[दीवान]बदरंग होते जनतंत्र के बीच: ‪#‎दरबदरदिल्ली‬

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Fri Oct 23 10:44:06 CDT 2015


इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली की अभिजात्य दुनिया के बीच के आंगन में इन
दिनों मीनाक्षी-सुशील की एक अपनी ही दुनिया गुलजार है..दो कल-आशिक,घूमंतूू
जुनूनी की दुनिया जिससे गुजरते हुए आप अपने जिंदगी के हर मोर्चे पर खो गए
रंगों को फिर से खोज ले रहे होते हैं. इस आंगन में रंग अचानक से आपको धप्पा
देते नजर आते हैं और जब तक आप चौंकते हैं, ये रंग ठहाके लगाते हैं- पहचाना,
भागलपुर, अरे पूर्णिया भूल गए ?

शुक्रवार की शाम जब रवीश के साथ हम मीनाक्षी-सुशील की इस दुनिया में शामिल हुए
तो लगा इंडिया हैबिटैट का ये आंगन जो आमतौर पर कॉर्पोरेट इवेंट या इलीट
एग्जीविशन से इंगेज रहा करता है, इन दिनों यहां रंगों का जनतंत्र पसरा है.
दिल्ली के इस जोड़े ने बहुत जतन से इसे अपने काम का एक दिलचस्प रूप दिया है
जिसे मोटे तौर पर हमने तीन हिस्से में बांटकर देखने-समझने की कोशिश की.

अव्वल तो चारों तरफ स्टैंड पर जो तस्वीरें टंगी हैं वो मीनाक्षी-सुशील की
देशभर की यात्रा की कहानियां बयां करती हैं..जिनके साथ उन्होंने पेंटिंग करने
के दौरान वक्त बिताए..इनमे वो लोकेशन, मोमेंट्स और शख्स शामिल हैं..तस्वीरों
के जरिए आप बस कन्डक्टरी करते हुए एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू हो पाते हैं.

<http://1.bp.blogspot.com/-w7PkIKrGVnU/VipVmRDkLRI/AAAAAAAARxQ/mG9YShnnQxE/s1600/Screen%2BShot%2B2015-10-23%2Bat%2B9.13.56%2Bpm.png>

दूसरे हिस्से में वो तमाम चीजें कांच के भीतर तमीज से पैक करके, उन चीजों के
संदर्भ की स्टिगर चिपकाकर लगाए गए हैं जिन्हें इनदोनों को लोगों ने यात्रा के
दौरान भेंट किए..तीस साल की वो बांसुरी जिसे कि पहले कभी किसी ने बजाकर नहीं
देखा और इन्होंने बजायी..वो संथाली गुलेल जिसकी अपनी ही कहानी है. सत्तर के
दशक का वो यासिका का कैमरा जिसे कि गिरि के बाबूजी ने बड़े प्यार से इनदोनों
को दिया..वो पुलिस अधिकारी की कैप जो किसी भी अधिकारी को अपने नैतिक दायित्व
की याद दिला जाता है.

और तीसरी सबसे जबरदस्त और दिलचस्प चीज, जमीन पर मां की साड़ी से भी ज्यादा
लंबे-लंबे चार्ट पेपर और चारों तरफ रंग के डब्बे..आपको चार्ट पेपर पर जहां
कहीं भी थोड़ी सी खाली जगह दिखे, शुरू हो जाइए..मीनाक्षी ने हमें बताया कि कई
तो रेगुलर विजिटर हैं और अगले दिन आकर देखते हैं कि चार्ट पर बनायी उनकी
पेंटिंग पर किसी ने कुछ कर तो नहीं दिया और उस पर कोई कुछ और रंगकर चला जाता
है तो नाराज तक हो जाते हैं. लंचटाइम तो मेला सा लग जाता है पेंटिग बनाने के
लिए.

इन सबके बीच जर्सी गाय जैसी चुपचाप खड़ी हरी-भरी जो मीनाक्षी-सुशील की संतान
जैसी है..इस हरी-भरी पर ही कितना कुछ अलग से लिखा जा सकता है.

इंडिया हैबिटैट सेंटर, नई दिल्ली के आंगन में इस पसरी दुनिया से जब आप
गुजरेंगे तो आपके मन में पहला सवाल आएगा- काम करनेवाले को लोग कितना प्यार
करते हैं..सोचिए न किसी ने अपने घर की तीस साल की बांसुरी दे दी, किसी ने
ऐतिहासिक गुलेल और गिरि के बाबूजी ने कैमरा..देते वक्त कितने भावनात्मक हो
जाते हों लेने और देनेवाले लोग..मीनाक्षी अपनी जिस जबरदस्त टैंजी हिंग्लिश में
इन सबके बारे में बताती जाती हैं, वो सारे बिम्ब उभरने लगते हैं. ठहरकर लौटने
से पहले एक नजर फिर मार लें तो लगेगा रंगों, यादों और लोगों से मिलने की इस
जिद के आगे न्यूरोलैक पेंट्स के विज्ञापनों में धंसे सिलेब्रेटी और उनकी बोली
गई कॉपी कितनी नकली लगती हैं..रंग तो बिखर जाते हैं, चित्र नहीं उभरते.
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