस परेशानी को अभिव्यक्त करने का यहाँ प्रयास
किया है वह काबिल-ए-गौर है। अगर आप "हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान" जैसे किसी
सूत्र या प्रस्ताव में यकीन करते हैं तो हो सकता है कि इस गीत को सुनने के
बाद आपको उस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता महसूस हो। क्योंकि, 'जब से गईले
सैंय्या बम्बई नगरिया, दिलवा धक-धक करे' जैसे बोल मुंबई पर 26/11 के हमले से
उपजे भय की तरफ नहीं बल्कि *सरकार राज *के उस निर्बाध आतंक की तरफ इशारा करते
हैं जिसके साये में बम्बई धाम पहुँचे हर मेहनतकश हिंदी भाषी और उसके परिवार को
जीना पड़ता है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि उसी त्रासद आतंक से मुकाबिल
प्रवासी मानस की असल पीड़ा को सुनने-समझने वाला शायद यहाँ कोई नहीं ("केकरा से
कहीं मन के बतिया [?], दिलवा धक -धक करे!")।

हालाँकि, इस हिंसक आतंकवादी राजनीति के सरगनाओं पर ऊँगली उठाने वाले श्रवण साज
कोई पहले भोजपुरी गीतकार नहीं हैं। उनसे पहले भी कई व्यवसायिक कलाकारों ने
अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से उस खूनी राजनीति पर सवाल खड़े करने के प्रयास
किये हैं जिसके चलते बेगुनाह और मेहनतकश हिंदीभाषी प्रवासियों को महाराष्ट्र
में न सिर्फ हर दिन अपमान के घूँट पी कर जीना पड़ता है बल्कि उनके खून से होली
तक खेली जाती है। इस हिंसक राजनीति को अगर एक तरफ महाराष्ट्र पर कब्जे
और हिंदी भाषियों के प्रति उग्र मराठी प्रतिक्रिया के बतौर जायज ठहराने की
कोशिशें होती हैं। तो वहीं दूसरी तरफ रतन टाटा से लेकर संघ-भाजपा के नितिन
गडकरी जैसे अनेकों खाए-अघाये पूंजीपति और राजनेता इस बहुरंगी लेकिन निर्मम
हिंसा के प्रति पूर्णतः उदासीन नजर आते हैं। शायद इसलिए भी जब भोजपुर में इस
हिंसक राजनीति के चलते तीज - त्योहारों तक के रंग फीके मालूम पड़ते हैं तो किसी
को कुछ खास फर्क नहीं पड़ता -(https://www.youtube.com/watch?v=xkC5HCRXGwA)।

वैसे, भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर महाराष्ट्र में परवान चढ़ी इस
संगठित हिंसा की *राज नीति* से भोजपुरी भाषियों समेत यू पी और बिहार के
ज्यादातर निवासियों में गहरा क्षोभ है। भोजपुरी समाज, जो इस आतंकराज के खिलाफ
संभवतः सर्वाधिक मुखर है, में इसको ले कर कई ढंग की प्रतिक्रियाएं दिखती हैं।
इन्ही प्रतिक्रियाओं को स्वर देते हुए एक तरफ तो कुछ व्यवसायिक कलाकार समस्या
के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देते हुए शक्ति स्वरूपा देवी से राज ठाकरे और
उनके वैचारिक समर्थकों को सदबुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करते हुए नजर आते
हैं ( https://www.youtube.com/watch?v=iMFcH3SD99A )। तो वहीं दूसरी तरफ
अत्याचार के प्रतीक पुरुष राज ठाकरे को उन्हीं की भाषा में चेतावनी भी जारी
करने की कोशिश करते भोजपुरी कलाकार "आजादी" के विचार को प्रश्नांकित करते
भी जान पड़ते हैं ( https://www.youtube.com/watch?v=h7gEn7uNyDA )। दरहक़ीक़त,
"ठाकरे पर लगाम नइखे कौनों सरकार के, रोज मार खा ला लोगवा यू पी- बिहार के"
जैसे बोल हों, या "केंद्र सधलस चुप्पी अब इ राज नीति रचाता" जैसे शब्द,
ये संगठित आतंक से देश के नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने में सरकारों की
विफलता और राजनैतिक पार्टियों की अवसरवादी निष्क्रियता पर ही सवाल करते मालूम
होते हैं।

साथ ही भोजपुरी के इन व्यावसायिक कलाकारों को सुनते हुए आप ये साफ महसूस कर
सकते हैं कि किस तरह से वोटों की फसल काटने के लिए समाज में हिंसा के बीज पहले
ही बोए जा चुके हैं। फिर भी इस आतंकवादी राजनीति के पुरोधाओं को किसी पार्टी
का खुला तो किसी का मौन समर्थन हासिल है। इसलिए भी बाल ठाकरे जैसे
दुर्दांत आतंकवादी का स्मारक बनाये जाने का विरोध आज यहाँ कोई नहीं कर रहा है।
लेकिन मराठी अस्मिता के नाम पर जिस तरह से गरीब हिंदी भाषियों को बाहरी कह
कर निशाना बनाया जाता रहा है उससे बकौल श्रवण साज एक हिंदुस्तान और एक ही
धरती जैसे विचार की ईज्जत अब पूरी तरह से खतरे में है। तब कोई हैरत नहीं
कि आतंकवादी हिंसा से मुकाबिल भोजपुरी मानस की पीड़ा को स्वर देने वाली आवाजें
लंबे समय से महाराष्ट्र में सरकार राज के खातमे से ले कर हिंदुस्तान और धरती
माँ की मर्यादा बचाने की गुहार आम आवाम के बीच लगा रही हैं।

कहना तो नहीं चाहिए मगर हम सब इस बात को बखूबी जानते हैं कि राजनैतिक
जुमलेबाजी और नारे गढ़ने में हमारे प्रधानमंत्री महोदय का कोई सानी नहीं है।
मोदी जी इन दिनों पूरी पृथ्वी की भलाई के निमित्त आयोजित पर्यावरण सम्मलेन में
भागीदारी के लिए पेरिस पहुँच गए हैं। प्रदूषण और आतंकवाद से विश्व की रक्षा के
लिए भारत के संकल्प को उन्होंने ठीक ही दोहराया है। और अपनी तात्कालिक यात्रा
पर जाने से पहले उन्होंने 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत'  जैसे किसी घोषित अभियान के
लिए देशवासियों से सुझाव भी मांगे हैं। तब मैं बतौर एक भोजपुरी मोदी जी सहित
देश के तमाम खैर ख्वाहों से यही अर्ज करना चाहता हूँ कि अगर वास्तव में वो एक
बेहतर राष्ट्र बनाने की कोई ईच्छा रखते हैं तो सबसे पहले उन्हें केंद्र और
महाराष्ट्र की भाजपा सरकार से हिंदी भाषियों पर हिंसा के गुनाहगार राज ठाकरे
पर व्यवस्थित क़ानूनी कार्यवाही के लिए दबाव बनाना चाहिए। और, बाल ठाकरे जैसे
दहशतगर्द का स्मारक बनाने के ख्याल को उन्हें तुरंत रद्दी की टोकरी में डालने
की पहल करनी चाहिए। क्योंकि, "एक भारत, श्रेष्ठ भारत" जैसे किन्हीं नारों या
अभियानों से भोजपुर की पीड़ित जनता को ग़ाफ़िल रख अगर आप अब भी ठाकरे की आतंकवादी
राजनीति को सह देना जारी रखते हैं तो याद रखिये कि आप ' एक धरती-एक
हिंदुस्तान' के विचार को ध्वस्त होने से कतई नहीं बचा पायेंगे।
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