[दीवान]विश्वदीपक, आखिर तुम जी न्यूज करने क्या गए थे ?
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Feb 21 13:20:49 CST 2016
डियर विश्वदीपक
जी न्यूज से इस्तीफा देने के तुम्हारे फैसले को मैं उसी तरफ से सिलेब्रेट नहीं
करुंगा जैसा कि बदलाव के मंजर में शामिल हुए तुम्हारे बाकी साथी कर रहे हैं.
सच पूछो तो मुझे थोड़ी चिंता भी हो रही है. मैंने अपने इस छोटे से जीवन में
ऐसा दसियों बार देखा है कि हम पत्रकारों के हक की लड़ाई के लिए नोएडा फिल्म
सिटी, गोपालदास बिल्डिंग, पीटीआई बिल्डिंग, आकाशवाणी के आगे, कॉफी हाउस में
जमा हुए हैं और जिन मीडियाकर्मियों के लिए जुटे, बाद में उन्होंने हाथ खींच
लिए. अपने बॉस से, संस्थान से समझौते कर लिए जिनसे आहत होकर हम तक अपनी बात
पहुंचाई थी. उनमे से कुछ( मीडियाकर्मी और उनके बॉस दोनों) अब भी फेसबुक पर नए
ब्रांड के साथ, नई पहचान के साथ भारी-भरकम विमर्श में जुटे हैं. इसमे बुरा कुछ
भी नहीं है. सबको अपने तरीके से जीने और सोचने का हक है.
मैं तुम्हारे इस इस्तीफे को इसलिए सिलेब्रेट करूंगा क्योंकि तुम्हारे लिखे में
कहीं से भी एक पीड़ित की भाषा नहीं, एक लेखक योद्धा की भाषा है जो अपनी
वैचारिक प्रतिबद्धता को सबसे उपर रखता है. मुझे तो पता भी नहीं था कि तुम जी
न्यूज के लिए काम कर रहे हो. जंतर-मंतर से पहले आज से कोई ढाई-तीन साल पहले जो
आखिरी मुलाकात हुई थी( मयूर विहार का वो घर और मैंगो शेक तो याद होगा न) तो
लगा था मेरी ये जो किताब मंडी में मीडिया ले जा रहे हो, तुम पहले ऐसे व्यक्ति
होगे जो इसकी कीमत यूरो में अदा करेगा. तुम अगले ही दिन डॉयचे वेले, जर्मनी के
लिए रवाना हो रहे थे. मुझे क्या पता था कि इस बीच मेरी तरह रुपये में
कमानेवाले दीहाडी हो चुके हो और वो भी जी न्यूज के..
एक ऐसे चैनल का प्रोड्यूसर जिसे अपनी साख, खबरों के प्रति गंभीरता और
मीडियाकर्मी के आत्मसम्मान से कोई लेना-देना नहीं है. मैंने अभी स्क्रॉल में
तुम्हारी बात को शामिल करते हुए स्टोरी पढ़ी. वेबसाइट ने साफ लिखा है कि
तुम्हारे इस्तीफे को लेकर चैनल से बात करने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने
रिस्पांड नहीं किया. न्यूजलांड्री के हवाले से संपादक सुधीर चौधरी की बात
सामने आई है जिसका भाव है कि- लोगों का इस्तीफा देना आए दिन की घटना है. लोग
आते हैं, जाते हैं और इस्तीफा देते वक्त ऐसी भावुकतापूर्ण( इसे मूर्खतापूर्ण
पढ़ना तुम) चिठ्ठियां लिख जाते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
दीपक, ये तुम्हारे लिए बड़ा फैसला हो सकता है. तुम्हें आज की रात जरूरी गहरी
और इत्मिनान की नींद आ रही होगी, आर्थिक असुरक्षा के बावजूद हल्का महसूस कर
रहे होगे. लेकिन तुम्हारे संपादक को घंटा इससे फर्क नहीं पड़ा है. उसकी भाषा
में रत्तीभर भी ये भाव शामिल नहीं है कि एक बेहतरीन प्रोड्यूसर ने इस्तीफा
देकर, संस्थान के बारे में दो टूक बात लिखकर हमें शर्मसार होने पर मजबूर किया
है. वो ऐसा नहीं कर सकता है.
जो संपादक अपने नौसिखुए लेकिन दुष्ट रिपोर्टर( जिससे कभी हमें धमकियां भी मिल
चुकी है) के फर्जी स्टिंग ऑपरेशन से ये कहते हुए पल्ला झाड़ सकता है कि
रिपोर्टर ने हमें अंधेरे में रखा, हमें इस स्टिंग के बारे में कोई जानकारी
नहीं थी, वो भला तुम्हारे प्रति कैसे संवेदनशील हो सकता है.. जिसे इस बात से
रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा कि इस गलत स्टिंग से एक सम्मानित पेशे में लगी महिला
उमा खुराना को तुर्कमान गेट पर भीड़ ने घेरकर, कपड़े फाडकर, पीटकर अधमरा कर
दिया. वो भला तुम्हारे इस्तीफे को कयों सीरियसली लेने लगा. जिस संपादक ने अपनी
गिरफ्तारी को बाद में गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता की शक्ल देने काम
किया, अपने मीडियाकर्मी को गिरफ्तारी के विरोध में जंतर-मंतर पर कैंडल मार्च
के लिए विवश किया, उसे तुम्हारी इस चिठ्ठी से क्या फर्क पड़ जाएगा. दीपक,
सच-सच बोलो, तुम तो उस कैंडिल मार्च में तब शामिल नहीं थे न..
जिस संपादक की साख बचाने के लिए टेलीविजन के कभी सबसे विश्वसनीय रहे चेहरे
पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपनी साख गंवा दी और उसकी गिरफ्तारी को देश में
आपातकाल बताया, मैं समझ सकता हूं कि तुम यहां काम करते हुए कैसा महसूस कर रहे
होगे ? प्रसूनजी ने जिस रात बुलेटिन में तुम्हारे इस भूतपूर्व दागदार संपादक
के लिए आपातकाल शब्द का इस्तेमाल किया था- मैं बेचैनी में पूरी रात सो नहीं
पाया. शायद मेरी तरह प्रसूनजी भी नहीं सो पाए होंगे और अगले ही दिन उनके
इस्तीफे की खबर आने लग गई. दोस्त, मैं उस मनःस्थिति का आकलन कर सकता हूं. उस
दिन े भी समझ गया था कि ये शख्स प्रसूनजी और अब तुम जैसे लोगों की साख को अपने
बचाव के लिए इस्तेमाल करता आया है..इस चपेट में इंडियन एक्सप्रेस का रामनाथ
गोयनका सम्मान तक आ गया.
जिस संपादक को ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन अपनी पहली जांच में दोषी पाता हो
और सेलफ रेगुलेशन की वकालत करनेवाला ये संपादक ऐसी तमाम संस्थाओं को धता बताते
हुए मीडिया इन्डस्ट्री में अलग ही सरकार बनाने की कोशिश में जुट गया हो, उसे
किसी बात का कुछ भी फर्क नहीं पड़ता. विरोध प्रदर्शन का जितना बेजा इस्तेमाल
जी न्यूज के मीडियाकर्मियों ने उस वक्त किया, अपनी याद में पहले कभी नहीं
देखा. हम जैसे के बीच जैसे ये चलन शुरू करना चाहता हो कि यदि पाजामे के नाडे
की गांठ खुल नहीं रही तो मुझे हक है कि मैं फैब इंडिया के शोरूम के आगे इस बात
पर धरना-प्रदर्शन करने लग जाउं कि आखिर ये कंपनी स्लीपरी नाडे पाजामे में
क्यों नहीं डालती ? आज जो तुम जेनुइन वजहों की काउंटर में विरोध-प्रदर्शन से
लेकर छिछालेदर तक देख रहे हो, इसके जनक तुम्हारे भूतपूर्व संपादक और सहकर्मी
ही हैं.
इन सबके बीच तुम्हारे इस्तीफे की चिठ्ठी पढ़ता हूं तो हैरान रह जाता हूं कि
आखिर तुम इस संसथान में एक साल चार महीने चार दिन टिक कैसे गए? कर क्या रहे थे
इतने दिन ? पता नहीं क्यों, इसे पढ़ते हुए लग रहा है कि एक तु्म्हारे एक दिन
और अचानक से लिया गया फैसला नहीं है. इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बन रही
होगी. ऐसा इसलिए कि अब मैं जब जी न्यूज की कवरेज को इन एक साल चर महीने में
याद करता हूं तो लगता है कम से कम एक दर्जन बार तुम्हें लगा होगा बल्कि एक समय
के बाद क्रॉनिक हो गया होगा कि यहां रहना कुछ को मार देना है. वो कुंवर नारायण
की कविता की पंक्ति है न- या तो अ ब स की तरह जीना है या सुकरात की तरह जहर
पीना है..
चिंता मत करो, नौकरी से इस्तीफा देना जहर पीना नहीं बल्कि उस जहर से बाहर
निकलना है जो एक के बाद एक दनादन पैकेज की शक्ल में लोगों के बीच घुल रहे हैं.
मैं तुम्हें इस इस्तीफे की बधाई अभी नहीं दूंगा, तब दूंगा जबकि तुम इस चैनल और
ऐसे संपादक की काउंटर टेक्सट तैयार करोगे.
मुझे उम्मीद है.
ढेर सारी बधाई और प्यार के साथ
तुम्हारा दोस्त
विनीत
<http://scroll.in/article/803943/my-conscience-has-started-to-revolt-a-zee-news-producer-quits-over-channels-handling-of-jnu-row>
‘My conscience has started to revolt’: A Zee News producer quits over
channel’s handling of JNU row
<http://l.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fscroll.in%2Farticle%2F803943%2Fmy-conscience-has-started-to-revolt-a-zee-news-producer-quits-over-channels-handling-of-jnu-row&h=pAQHrKtUv&enc=AZPFk7Q6OtJylRfyU_fG5WHAG7Kp3GZHQ6CPQhH98mzQ2eouFgHhpW7GmgUg9NaqBf0i20KXpSs9RMz0OloJpIEd0pp8vY-yZiq2sK-pygN_gnDcK7Y1yZixNCNLqXXHwG8RWIxGCHIunfaNWqktTUoEMqFQY2-kzpzkeWVU4AggHh--siJ72U43t_tRylsBY14&s=1>
Vishwa Deepak resigned over what he says were grave lapses in the way Zee
News covered the JNU sedition case.
SCROLL.IN|BY SCROLL STAFF
<http://scroll.in/article/803943/my-conscience-has-started-to-revolt-a-zee-news-producer-quits-over-channels-handling-of-jnu-row>
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