[दीवान] Fwd: on JNU
Ravikant
ravikant at sarai.net
Wed Feb 17 03:35:51 CST 2016
---------- Forwarded message ----------
From: ashish k Singh <filmashish at gmail.com>
Date: 2016-02-17 12:52 GMT+05:30
Subject: on JNU
To: Ravi Kant <ravikant at sarai.net>
हिंदी के वरिष्ठ कवि देवी प्रसाद मिश्र की कल ही लिखी इस कविता को शेयर कर रहा
हूं...क्योंकि वो आमतौर पर कहीं छपने-छपवाने की ज़हमत नहीं उठाते। गहरे
कालबोध/कालचिंतन वाली इस कविता में खुसरो हैं, बाबा नागार्जुन हैं और रघुवीर
सहाय भी...
ढूँढ़ो अब इस रेत में
जो भी सोचेगा अलग, हम लेंगे संज्ञान
जेएनयू का तोड़ दो, मेधामय अभिमान
रात हुई इस राष्ट्र की, जैसे किया मसान
आसपास हैं घूमते, नव नाज़ी बलवान
अधिनायक की आँख में, हत्या का वीरान
इस विदर्भ में झूलते, लुटते हुए किसान
हर कोने से गूँजता, फासिस्टी जयगान
उस कोने बजरंग है, पतंग लिये सलमान
इस ताक़त के सामने, काँप गया ईमान
दावत में दिखते रहे, पीके नर्वस खान
किस हक़ से हो जाँचते, बार बार ईमान
हर भाषा में पूछते, कितने पाकिस्तान
साँस भरी पानी पिया, खुसरो लुटा मकान
ढूँढ़ रहे इस रेत में, अपना नखलिस्तान
(देवी प्रसाद मिश्र)
(देवी जी को कुछ साल पहले उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म फीमेल न्यूड के लिए
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होने हाल ही में बढ़ती असहिष्णुता
के मुद्दे पर वापस कर दिया था। इसी साल उनकी एक और शॉर्ट फिल्म 'सतत-
कॉन्टीन्यूड' को कान फिल्म फेस्टिवल में शॉर्ट फिल्म कॉर्नर में सिलेक्ट किया
गया था। )
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20160217/ac639ccb/attachment-0001.html>
More information about the Deewan
mailing list