[दीवान]भैया हो, ई कैमरा बाबूजी का है.

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Fri Oct 23 10:46:15 CDT 2015


<http://1.bp.blogspot.com/-TGU7KFYVtxg/VipWBkXo0WI/AAAAAAAARxY/vhLs4SVxEhg/s1600/Screen%2BShot%2B2015-10-23%2Bat%2B9.15.54%2Bpm.png>

भैया हो, इ जो आप रवीश का फोटू लगाए हैं न कैमरा देखते हुए..उ कैमरा बाबूजी का
है..फोटू देखकर हम फिर से भावुक हो गए.

सत्तर के दशक के इस कैमरे से जानते हैं भैया, बाबूजी हजारों फोटू खींचे
होंगे..सुशील भईया और मीनाक्षीजी आईं थी न पूर्णिया तो दिए थे उनको. बाबूजी
बहुत याद आते हों हो भईया.

किसी की दी हुई चीज कहां पहुंचकर क्या संदर्भ पैदा करती है और हम उसमे कैसे
डूबते-उतरते हैं?
गिरि( Girindranath Jha <https://www.facebook.com/girindranath.jha>) के
बाबूजी ने भला कहां सोचा होगा कि जिस कैमरे से उन्होंने हजारों तस्वीरें
उतारीं, उस कैमरे में उतरकर एक दिन हम उन्हें देखने लगेंगे..इस तरह से
गिरीन्द्र तस्वीर देखकर भीतर से भींग जाएगा और मीनाक्षी-सुशील नायाब वस्तु की
तरह फ्रेम के भीतर मढ़वाकर हमारे लिए उपलब्ध कराएंगे..प्यासा से लेकर पीके,
कितना कुछ याद आने लग जाता है..एक समय के बाद वस्तुएं, व्यक्ति के प्रतिनिधि
बनकर हमारे बीच मौजूद रहती हैं, लंबे समय तक के लिए..
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