[दीवान]स्क्रीन पर स्त्रीः स्त्री सत्ता या टीआरपी की कठपुतलियां

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Mar 9 04:07:57 CST 2016


संदर्भः स्क्रीन पर स्त्री विषय पर आयोजित परिचर्चा

हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय



सवाल ये नहीं है कि आप टीवी सीरियल देखते हैं या नहीं, देखते भी हैं तो नापसंद
करते हैं. असल सवाल ये है कि आपकी जिंदगी में टीवी सीरियल के चरित्र किस तरह
से शामिल होते हैं. आपके सीरियल न देखे जाने के बावजूद आपकी जीवन शैली और
हाव-भाव में इनके चरित्र शामिल होते हैं.

इस दिल्ली शहर में दर्जनों ऐसी शॉप, शोरूम हैं जहां बड़े-बड़े अक्षरों में
लिखा रहता है- यहां टीवी सीरियलों की डिजाईन की जूलरी मिलती है. आप चले जाईए
कटरा अशर्फी और सिरे से खारिज कीजिए साडियों की ़डिजाईन, लंहगे की स्टाईल और
रंगों को..दूकानदार आपको सीधा जवाब देगा कि आप जिसे नापसंद कर रही हैं, उसे
अक्षरा, काकुली, पार्वती, प्रिया भाभी पहनती हैं. कई बार दर्शक खुद ग्राहक की
शक्ल में इनकी मांग करते हैं.

आप पढ़िए दि हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस लेकिन एडिटोरियल तक पहुंचने से पहले उन
फॉल्स जैकेट से टकराना होगा जिस पर ससुराल सिमर का फुल पेज का विज्ञापन होगा,
रोली बताएगी कि आप होली कैसे मनाएंगे ? अक्षरा तय करती है कि कृष्ण की
पितांबरी कितने गाढ़े पीले रंग का होगा.

ये क्या कम दिलचस्प है कि जब आप इंटरनेट पर क्योंकि सास भी कभी बहू थी के
किरदारों की तस्वीरें खोजने निकलते हैं तो तुलसी बनी स्मृति इरानी का अंगरखा
कमल के निशान के साथ( पार्टी की ब्रांड कलर सहित) का होता है. यानी जिस सीरियल
ने चरित्र के स्तर पर स्मृति इरानी को एम्पावर किया, अब उसकी राजनीतिक पहचान
के साथ खुद को जोड़ रहा है और ऐसा होते-होते स्क्रीन पर की स्त्री, ड्राइंगरूम
की स्त्री कैसे आपके क्लासरूम की, स्टडीरूम की डिसिजन मेकर हो जाती हैं.

दूसरी तरफ टीवी स्क्रीन का पर्दा अपने तमाम स्त्री चरित्रों को अच्छे-बुरे में
विभाजित करता है. कोहेन ने सोप ओपेरा पर गंभीर अध्ययन करते हुए विस्तार से
बताया है कि जो अच्छी चरित्र के खाते में होंगी वो परंपरा, परिवार, मूल्य,
संस्कार आदि ( भले ही वो कई स्तरों पर जड़ ही क्यों न हों) बचाने में सक्रिय
होंगी जबकि जो खल चरित्र होंगी वो प्रगतिशील, पढ़ी-लिखी, कामकाजी, खुद की
पहचान के लिए जद्दोजद करती नजर आएंगी. अकादमिक-साहित्यिक दुनिया से ये बिल्कुल
उलट छवि हैं.

स्त्रियों की इस तरह की बनायी गई छवियों को टश्मान ने सांकेतिक विनाश(
symbolic inhilation) के तौर पर परिभाषित किया है जिसके तहत स्त्रियों की
अलग-अलग भूमिका को स्टीरियो टाइप में गढ़ने का काम किया जाता है. सूसैन सोटेंग
जिन्हें अपने अध्ययन में औसत छवि चित्र निर्माण की प्रक्रिया बताती हैं...और
इस छवि निर्माण के लिए रंग, आकार, हाव-भाव इन सबका शाब्दिक अभिव्यक्ति से कहीं
ज्यादा सहारा लिया जाता है.

ये बात अक्सर उठाई जाती है कि यदि स्क्रीन पर स्त्रियों की मौजूदगी ज्यादा से
ज्यादा होगी तो टीवी की दुनिया बदल जाएगी..लेकिन सीरियल तो पूरा का पूरा वूमेन
स्पेस है. न्यूज चैनलों में भी प्रोडक्शन के स्तर पर छोड़ दें तो एंकरिंग के
स्तर पर तो अनुपात कमजोर नहीं है लेकिन सिर्फ स्त्री होने के कारण उनके सवाल
टीवी स्क्रीन पर प्रमुखता से आ पाते हैं. हिन्दुस्तान का जो पूरा का पूरा
मध्यवर्ग कलर कॉम्प्लेक्स में धंसा हुआ, आपको न्यूज चैनलों में सांवले, डस्की
चेहरे नजर आते हैं..क्या ये चुनौती देने का मोर्चा नहीं हो सकता है...

ये कुछ बातें थी जिसे कि मैंने हिन्दू कॉलेज में स्क्रीन पर स्त्री विषय पर
बात करते हुए रखने की कोशिश की. समय का थोड़ा दवाब था और कुछ यहां का छात्र
होने के नाते अतिरिक्त सावधानी तो जितना संभव हो सका, कोशिश की.

बोलकर बाहर निकला तो वूमेन डेवलपमेंट सेल जिसने ये परिचर्चा आयोजित की थी,
उनकी ओर से नुक्कड़ नाटक भी आयोजित किया गया था जिसका विषय था- वूमेन विदाउट
स्क्रीन. नाटक का छोटा सा ही सही, हिस्सा देखते हुए लगा कि इस पर अलग से बात
की जानी चाहिए.
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