[दीवान]'अंधों में काना' और दर्जे में 'दोयम' यानी हिंदी प्रस्तोता रवीश कुमार होना।

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Wed Feb 10 07:46:52 CST 2016


पहले पॉडकास्ट के लिए रवीश कुमार, उनके तमाम प्रशंसकों, मित्रों और प्रमोटरों
को लख-लख बधाईयाँ !! हमें उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा भरोसा है कि एनडीटीवी के
सर्वप्रमुख हिंदी प्रस्तोता और एक सफल एंकर के बतौर अब तक रवीश कुमार को जो
प्रसिद्धि और तारीफ़ हासिल होती आयी है विलायत दौरे से शुरू
किया उनका यह पॉडकास्ट उसमें और भी इज़ाफ़ा करेगा!
वैसे रवीश जी, पता नहीं आपको यह ख़बर है भी या नहीं, लेकिन अभी दो रोज़ पहले ही
'दीवान' पर डाले एक पोस्ट में मैंने आप को 'अंधों में काना' और दर्जे के लिहाज
से 'दोयम' कहने जैसी कुछ हिमाकत की है। और, इस से पहले की आप उदारता जाहिर
करने की हड़बड़ी में, अपनी बेहद प्यारी और चिरपरिचित हँसी के साथ, क्षमा- दान की
मुद्रा में आने लग जायें, यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि उस पोस्ट में जो कुछ भी
राय मैंने आपके संबंध में जाहिर की है, मैं उस पर अब भी सौ फीसदी क़ायम हूँ।
क्योंकि मेरी अपनी सीमित  समझ में, चैनल पर आप के तमाम दूसरे कार्यक्रमों की
ही तरह आपका यह पहला पॉडकास्ट भी, एक मीडियाकर्मी के रूप में, आपके भयानक रूप
से सतही और निपढ होने की गवाही देता है।
आप की आलोचना में आगे कुछ और कहने से पहले एक बात और साफ करता चलूँ। वह ये कि
मैं आपके दूसरे कई हॉफ- पैन्टिया आलोचकों में से एक नहीं हूँ। और मैं आप की
आलोचना यहाँ बतौर इतिहास और समाज के एक विद्यार्थी की हैसियत से कर रहा हूँ।
मतलब, जानने- पढ़ने में रूचि रखने वाले एक ऐसे विद्यार्थी की हैसियत से जो बहस
और सवालों के स्तर को अगर ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा ऊपर जाता हुआ जरूर देखना
चाहता है।हो सकता है कि आपके कई अंध-प्रशंसक मेरे इस हस्तक्षेप से निजि तौर पर
आहत महसूस करें, और मुझे आदर्शवादी या सिरफिरा होने जैसे विशेषणों से नवाजने
में ज़रा भी वक्त न लगाएं। लेकिन मुझे उनकी रत्ती भर चिंता नहीं है। हिंदी
साहित्यकार काशी नाथ सिंह द्वारा मशहूर किए गए एक जुमले में कहूँ तो ज़माने के
साथ कदमताल कर रहे वैसे लोगों को हम अपने सामान पर रख कर चलते हैं। बहरहाल,
इधर-उधर की बातें तो होती रहेंगी। आईये मुद्दे की कुछ बात कर ली जाय।
तो रवीश जी, सबसे पहली बात तो ये है कि मैंने आपके एक प्रमोटर द्वारा सर्कुलेट
किये जाने के बाद वाशिंग्टन से प्रसारित आप का पहला पॉडकास्ट सुना। अब ये तो
आप समझ ही गए हैं कि पॉडकास्ट में कही गयी आपकी बातों से मैं कुछ ज्यादा
प्रभावित नहीं हूँ। हाँ, ऐसा क्यों है, मैं अब इसी पर संक्षेप में दो -चार
बातें कहते हुए अपनी वाणी को विराम दूंगा। ध्यान रहे, आपके पॉडकास्ट कंटेंट से
जुड़े इन सवालात को उठाने का मेरा एकमात्र मकसद आपको 'अंधों में काना' और दर्जे
में 'दोयम' साबित करना है!
खैर, ये स्वतंत्रता तो आपने ले ही ली है कि पहली बार वाशिंग्टन डी सी पहुँचने
के महज़ कुछ घंटों बाद ही, बिना उस शहर या व्यवस्था को करीब से देखे और समझे,
सिर्फ दो बड़े लोकतंत्रों की राजधानी होने जैसी किसी अवधारणात्मक साम्यता को
आधार बना कर, आप लुटियन दिल्ली और डी सी के स्थापत्य पर एक फ़ौरी प्रतिक्रिया
देते हुए, लोकतान्त्रिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं की तुलना किया चाहते हैं।
और जिसे आप स्वयं 'आदतन' की जा रही तुलना बताते हैं! रवीश जी, मुझे तुलना करने
जैसी 'आदत' से वहां तक कोई शिकायत नहीं है जहाँ ऐसी तुलना के जरिये किसी गंभीर
प्रश्न का जवाब तलाशने के लिए कोई ईमानदार कोशिश हो रही हो। लेकिन प्रसारण के
अंत में आप अपने ही श्रीमुख से ये भी स्वीकार करते सुनायी पड़ते हैं कि, दिल्ली
और डी सी की आपने एक "सरसरी तौर पर तुलना की है", और फिर इसमें पूर्वाग्रहों
या जानकारियों की कमी की संभावना से भी आप इंकार नहीं करते! बिना किसी लाग
लपेट के कहूँ तो मुझे एक ऐसे गंभीर श्रोता और शोधार्थी के बतौर - जिसे न तो
वाशिंग्टन जाने का अब तक कोई अवसर हासिल हुआ, न भविष्य में इसकी उम्मीद
हैं-  आप की यह "सरसरी" तुलना बुरी तरह निराश करती है। कहना नहीं होगा कि आप
जैसे सेलिब्रेटेड 'आइकॉन' के स्तर पर, सूचनाओं का आभाव होना और पूर्वाग्रही
नजर से चीजों को देखने की छूट माँगना उस से भी ज्यादा पीड़ा पहुँचाते हैं।
लेकिन ख़ुशी इस बात की भी है कि आप ने अपनी 'आदत' के मुताबिक एक सरसरी,
जरुरी सूचनाओं से खाली और पूर्वाग्रहों से संचालित तुलना पेश कर, यहाँ मेरे
पक्ष को, दलीलों से पेशतर ही, मजबूत करने का काम किया है।
मगर जब बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी। तो रवीश जी, आपके इसी ऐतिहासिक
प्रसारण में साफ़ नजर आ रही आपकी कुछेक बुनियादी कमियों से शुरू करने की इजाजत
चाहूंगा ! अपने पॉडकास्ट प्रसारण के दौरान, दो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं
की राजधानियों के स्थापत्य और उसके इतिहास की तुलना के क्रम में, आप 'लोक' और
'लोग' में फर्क किये जाने जैसी एक दिलचस्प प्रस्थापना को सूत्रबद्ध करने तक
जाते हैं। जिसे सुन कर कुछ ऐसा लगा मानो वाशिंग्टन में लोग तो हैं लेकिन लोक
नदारद है, जबकि दिल्ली की बेतरतीबी में अब भी 'लोक' को खोज निकालने की गुंजाईश
बची रह जाती है। साथ ही, इस चमत्कारिक प्रस्थापना को सूत्रबद्ध करने से पहले,
आप जो एक बड़ा दिलफ़रेब सवाल उठाते हैं वो ये कि-- एक आधुनिक व्यवस्था में संसद
जैसी लोकतान्त्रिक संस्थाओं को भी निरूपित करने के लिए बनाये गए निर्माण में
आखिर क्यों राजशाही की निरंतरता तलाश की जा सकती है ? भाई सबसे पहले तो
ये बताएं कि "*राजशाही*" से आप की मुराद क्या है ? जहाँ तक आधुनिक दिल्ली
और भारतीय इतिहास का सवाल है, हम तो अब तक यही जानते और मानते आये हैं कि यहाँ
एक *साम्राज्यवादी *हुकूमत थी, जिसने 1911 में दिल्ली को राजधानी बनाने का
फैसला किया। फिर लुटियन दिल्ली के स्थापत्य को राजशाही कह कर आप श्रोताओं का
ज्ञानवर्धन करना चाहते हैं या उनकी मौजूदा समझ को भी लुंठित करने पर आमादा हैं
? अच्छा-अच्छा, माफ़ी चाहूँगा ! आप तो "अंदाज से" ये सब कह रहे हैं! तो हुजूर,
कुछ होम वर्क करने के बाद डी सी जाना था, अंदाज से बात कर के तो आप मेरी निगाह
में खुद को दो आँखों वाला साबित नहीं कर पाएंगे। खैर चलिए, अंग्रेज बहादुर जो
बना गए उसी लुटियन जोन को आप राजशाही/राजसी कुछ भी कहिये, एक उत्तर-औपनिवेशिक
समाज के सबसे बड़े हिंदी भाषी मीडियाकर्मी के बतौर जनता जनार्दन के दरबार
में आप की सौ खतायें माफ़ !!
लेकिन हुजूर पहले पॉडकास्ट की ऐसी भी क्या बेताबी थी कि लुटियन का
नामोल्लेख तो आप ने किया लेकिन वाशिंग्टन डी सी के स्थापत्यकार
पिएरे चार्ल्स ले इन्फैंट का जिक्र तक करने से चूक गए। अरे भाई क्या वही
फ्रेंच स्थापत्यकार नहीं था जिसे वाशिंग्टन साहब ने बड़े लंबे चौड़े इलाके पर
अपनी मर्जी के हिसाब से नए शहर को रूपाकार देने का काम सौंपा था? फिर जो
'राजशाही' या राजसी स्थापत्य की झलक आप अभी वहां देख रहे हैं, उसकी एक वजह तो
आप बड़ी आसानी से पिएरे की लूव्र के रॉयल एकेडेमी में हुयी ट्रेनिंग में भी
तलाश सकते थे। खैर इतनी जहमत भी आप भला क्यों उठाएंगे? जब पहले से ही
आपने नवोदित मीडिया आलोचकों की सबसे लाऊड और भौंडी आवाज ( याने विनीत
कुमार) को, खुद को मीडिया सुपरस्टार मनवाने के काम में 24 x 7 पेल रखा हो।
अब देखिये रवीश जी, कहने के लिए तो तमाम बाते हैं, और मुझ नाचीज़ को बात करने
का हुनर न आता हो ऐसा भी नहीं है। लेकिन इतना तो आप भी मानेंगे कि इस तरह के
पोस्ट की अपनी सीमायें हैं। कितनी ही बातें मसलन दिल्ली और डी सी में आपको नजर
आने वाली "किले जैसी भव्यता" का ऐतिहासिक और तथ्यसम्मत सन्दर्भ हो, या कि
लोकतान्त्रिक समाज -व्यवस्था के रूप में भारत का प्रतीक- निर्माण के क्षेत्र
में किया गया ऐतिहासिक अवदान, इन पर तो विस्तार से बात करने के लिए मुझे
भारी-भरकम शोध -पत्र लिखना पड़ जायेगा। और नरेंद्र मोदी के जुल्मी राज में
भूखे-पेट सोने को मजबूर ये बेरोजगार नौजवान फ़िलहाल उतनी ऊर्जा खपाने की स्थिति
में तो नहीं है।
इसके बावजूद अपने पॉडकास्ट के जरिये जो दिलफ़रेब प्रस्ताव और लोक -लोग संबंधी
'पाठ' आप प्रस्तुत किया चाहते हैं उस पर कुछ टिप्पणी न करना आपके इतने बड़े
प्रयास के साथ घोर अन्याय ही होगा। मैं समझता हूँ कि वाशिंग्टन में नजर आ
रही अमेरिकी समाज की एकरूपता से आप खासे परेशान हैं, और इस सिलसिले में भारतीय
सत्ता- केंद्र दिल्ली की परिधि और लुटियन जोन में भी यदा-कदा फैली बेतरतीबी
तब आप को 'लोग' के बजाय 'लोक' के बचे रहने की एक बुनियादी शर्त मालूम हो
रही है।पहली नजर में तो मुझे आप का ऐसा सोचना 'होम-सिकनेस' से प्रेरित ज्यादा
लगा। लेकिन फिर मैंने इस पर थोड़ा और गौर किया। क्योंकि ऐसे वाहियात ख्याल मैं
पहले भी हिंदुस्तान का भ्रमण करने आने वाले कुछ पर्यटकों और पूंजीवादी सुधारों
की हिमायत करने वाले तथाकथित बौद्धिकों के मुँह से सुनता आया हूँ। बहरहाल,
'व्यवस्था और नीतियों से बेदखल आदमी अवसर हासिल कर सके' यह तो आपका बड़ा उदार
ख्याल है, दिक्कत बस इतनी है कि गरीब-गुरबे के लुटियन जोन में अंडे की रेड़ी
लगाने भर से 'लोक' नहीं बचने वाला है।फिर जिसे अमेरिकी समाज के सन्दर्भ में आप
'लोग' और महज 'तंत्र की इकाई' कह के ख़ारिज किये दे रहे हैं, क्या वहां मामला
इतना सीधा-सपाट है। आर्थिक हैसियत, रंग, लिंग, आयु, क्षेत्र और सेक्सुअलिटी का
तंत्र की इकाई में क्या पूरी तरह विलोपन संभव है ? अगर नहीं, तो फिर अपने
प्रस्ताव और सूत्रीकरण पर दोबारा विचार करें, क्योंकि लुटियन जोन से निकल कर
आप तो वाशिंग्टन डी सी में तफ़रीह करें, और हम यहाँ व्यवस्था और नीतियों का
शिकार बन रहे नागरिक के हक़ की निर्णायक लड़ाई लड़ने के बजाय लुटियन जोन में
फैली बेतरतीबी को सेलिब्रेट करें उस से कुछ खास होने जाने वाला नहीं है।
वैसे आप जैसे नामचीन मीडियाकर्मी और उनके प्रमोटरों के सामने हम जैसे
निकम्मों की बिसात ही क्या है? हम तो आप के इस अद्भुद 'पाठ' और फलसफ़े पर बस
अपना सर ही धुन सकते है। या ज्यादा से ज्यादा इस कटु सत्य को तमाशबीनों के बीच
उजागर कर दे सकते हैं कि आखिर क्यों 'अंधों में काना' और दर्जे में 'दोयम'
होना दरअसल हिंदी प्रस्तोता रवीश कुमार होना है।बेहद नाउम्मीदी के साथ
आपका
कमल मिश्र
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