[दीवान]नौजवानों के सपनों से खिलवाड़ अगर आपका शग़ल है तो.…
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Tue Oct 27 17:29:40 CDT 2015
इस बार अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में प्रधानमंत्री महोदय ने एक
और नयी लेकिन ग़ौरतलब घोषणा की है। यह कि एक जनवरी 2016 से केंद्र सरकार के
ग्रुप डी, ग्रुप सी, और ग्रुप बी के गैर राजपत्रित पदों पर नियुक्ति के लिए अब
अभ्यर्थियों का साक्षात्कार नहीं होगा। अपने परिचित अंदाज में मोदी ने इस बात
की घोषणा करते हुए कहा कि, 'मैं आज गर्व से कहना चाहता हूँ कि सरकार ने सारी
प्रक्रियाएं पूर्ण कर ली हैं और केंद्र सरकार के ग्रुप डी, ग्रुप सी, और ग्रुप
बी के गैर राजपत्रित पदों में अब भर्ती के लिए साक्षात्कार नहीं होगा। एक
जनवरी 2016 से यह लागू हो जाएगा। सभी युवा मित्रों को मेरी शुभकामना है।'
रेडियो संवाद पर इस घोषणा के प्रसारण के साथ ही विपक्षी पार्टियों ने मोदी पर
आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप जड़ते हुए इसके लिए उन्हें घेरने की कवायद तेज
कर दी।जद (एकी ) और कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने बिहार विधान सभा चुनावों का
हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव के मध्य यह घोषणा कर के
आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया है। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग
पर भाजपा और प्रधानमंत्री के प्रति नरम रुख अपनाने जैसे आरोप भी लगाये हैं।
हालाँकि चुनाव आयोग ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि जिस दौरान चुनाव
प्रक्रिया चल रही हो सरकार कोई भी नयी योजना घोषित न करे। फिर भी उक्त घोषणा
चुनाव आचार संहिता उल्लंघन का एक स्पष्ट मामला होने के बावजूद बहस या
कार्यवाही के लिए कोई मुद्दा नहीं है। ऐसा कैसे संभव है ?
अपने संपादकीय टिप्पणी में हिंदी के एक सचेत संपादक ने इस घोषणा को 'बेहतरी की
बात' कहते हुए लिखा कि -- "छोटे पदों की नौकरियों में साक्षात्कार का प्रावधान
अभ्यर्थियों से पैसा ऐंठने का जरिया बनता गया है। नौकरियों में साक्षात्कार की
व्यवस्था इसलिए की गयी थी कि इसके जरिये अभ्यर्थी के नीतिगत फैसले करने की
क्षमता का आंकलन किया जा सकता है। मगर दफ्तरी, कार्यालय सहायक, सफाईकर्मी,
वाहन चालक आदि जैसे छोटे पदों पर कार्य करने वाले लोगों की नीतिगत फैसलों में
हिस्सेदारी नहीं होती, इसलिए उनकी दक्षता आंकने के लिए साक्षात्कार का कोई
मतलब नहीं हो सकता। मगर पढ़े-लिखे युवाओं की तादात बढ़ने और रोजगार के अवसर कम
होते जाने की वजह से छोटे पदों पर भी जिस तरह से अभ्यर्थियों की भीड़ जमा होने
लगी है, उसे देखते हुए छंटाई के मकसद से साक्षात्कार की व्यवस्था शुरू की गयी।
पर यह व्यवस्था भी इसलिए कारगर साबित नहीं हो पाती, क्योंकि छोटे पदों पर जिस
तरह की योग्यता दरकार होती है, उसके पैमाने पर बहुत सारे युवा खरे उतरते हैं।
ऐसे में साक्षात्कारकर्ता ऐसे अभ्यर्थियों के पक्ष में अपनी सकारात्मक राय
बनाते हैं, जो उन्हें सिफारिश या पैसे के बल पर प्रभावित करने में सफल होते
हैं। इसलिए यह व्यवस्था न तो कारगर रह गयी है और न पारदर्शी। इसे बदलना उचित
कदम है। "
अब जरा ठहर कर इस बिंदु पर सोचिये कि जनमत बनाने वाले एक सर्वाधिक गंभीर
संपादक को भी अगर इस पूरी घोषणा में कहीं कुछ भी अनुचित नहीं जान पड़ता तो फिर
किस नामुराद में इतना दम है कि वो आदर्श चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के इस
स्पष्ट मामले पर सवाल खड़ा करे? आप इसे मेरा दुराग्रह भी समझ सकते हैं लेकिन
मुझे ऐसा लगता है कि इन दिनों मीडिया सिर्फ और सिर्फ वही कह रहा है जो सत्ता
के कानों को मधुर जान पड़े। मीडिया संचालन में संलग्न ज्यादातर धुरंधर सत्ता की
धुन पर थिरकने से आगे और कुछ नहीं सोच पा रहे हैं। यह गंभीर संकट का दौर है !
वैसे असमय घोषणा के बावजूद ग्रुप डी, ग्रुप सी, और ग्रुप बी की भर्तियों में
साक्षात्कार की व्यवस्था, जो न तो कारगर थी और न ही पारदर्शी, के ख़त्म होने
से युवा अभ्यर्थियों को निश्चय ही थोड़ी राहत मिलेगी। संभव है इस 'स्वागतयोग्य'
कदम से मोदी जी को, विशेषकर बिहार में, जहाँ बड़े पैमाने पर युवा प्रतियोगी
परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, कुछ समर्थन भी हासिल हो जाये। लेकिन मिस्टर
मोदी प्रक्रियागत सुधारों की आड़ ले कर आप नौजवानों के साथ अपना छल कब तक जारी
रख पाएंगे ? देश का युवा अब आप से यह भी जानना चाहेगा कि वो लाखों नौकरियां
कहाँ हैं जिनका वादा आप ने हम से बार बार किया है ? और अगर कहीं लाखों
बेरोजगारों के सपनों से खिलवाड़ आपका नया शग़ल बन गया है तो याद रखिये मिस्टर
मोदी कि बिहार आप चाहे भले ही जीत लें लेकिन अपनी सत्ता को दरकने से नहीं बचा
पायेंगे।
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