[दीवान]ये क्रांति नहीं भी है तो बाकी के लोग इतना भी तो करके दिखाएंः

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Oct 7 10:57:16 CDT 2015


<http://3.bp.blogspot.com/-cD7siLQnkwg/VhU_47_luCI/AAAAAAAARus/3nzhQbpTCBU/s1600/Screen%2BShot%2B2015-10-07%2Bat%2B9.22.34%2Bpm.png>

हिन्दी का लेखक हजार-पांच सौ, एकतरफ की हवाई टिकट और अध्धा-पौआ के लिए अपनी
इज्जत,साख और कीमत सरेआम लुटा देता है..ऐसे वाक्य सुनते-सुनते पिछले चौदह
सालों से कान पक गए. ले देकर उसकी एक ऐसी काईयां छवि कि वो पैसे,शराब और
सुविधा के लिए कुछ भी कर सकता है, किसी भी तरह के समझौते कर सकता है.

नतीजा ये हुआ कि कोई लेखक इससे ठीक उलट अपनी विचारधारा, थोड़े ही वक्त की सही
वैचारिक असहमति और लेखकीय कर्म को याद करते हुए पुरस्कार, पुरस्कार में मिली
राशि संस्था को वापस लौटाता है तो उनके इस फैसले के पीछे उनके भावनात्मक
पक्षों को समझने, उस मनःस्थिति को महसूस करने के बजाय इस शक से देखना शुरु कर
दिया जाता है कि जैसे वो इससे भी बड़े सम्मान, राशि और हवा बनाने के लिए ये सब
कर रहा है.

कीजिए शक, दमभर के शक कीजिए, अपनी शक्की निगाह से उसे छलनी कर डालिए लेकिन कभी
आप भी तो ये काम करके दिखाईए. अगर ये सब आत्मप्रवंचना है, खुद को महान साबित
करने की कोशिशें हैं तो फिर बना-बनाया नुस्खा आपके सामने है..आप क्यों नहीं
आजमा लेते ?
दरअसल साहित्य के नाम पर कालजयिता और स्थायित्व की इतनी घु्ट्टी और उसकी इतनी
अधिक मात्रा में खुराक पी ली है कि वर्तमान की सारी गतिविधियाों से स्थायी वैर
हो गया है. सब तात्कालिकता की डस्टबिन में चलता कर दिया जा रहा है..लेकिन
वर्तमान में ऐसे फैसले न लिए जाएं तो कल को आप किस वर्तमान को कोसने के लिए
बचे रह जाएंगें. वर्तमान की आलोचना करने के लिए भी वर्तमान को अपने विचारों
में, लेखन में और सोच के दायरे में शामिल करना होगा.

अशोक वाजपेयी की पुरस्कार लौटाने पर ये जो चिठ्ठी पढ़ी, उसकी एक वाक्य शायद
हमेशा याद रह जाए- मुझे याद नहीं कि पुरस्कार राशि कितनी मिली थी लेकिन इसके
साथ एक लाख रुपये की चेक संलग्न है. संभव है कि अशोक वाजपेयी को उस वक्त रकम
की ऐसी जरूरत नहीं रही हो कि याद भी न रहे. हम जैसे को तो किस टेलर ने पाजामी
ऑल्टर करने के दस रूपये ज्यादा ले लिए, वो भी याद रह जाते हैं..खैर

इस एक पंक्ति का भाव नाभादास के संतन कहां सिकरी सो काम की छाया लिए हुए है कि
पुरस्कार मिला, रकम कौन याद रखता है...सम्मान करना चाहिए ऐसे फैसले का, हिम्मत
बंधती है, यकीन बढ़ता है- इस तोड़-जोड़ के बीच भी सब खत्म नहीं हुआ है.
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20151007/73e399b8/attachment-0001.html>


More information about the Deewan mailing list