[दीवान]मेनस्ट्रीम मीडिया से आखिर हम कितने अलग रह गए हैं ?
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Tue Feb 23 23:00:50 CST 2016
मैंने तय किया था कि भाजपा के विधायक ज्ञानदेव आहूजा ( रामगढ़, राजस्थान) ने
जेएनयू को लेकर जो बकवास की है, उस पर एक शब्द नहीं लिखूंगा. कायदे से ऐसे
शख्स के लिए क्रॉड फडिंग करके किसी कायदे के क्लिनिकल साइकॉलजी के व्यक्ति के
पास भेजने की जुगाड़ होती. पैसे की कमी उनके पास भी नहीं होगी लेकिन जेएनयू
में बिखरे कंडोम और शराब की बोतले गिनने में इस पैसे का वो सदुपयोग करते रहे
होंगे. आखिर ये भगीरथ कार्य कोई एक दिन का और कम लागत का तो है नहीं. लेकिन
मैंने देखा कि मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर हर दूसरे-तीसरे फेसबुक साथी की
टाइमलाइन पर इसे लेकर अपडेट है. भले ही वो इन पर मेरी तरह तंज कस रहे हों, इस
बात का विरोध कर रहे हों लेकिन एक ऐसी बात और शख्स को आखिर चर्चा में तो ले ही
आए जिसे कि हम इससे पहले किसी दूसरे काम की वजह से नहीं जान रहे होते हैं.
ज्ञानदेव के बयान का सचमुच इस तरह से जबरदस्त विरोध करने की जरूरत है ?
मेरी अपनी समझ है कि जैसे ही हम ज्ञानदेव या ऐसे किसी भी शख्स की इन बेहूदी
बातों को तूल देते हैं, उसी वक्त देश का कोई बेहद जरूरी सवाल, मुद्दा हमसे छूट
जा रहा होता है. मेनस्ट्रीम मीडिया को लेकर हम बेहतर समझते हैं कि ये सब
एजेंडा सेटिंग थीअरि के तहत काम करते हैं. पिछले दो दिनों से ज्ञानदेव को लेकर
अखबारों, वेबसाइट ने जितनी जगह दी, स्वाभाविक है कई खबरों को डम्प करके ही ऐसा
किया होगा.
मुद्दा ये नहीं है कि हम ऐसी खबरों के विरोध में लिख रहे हैं तो इससे उनकी छवि
खराब होगी, आगे से ऐसा बोलने से पहले दस बार सोचेंगे. मुद्दा ये है कि हम
विरोध करते हुए हम ऐसे लोगों के हाथ में एख फार्मूला पकड़ा दे रहे हैं कि आप
उटपटांग बातें करके भी बहस के एजेंडे में शामिल हो सकते हो और उसके बाद करते
रहिए इसका विरोध. आप जितना विरोध करेंगे, उनके समर्थकों, श्रद्धालुओं की
संख्या बढ़ती जाएगी. आप संख्या को लेकर सवाल करेंगे न, बोतलों की गिनती पर
हंसेंगे न लेकिन उन्हें जो स्थापित करना था कि जेएनयू दरअसल शैक्षणिक संस्थान
नहीं, अय्याशी का अड्डा है जहां ये सारे काम खुलेआम होते हैं. अब जो हमारी
राष्ट्रभक्ति पूरी तरह नैतिक दुराग्रहों से जकड़ी हुई है, उसके तहत इस
निष्कर्ष पर पहुंचने में राष्ट्रभक्तों को आखिर कितना समय लगेगा कि हमारे
टैक्स के पैसे चलनेवाले इस संस्थान के छात्र कैरेक्टरलेस हैं. क्या मील ऑन वील
वाले इस देश में जहां अब जूडिशियरी ऑन वील तक पहुंचाने की कवायद चल रही हो, हर
चलता-फिरता राष्ट्रभक्त आपका जज बनकर मौजूद हो, उन्हें उबाल देने के लिए काफी
नहीं है.
आप ऐसे लोगों पर एक लाइन लिखे बिना पूरी तरह नजरअंदाज करके देखिए न, कैसे ये
हतोत्साहित हो जाते हैं. वर्चुअल स्पेस पर ऐसे लोगों को हतोत्साहित करने का
तरीका उनका विरोध नहीं, उनको पूरी तरह नजरअंदाज कर देना है.
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