[दीवान]तो इस तरह जनतंत्र की जड़े कमजोर कर रहे हैं न्यूज चैनल्स

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Oct 27 12:42:34 CDT 2015


न्यूज चैनल जब चुनावी रैलियों के भाषण को पूरा-पूरा लाइव काटने लगे, बिना किसी
एड ब्रेक के प्रसारित करने लगे तो इसमे चुनाव आयोग की संहिता का कोई काम रह
जाता है ? चुनाव आयोग ये निर्देश जारी करके भी क्या कर लेगा कि जहां कल मतदान
होने जा रहा है वहां किसी भी तरह का प्रचार कार्य नहीं होगा ? आयोग क्षेत्र का
चाहे जिस तरह से विभाजन करके निर्देश जारी कर ले, टीवी उस विभाजन को मिटाकर
सबको राष्ट्रीय कर देगा.. लेकिन

इधर चैनल सरेआम संहिता की धज्जियां उड़ा रहे हैं और आप हैं कि अभी तक इसके लिए
लोकतंत्र का चौथा खंभा की रट लगाए जा रहे हैं. पिछले दस सालों में इन न्यूज
चैनलों ने जनतंत्र की जड़ों को जितना खोखला,कमजोर और लाचार किया है, किसी
दूसरे संस्थान ने नहीं.


भारतीय टेलीविजन का जो डिटिजल फॉर्म में होना है, वो अभी तीसरे फेज में आकर
अटका हुआ है. तीसरा फेज मतलब मंझोले शहर तक आकर..अभी छोटे शहर, कस्बे और गांव
में होना बाकी है.

भारत में टेलीविजन को डिजिटल करने के पीछे सरकार का ये तर्क रहा है कि इससे
प्रसारण में गुणवत्ता तो आएगी ही लेकिन इससे भी बड़ा फायदा होगा कि टीवी
कंटेंट दर्शक तय कर सकेंगे. डिटिजल होने से चैनलों तक सीधे आंकड़े पहुंचेंगे
कि किस तरह के कार्यक्रम लोग पसंद करते हैं?..और एक स्थिति ऐसी आएगी कि अभी
जिन कार्यक्रमों, खबरों आदि को लेकर दर्शक शिकायत करते हैं, वो गायब हो जाएंगे.

इधर चैनलों को इसका लाभ होगा कि अभी तक प्रायोजकों और विज्ञापनदाताओं पर उनकी
जो निर्भता है वो कम होगी और ग्राहकों की सब्सक्रिप्शन से कमाई बढ़ेगी. वो भी
विज्ञापनदाताओं के दवाब में रहकर काम नहीं करेंगे..लेकिन

आपको लगता है कि ऐसा हो पाएगा ? हम रोज देखना चाहते हैं प्राइम टाइम में
दिल्ली में बैठकर एक ही शख्स की रैली की छिछलेदार भाषण..इसे भाषण कहना इस
खूबसूरत विधा का अपना करना होगा ?..और बिहार के जिस चुनावी क्षेत्र के लोग
देखना भी चाहते हैं तो क्या वो चुनाव आयोग की आचार संहिता के अनुकूल है ? असल
में हमारे आगे विकास और बदलाव की पूरी प्रक्रिया को काटकर जुमले,नारे,विज्ञापन
की शक्ल में जो चीजें पेश की जाती हैं, ये सारे झोल बहस का हिस्सा बनने ही
नहीं पाती.
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