[दीवान]इनबॉक्स में मुझे लिंक मत ठेलिए, कभी इस किताब को पढ़ने की जहमत उठाईएः
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Feb 24 10:52:05 CST 2016
आपलोग दनादन स्मृति ईरानी के भाषण की लिंक इनबॉक्स में ठेल रहे हैं. स्मृति
ईरानी का मैं आपसे कहीं पुराना प्रतिबद्ध दर्शक रहा हूं. आप तो कौन बनेगा
करोड़पति के सवाल नोट करके यूपीएससी, एसएससी की तैयारी में जुट जाते थे, मैं
आगे तक स्टार प्लस पर चिपका रहता था. साल 2000 की तुलसी की भूमिका में स्मृति
को अगले आठ साल तक देखता रहा और फिर पांच साल लगाए इन सीरियलों पर पीएचडी करने
में. मेरी पीएचडी टीवी सीरियल एवं रियलिटी शो की भाषिक संस्कृति पर ही है.
दूसरा कि मैं विदेश दौरे पर नहीं हूं. आपकी तरह ही बैठकर टीवी पर पूरा भाषण
सुना. ऐसे में आप इसलिए लहालोट हो रहे हैं कि आपको टीवी सीरियल से लगाव नहीं
रहा है. हम पुराने दर्शक को गहरा लगाव रहा है. अब मेरी अपील पर गौर कीजिए. कभी
मौका मिले तो सोमा मुंशी की ये किताब पढ़िएगा. कोई लेफ्टिस्ट ये सबका चक्कर
नहीं है. वो अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ कुबैत में एन्थ्रपलॉजी की प्रोफेसर है.
सोमा अपनी इस किताब में बहुत विस्तार से टीवी सीरियल के जरिए बनते जनक्षेत्र
की चर्चा करती है. एक ऐसा जनक्षेत्र जिसे पढ़ा-लिखा समाज, यहां तक कि
फेमिनिस्ट तबका गंभीरता से लेने के बजाय बकवास करार देता आया है. वो एकता कपूर
की उस स्ट्रैटजी पर विस्तार से बात करती है कि रामराज्य की जो परिकल्पना रही
है वो बॉलीवुड में हिट फॉर्मूल के तहत अपना गया और वहां की सफलता ने उसे
क्योंकि सास भी कभी बहू थी जैसे सीरियल के बनने में पृष्ठभूमि का काम किया.
रामकथा का किस तरह बॉलीवुडाइजेशन हुआ और उससे फिर सीरियलाइजेशन. ऐसा होने से
भारतीय समाज का एक बड़ा तबका मिहिर, तुलसी के आदर्श में बंधता चला गया(
स्वाभाविक है तर्क के स्तर पर) और उसके आगे सामाजिक जटिलता और उसके सवाल मंद
पड़ते गए. आखिर मिहिर की मौत के वक्त बिजली चली जाने पर देश के बिजली विभाग के
दफ्तरों के आगे विरोध-प्रदर्शन करने से लेकर आगजनी की घटनाएं ये सबूत पेश तो
करती ही हैं.
दूसरा कि मिहिर की मौत का दर्शकों ने ऐसा जबरदस्त विरोध किया कि एकता कपूर को
इसे जीवित करना पड़ा और दिलचस्प ये कि जब बालाजी टेलीफिल्म को आठ साल बाद इस
सीरियल में कोई भविष्य नजर नहीं आया( बालिका वधू के जरिए स्टार प्लस के
फ्लैगशिप सीरियल बुरी तरह से पिटने लग गए थे) तो एक-एक करके आदर्श दृश्यों के
साथ बंद करने पड़ गए और यहां तक कि क्योंकिं सास भी कभी बहू थी की तुलसी(
स्मृति ईरानी) और कहानी घर-घर की पार्वती( साक्षी तंवर) को टीवी स्क्रीन पर
आकर सफाई तक देनी पड़ गई. बाकी इस बीच जो व्यावसायिक उठापटक जो होते रहे, उसके
हिसाब से सीरियल के एपीसोड, संवाद और ट्रीटमेंट तो बदले ही.
तो ऐसा है भायजी, बात फकत बस इतनी है कि आप जो लिंक हमें ठेल रहे हैं, उसका
रसास्वादन मैं पिछले चौदह साल से करता आया हूं. बस चैनल स्टार प्लस की जगह
एबीपी न्यूज हो गया है. टाटा स्काई पर सेग्मेंट लांघकर जाना पड़ता है. नहीं तो
मेरी अपनी समझ यही है कि संसद में जो घटनाएं और दृश्य उभरकर सामने आ रहे हैं,
उसकी परिकल्पना सीरियलों में आज से सात-आठ साल पहले हो गई है और इसी तरह जो
सरकार 2014 में बनी है, टीवी पर उसकी घोषणा दो साल पहले हो गई है. और आज जो आप
2016 में गदगद हो रहे हैं, देश की लाखों ऑडिएंस सात-आठ साल पहले हो चुकी है.
चूंकि वो आपकी-हमारी तरह बौद्धिक नहीं रही तो इतिहास में उनकी चर्चा नहीं होती.
किताब पढ़िएगा, पढ़ना संभव न हो सकते तो टीवी से कैसे रामराज्य और राजनीतिक
स्तर पर सुराज लाने की कोशिशें हुई है, इस पर मेरा कहा आधे घंटे की वीडियो है,
लिंक दूंगा. जाहिर है, आपकी तरह इनबॉक्स में नहीं, सीधे टाइमलाइन पर.
बाकी एक दर्शक की हैसियत से मैं स्मृति ईरानी को टीवी पर( स्टार प्लस से लेकर
टाइम्स नाउ) देखने के लिए मैंने क्या-क्या जहमतें उठाई है, कभी विस्तार से
लिखूंगा.
[image: Vineet Kumar's photo.]
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