[दीवान]प्रमोद सिंह की एक शुरूआती रचना

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Tue Jul 26 08:28:23 CDT 2016


'हंस' कार्यालय में जब वीना दी (वीना उनियाल) ने पिछले दिनों बड़ी ही आत्मीयता
से कहानियां पढ़ने के लिए अप्रैल-मई के अंक पकड़ाये तब क्या मालूम था कि उनसे
गुजरते हुए बेसाख़्ता कितनी पुरानी यादें ताजा हो जाएंगी। हुआ कुछ यूं कि
अप्रैल अंक में छपी प्रमोद सिंह की दो कविताएं *ये सब ढाँचे हिल जाएंगे * और *पोखर
के नीचे*  पढ़ने के साथ ही मुझे ठिठक जाना पड़ा। पहली कविता में जहाँ एक बेहद
ग़ैर-मामूली किस्म के आशावाद का रंग दिखायी देता है।  तो वहीं दूसरी कविता अपनी
तमाम प्रतीकात्मकता में भी ला -सानी ठहरती है। खैर, कविता पढ़ने की तमीज़ रखने
का दावा तो मैं भूले से भी नहीं करता। मगर, इन दोनों कविताओं का तेवर मुझे बड़ा
ही अलहदा और कुछ परिचित सा जान पड़ा। कविताओं के साथ छपे 'संपर्क' पर नजर डाली
तो मुंबई का एक पता और दो मोबाईल नंबर भी दिखे। बार-बार ऐसा एह्साह हुआ कि हो
न हो ये अपना दोस्त और शायर 'परिंदा' ही है ! सच तो ये है कि 'परिंदा' तख़ल्लुस
के साथ अपनी शायरी की शुरुआत करने वाले हमारे दोस्त प्रमोद कुमार सिंह-- जिनसे
पिछली मुलाकात, बनारस में, सन 2014 की है-- भी इन दिनों मुंबई में ही
कला-निर्देशन के क्षेत्र में संघर्षरत हैं। फिर याद आया कि बनारस की उस अचानक
हुयी मुलाकात में 'परिंदा' ने अपना मोबाईल नंबर भी तो दिया था। उस वक्त
मैं दार्शनिक आचार्य प्रोफेसर नवज्योति सिंह के बुलावे पर और
उनके ग्रीष्मकालीन विद्यालय में शामिल होने के लिए बनारस पहुंचा हुआ
था। इसी दौरान एक शाम लंका टहलते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अपने छात्र
जीवन के साथी रहे प्रमोद और श्रीराम 'डाल्टन' से दसियों साल बाद मुलाकात हुयी
थी। श्रीराम को तब तक *बहुरूपिया* के लिए राष्ट्रिय पुरस्कार मिल चुका था। और
नवाजुद्दीन को ले कर बनायीं उनकी शार्ट फिल्म भी हिट्स पर हिट्स बटोर रही थी।
बहरहाल, उस समय प्रमोद और राम, दोनों, नक्सलवाद पर आधारित अपनी किसी फिल्म की
शूटिंग में व्यस्त थे। और मुझे भी अपने साथ पकड़ ले जाना चाहते थे। किसी तरह से
उन्हें समझाया -बुझाया और नंबरों का आदान-प्रदान कर ये तय हुआ कि जल्द ही
मुलाकात की जाए।  मुलाकात और बात तो तब से फिर नहीं हुयी, लेकिन प्रमोद का
दिया वो नंबर जरूर मेरे पास था। मोबाईल नंबर का मिलान किया तो हंस में
छपे दोनों में एक नंबर वही था। फिर तो पक्का हो गया कि ये अपने दोस्त 'परिंदा'
ही हैं। प्रमोद कुमार सिंह 'परिंदा' की रचनाएं हम 1997 से 2001 के बीच न मालूम
कितनी बार बी.एच.यू. के फाईन आर्ट्स विभाग, और अस्सी घाट पर भी, उनके मुंह से
ही सुनते आये हैं। दीवान के साथियों के लिए उनकी एक शुरूआती रचना, जो मुझे अब
भी जुबानी याद है, पोस्ट कर रहा हूँ। पढ़ें और मौजियायें-

-----

एहसास में यकीन पिरोने की बात है
उस रास्ते पे आँख संजोने की बात है.

कहाँ सुराग़-ए-निहां और कहाँ फ़िजूल की नज़रें
नज़र को आसमाँ के बाम पे होने की बात है.

दयार -ए -संग में बनाये हमने बुत कई हजार
हमारे हाँथ की कारीगरी खोने की बात है.

खो गया है दस्त में खोने का रास्ता
कदमों के कुछ निशान डूबोने की बात है.

एहसास में यकीन पिरोने की बात है
उस रास्ते पे आँख संजोने की बात है.


------


*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20160726/ae793eff/attachment.html>


More information about the Deewan mailing list